अधूरी ख्वाहिश: प्रेम, संगीत और कर्मा की एक मार्मिक कहानी | Adhoori Khwaahish - A Story of Love & Destiny
✨ अधूरी ख्वाहिश
✍️ किशोर
दिल्ली की ठंडी सुबहों और हल्की धूप में जन्मी थी अनाहिता—एक ऐसी लड़की, जिसकी आंखों में मासूमियत थी और दिल में अजीब-सी दृढ़ता। वर्ष 1940… देश अभी आज़ाद नहीं हुआ था, लेकिन अनाहिता की दुनिया छोटी-सी और सुकूनभरी थी।
उसके पिता, डॉक्टर एस. के. डिसूजा—एक नामी चिकित्सक, जिनकी उंगलियों में इलाज का जादू था और दिल में संगीत का अथाह प्रेम।
मां सुजाता—एक सरल, संस्कारी हिंदू महिला, जिनकी आवाज़ में ऐसी मिठास थी कि घर की दीवारें भी ठहरकर सुनती थीं।
डिसूजा साहब के लिए संगीत सिर्फ शौक नहीं, सांस लेने जैसा था।
सुबह उनकी आंखें किसी धुन के सहारे खुलतीं और रात किसी गीत की गोद में ही ढलती।
अगर कभी संगीत रुक जाता, तो घर में जैसे सन्नाटा नहीं, बेचैनी उतर आती। तब छोटी-सी अनाहिता या उसकी मां अपने स्वर से उस सन्नाटे को भर देतीं।
शायद यही वजह थी कि अनाहिता के बचपन में ही संगीत ने चुपचाप अपना घर बना लिया था।
डॉक्टर डिसूजा के एक अभिन्न मित्र थे—डॉक्टर शमशेर आलम।
दोस्ती का आधार पेशा कम, और संगीत ज्यादा था।
जब भी फुर्सत मिलती, दोनों की महफिल सजती—सुरों, हंसी और यादों से भरी।
शमशेर आलम का एक बेटा था—सजदा।
सजदा… जिसकी आवाज़ में ऐसी कशिश थी कि सुनने वाला खुद को भूल जाए।
वह अनाहिता से बस तीन साल बड़ा था, लेकिन सुरों में दोनों की उम्र जैसे बराबर थी।
फिर आया 1947…
देश आज़ाद हुआ, लेकिन कई रिश्ते सीमाओं में बंट गए।
डॉक्टर डिसूजा अपने परिवार के साथ लंदन चले गए।
और शमशेर आलम पाकिस्तान।
सिर्फ सात साल की अनाहिता और दस साल का सजदा—दोनों के बीच अब सरहद थी…
लेकिन कुछ दूरियां नक्शे से नहीं, दिल से तय होती हैं।
समय अपनी रफ्तार से भागता रहा।
बीस साल बीत गए।
अनाहिता अब एक सफल डॉक्टर बन चुकी थी—खूबसूरती और आत्मविश्वास का संगम।
वहीं सजदा—पाकिस्तान का मशहूर गायक, जिसकी आवाज़ रेडियो से निकलकर दिलों में उतर जाती थी।
टेलीफोन की पतली-सी डोर ने दोनों परिवारों को जोड़े रखा…
और उसी डोर पर चलते-चलते, अनाहिता और सजदा की बचपन की दोस्ती कब प्रेम में बदल गई—यह किसी को पता ही नहीं चला।
उनकी बातें अब सिर्फ यादों तक सीमित नहीं थीं…
अब उनमें सपने थे—साथ जीने और मरने के।
1967…
जब यह प्रेम दोनों परिवारों के सामने आया, तो एक दीवार खड़ी हो गई—मजहब की।
जहां एक तरफ दोस्ती थी, वहीं दूसरी तरफ परंपराओं का बोझ।
शमशेर आलम ने साफ इंकार कर दिया।
लेकिन प्रेम जब जिद बन जाए, तो दुनिया झुक ही जाती है।
आखिरकार शादी हो गई।
शादी के बाद लंदन में एक नया घर बसा—जहां अनाहिता और सजदा ने अपने सपनों को सजाया।
लेकिन कुछ रिश्तों में दरारें दिखती नहीं… बस धीरे-धीरे फैलती रहती हैं।
सजदा के माता-पिता की नाराज़गी, अनाहिता के लिए अनकही बंदिशें, और सजदा की चुप्पी—
इन सबने उस घर की दीवारों में अदृश्य दरारें डाल दीं।
