दस हाथों वाली माँ | भाग :- तीसरा | माँ दुर्गा की शक्ति और एक माँ के संघर्ष की भावुक कहानी | कुमार सरोज | किशोरवाणी |





              💅  दस हाथों वाली मां 


   अभी तक आपने पढ़ा........

                 अनामिका जो की मां दुर्गा की परम भक्त थी का बनाया प्रोजेक्ट उसके ऑफिस का बॉस चुराकर अपने नाम से कर लेता है। जब वह इस बात का विरोध करती है तो उसे ऑफिस से निकाल देने की धमकी दी जाती है। 

             उधर उसकी बेटी सिया के साथ सोशल मीडिया पर कुछ लोग गंदे गंदे कॉमेंट करते रहते हैं। वह भी बहुत परेशान थी।

               दोनों मां बेटी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। अंत में एक बार फिर दोनों अपनी परेशानी को मां दुर्गा के ऊपर छोड़ देती हैं।

           क्या मां दुर्गा अनामिका और उसकी बेटी की परेशानी दूर कर पाएंगी ? 




                दस हाथों वाली मां 

                 ( भाग - तीसरा )

                                     ✍️  कुमार सरोज 



                   उस रात घर में सब सो चुके थे। सिया अपने कमरे में थी। अनामिका चुपचाप पूजा की चौकी के सामने बैठी थी। दीपक की लौ हल्के-हल्के काँप रही थी।

               माँ दुर्गा की तस्वीर दीवार पर टंगी थी। दस हाथों वाली देवी शांत भाव से उसे देख रही थीं।

        अनामिका की आँखों से आँसू बह निकले।

“माँ, मैं थक गई हूँ।”

उसने दोनों हाथ जोड़ दिए।

“हर दिन किसी न किसी मोर्चे पर लड़ना पड़ता है। घर, नौकरी, बेटी, समाज। आखिर कितनी ताकत रखूँ मैं?”

उसकी आवाज भर्रा गई।

“कभी लगता है सब छोड़ दूँ। कभी लगता है किसी के सामने सिर रखकर रो लूँ। लेकिन फिर सिया का चेहरा सामने आ जाता है।”

               उसी समय सिया पानी पीने के लिए उठी। उसने माँ की आवाज सुनी तो कमरे के बाहर रुक गई।

अनामिका बोल रही थी—

“माँ, मुझे बस इतना मजबूत बनाए रखना कि मैं अपनी बेटी को डरना नहीं, लड़ना सिखा सकूँ।”

सिया की आँखें भर आईं। वह धीरे से कमरे में आई।

“माँ…”

अनामिका ने आँसू पोंछ लिए।

“तुम अभी तक जाग रही हो?”

“आप रो क्यों रही थीं?”

“कुछ नहीं।”

“माँ, मुझसे मत छिपाइए।”

अनामिका ने उसे अपने पास बैठा लिया।

“कभी-कभी इंसान मजबूत होते-होते थक जाता है।”

सिया ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

“आपको भी रोने का हक है।”

अनामिका ने बेटी को देखा।

“हाँ, है।”

“आप हमेशा सबके लिए मजबूत बनी रहती हैं। लेकिन आपके लिए कौन मजबूत बनेगा?”

अनामिका के पास कोई जवाब नहीं था।

सिया ने माँ दुर्गा की तस्वीर की ओर देखा।

“माँ, आपके दस हाथ हैं।”

अनामिका मुस्कुराई।

“फिर वही बात?”

“नहीं। अब समझ में आया।”

“क्या?”

“आपके भी दस हाथ हैं।”

अनामिका ने आश्चर्य से पूछा—

“मेरे?”

“हाँ।”

सिया ने गिनना शुरू किया—

“एक हाथ घर संभालता है। दूसरा मेरी पढ़ाई। तीसरा नौकरी। चौथा खर्च। पाँचवाँ रिश्तों को। छठा अपने सपनों को। सातवाँ दूसरों की मदद को। आठवाँ डर से लड़ता है। नौवाँ सच बोलता है। और दसवाँ…”

“दसवाँ क्या?”

“दसवाँ मुझे संभालता है।”

अनामिका की आँखों से फिर आँसू बह निकले।

सिया ने कहा—

“माँ, आप माँ दुर्गा की तस्वीर के सामने शक्ति माँगती हैं। लेकिन शायद आपको पता नहीं कि आप खुद किसी की शक्ति हैं।”

अनामिका ने बेटी को गले लगा लिया।

“तुम कब इतनी बड़ी हो गई?”

“जब आपने मुझे बड़ा होने दिया।”

दोनों देर तक एक-दूसरे से लिपटी रहीं।

दीपक की लौ अब स्थिर थी।


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                     उस रात अनामिका ने पहली बार महसूस किया कि शक्ति हमेशा ऊपर से नहीं आती। कभी-कभी वह बेटी की आवाज बनकर सामने खड़ी हो जाती है।

               अगले दिन ऑफिस में अनामिका के पास उसकी सहकर्मी पूजा आई। पूजा के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

“अनामिका दी, आपसे कुछ बात करनी है।”

“हाँ, बैठो।”

पूजा ने धीरे से कहा—

“मेरे प्रोजेक्ट का श्रेय भी शर्मा सर ने अपने नाम कर लिया।”

अनामिका ने उसकी ओर देखा।

“क्या हुआ?”

“मैंने पूरी रिपोर्ट तैयार की थी। मीटिंग में उन्होंने कहा कि यह उनकी योजना थी।”

“तुमने कुछ कहा?”

“कहती तो नौकरी पर असर पड़ता।”

कुछ देर बाद नंदिता भी वहाँ आ गई।

“मेरे साथ भी यही हुआ है।”

अनामिका ने दोनों को गौर से देखा।

“क्या सिर्फ श्रेय लेने की बात है?”

नंदिता ने धीमे स्वर में कहा—

“नहीं। कभी-कभी अनावश्यक दबाव, देर तक रुकने को कहना, निजी टिप्पणियाँ… बहुत कुछ होता है।”

पूजा बोली—

“लेकिन कोई खुलकर बोलना नहीं चाहता।”

“क्यों?”

“क्योंकि सबको नौकरी चाहिए।”

अनामिका ने अपनी फाइल खोली।

“डर समझ में आता है। लेकिन बिना रिकॉर्ड के शिकायत करना मुश्किल होता है।”

“तो क्या करें?” पूजा ने पूछा।

“हर काम का रिकॉर्ड रखो।”

“कैसा रिकॉर्ड?”

“ईमेल, रिपोर्ट, तारीख, मीटिंग की जानकारी, किसने क्या कहा—सब लिखो। अगर कोई काम तुम्हें दिया गया है तो मेल से पुष्टि करो। मौखिक निर्देश को भी लिखित रूप में कन्फर्म करो।”

नंदिता ने पूछा—

“क्या इससे सब ठीक हो जाएगा?”

“शायद तुरंत नहीं। लेकिन सच को मजबूत आधार मिलेगा।”

पूजा ने धीरे से कहा—

“दी, आप शिकायत करेंगी?”

          अनामिका कुछ पल चुप रही। उसने विक्रम की धमकी याद की। नौकरी की चिंता याद आई। सिया की फीस याद आई।

फिर उसने कहा—

“हाँ।”

“आपको डर नहीं लगता?”

“लगता है।”

“फिर भी?”

“अगर हम डर की वजह से हर गलत बात सहते रहे, तो गलत बात व्यवस्था बन जाएगी।”

नंदिता ने कहा—

“लेकिन अकेले शिकायत करने से क्या होगा?”