1970…
एक और झटका।
अनाहिता की मां, सुजाता… इस दुनिया से चली गईं।
डॉक्टर डिसूजा टूट गए।
उनकी दुनिया जैसे थम गई।
अब उनके पास सिर्फ एक सहारा था—
सजदा की आवाज़।
वे दिन-रात उसी के गाने सुनते…
जैसे हर सुर में अपनी खोई हुई जिंदगी ढूंढ रहे हों।
एक दिन, मौत ने दस्तक दी।
डिसूजा साहब ने अपनी आखिरी ख्वाहिश जताई—
“मैं सजदा को… लाइव गाते हुए सुनना चाहता हूं…”
अनाहिता ने कांपते हाथों से फोन मिलाया।
लेकिन उधर से जवाब आया—
“मैं नहीं आ सकता… यहां प्रधानमंत्री के लिए शो है।”
उस पल… सिर्फ एक ख्वाहिश नहीं टूटी—
एक रिश्ता भी टूट गया।
डिसूजा साहब… अधूरी इच्छा लिए इस दुनिया से चले गए।
उस दिन अनाहिता के भीतर कुछ मर गया।
उसने सजदा से सारे रिश्ते खत्म कर दिए।
और इस बार… सजदा ने भी उसे रोकने की कोशिश नहीं की।
तलाक…
और दो जिंदगियां… हमेशा के लिए अलग।
टूटकर बिखरी अनाहिता ने खुद को एक झील के किनारे समेटना शुरू किया—
जहां कभी वो और सजदा साथ बैठे थे।
वहीं उसकी मुलाकात तीन लड़कियों से हुई—
झरना, गजाला और नताशा।
तीनों की कहानियां दर्द से भरी थीं…
और शायद उसी दर्द ने अनाहिता को एक नई राह दिखा दी।
उसने एक म्यूजिकल बैंड बनाया।
सुरों को फिर से जिया…
और इस बार, सिर्फ अपने लिए नहीं—
उन सभी के लिए, जिन्हें जिंदगी ने तोड़ा था।
कुछ ही समय में…
वो बैंड लंदन से दुनिया तक गूंजने लगा।
अनाहिता—अब सिर्फ एक डॉक्टर नहीं, एक सितारा थी।
और इधर…
सजदा की चमक फीकी पड़ने लगी।
शो कम हुए… नाम बदनाम हुआ…
और जिंदगी बिखरती चली गई।
एक दिन…
अनाहिता का शो…
ठीक सजदा के घर के सामने था।
सजदा… लड़खड़ाते कदमों से बाहर निकला—
शायद पहली बार… उसे लाइव सुनने के लिए।
लेकिन किस्मत… फिर बेरहम थी।
वह गिर पड़ा…
खून से लथपथ।
और उसी पल…
माइक पर अनाहिता की आवाज़ गूंज उठी।
वह उठना चाहता था…
हर हाल में… उस आवाज़ तक पहुंचना चाहता था…
लेकिन शरीर ने साथ छोड़ दिया।
और जैसे ही गाना खत्म हुआ—
सजदा की सांसें भी खत्म हो गईं।
वह भी…
एक अधूरी ख्वाहिश लिए मर गया।
ठीक वैसे ही…
जैसे कभी अनाहिता के पिता मरे थे।
✨ समापन संदेश
कुछ कहानियां खत्म नहीं होतीं…
बस अधूरी रह जाती हैं।
कभी एक बाप…
अपने पसंदीदा गायक को आखिरी बार सुनने की ख्वाहिश लिए चला जाता है…
और कभी वही गायक…
उसी आवाज़ तक पहुंचने की कोशिश में दम तोड़ देता है।
शायद जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है—
हम अक्सर उन लोगों के लिए वक्त नहीं निकालते,
जो हमारे लिए पूरी जिंदगी निकाल देते हैं।
प्यार अगर वक्त पर साथ न दे…
तो वह याद बन जाता है,
और याद…
हमेशा अधूरी ही रहती है।
आपको अनाहिता का संघर्ष और सजदा का अंत कैसा लगा? क्या आपको भी लगता है कि कर्मा का हिसाब इसी जन्म में होता है ?
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कर्मा सबका हिसाब रखता है
जवाब देंहटाएंएकदम सही
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