अनामिका ने दोनों की ओर देखा।

“अकेली शिकायत एक आवाज है। कई लोगों का सच एक दस्तावेज बन सकता है।”

पूजा ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

“तो हम भी अपने रिकॉर्ड तैयार करेंगे।”

“लेकिन एक बात याद रखना,” अनामिका ने कहा, “किसी पर झूठा आरोप नहीं लगाना। सिर्फ वही लिखना जो सच में हुआ है। भावनाओं से नहीं, तथ्यों से लड़ना।”

नंदिता ने सिर हिलाया।

उस दिन तीनों ने अपनी-अपनी फाइलें व्यवस्थित कीं। एक फाइल में सिर्फ कागज नहीं थे। उसमें कई महिलाओं की मेहनत, चुप्पी और उम्मीद दर्ज थी।


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                     सिया ने अपनी माँ से हुई बातचीत को गंभीरता से लिया। उसे समझ आ गया था कि सिर्फ सोशल मीडिया पर गुस्सा दिखाने से बदलाव नहीं आता। सही जानकारी, सुरक्षित कदम और लगातार प्रयास भी जरूरी हैं। उसने कॉलेज की कुछ सहेलियों के साथ मिलकर एक छोटा-सा डिजिटल अभियान शुरू करने का फैसला किया।
अभियान का नाम रखा गया—
“सम्मान से बोलो”
इसका उद्देश्य था— ऑनलाइन अभद्रता के खिलाफ जागरूकता, साइबर सुरक्षा की जानकारी, लड़कियों को अपनी आवाज उठाने के लिए प्रोत्साहित करना।
किसी भी परेशानी में भरोसेमंद व्यक्ति से मदद लेने की सलाह।

सिया ने एक पोस्ट बनाई—

“किसी की तस्वीर आपकी संपत्ति नहीं है।
किसी की चुप्पी आपकी अनुमति नहीं है।
और किसी लड़की की आवाज को दबाना आपकी ताकत नहीं है।”

उसने पोस्ट के साथ लिखा—
“ऑनलाइन दुनिया में भी सम्मान उतना ही जरूरी है जितना वास्तविक जीवन में।”

        पोस्ट को अच्छा रिस्पॉन्स मिला। कुछ लड़कियों ने अपने अनुभव साझा किए। कुछ ने पूछा कि गलत अकाउंट को कैसे रिपोर्ट करें। कुछ ने कहा कि उन्हें भी कभी ऐसी परेशानी का सामना करना पड़ा था।

सिया ने अपनी माँ से पूछा—
“माँ, क्या मैं सही कर रही हूँ?”

अनामिका ने कहा—
“अगर तुम्हारा उद्देश्य किसी को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि जागरूक करना है, तो हाँ।”

“लेकिन कुछ लोग मजाक उड़ाते हैं।”

“हर अच्छे काम का मजाक उड़ाने वाले मिलेंगे।”

“तो क्या उन्हें जवाब न दूँ?”

“जहाँ जरूरी हो, जवाब दो। जहाँ बेकार हो, समय बचाओ।”

“माँ, आप हर बात में संतुलन कैसे रख लेती हैं?”
अनामिका हँस पड़ी।

“जिंदगी ने सिखाया है।”

सिया ने अपनी पोस्ट में एक और बात जोड़ी—
“अगर कोई आपको ऑनलाइन परेशान कर रहा है, तो सबूत सुरक्षित रखें, अकाउंट ब्लॉक और रिपोर्ट करें, और किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें। समस्या को अकेले सहना जरूरी नहीं।”

उसकी सहेली ने कहा—
“सिया, तुम्हारी माँ बहुत समझदार हैं।”

सिया ने मुस्कुराकर जवाब दिया—
“मेरी माँ सिर्फ समझदार नहीं हैं। वह मेरी पहली शिक्षक हैं।”

          उधर अनामिका ऑफिस में अपनी शिकायत की तैयारी कर रही थी। घर में माँ अपनी लड़ाई लड़ रही थी।
बाहर बेटी अपनी।
दोनों की लड़ाइयाँ अलग थीं, लेकिन उद्देश्य एक था—
सम्मान के साथ जीने का अधिकार।


                             क्रमशः आगे.......

📖💌📖 दस हाथों वाली मां  कहानी के यदि आपने अभी तक पीछे का अध्याय नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। एक परिवार और मां दुर्गा के प्रति अथाह लगाव की बहुत ही मार्मिक और भावुक कहानी है। 

              पीछे के भाग को पढ़ने के लिए नीचे लिखे कहानी के शीर्षक पर क्लिक कीजिए -




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