दस हाथों वाली माँ | भाग :- पहला | माँ दुर्गा की शक्ति और एक माँ के संघर्ष की भावुक कहानी | कुमार सरोज | किशोरवाणी |
💅 दस हाथों वाली मां 💅
कुछ माँएँ सिर्फ बच्चों को जन्म नहीं देतीं, वे अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी से लड़ती हैं।
सुबह की रसोई से लेकर ऑफिस की भागदौड़ तक, बेटी के भविष्य से लेकर अपने आत्मसम्मान तक, एक माँ न जाने कितनी जिम्मेदारियाँ अपने कंधों पर उठाए चलती है।
पटना की भागती हुई जिंदगी में अनामिका भी ऐसी ही एक माँ थी। विधवा होने के बाद उसने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। उसने अपने दो हाथों से घर भी सँभाला और बेटी का भविष्य भी।
लेकिन जब उसके अपने ही ऑफिस में उसकी मेहनत का हक छीनने की कोशिश हुई,
और उसी समय उसकी बेटी को सोशल मीडिया की भीड़ ने निशाना बनाया, तब अनामिका के सामने सवाल सिर्फ नौकरी या परिवार का नहीं था...
सवाल था—
क्या एक औरत अपने सम्मान के लिए खड़ी हो सकती है, बिना अपने परिवार को खोए ?
और शायद यहीं से शुरू होती है उस माँ की कहानी, जिसके पास सचमुच दस हाथ नहीं थे, लेकिन जिसने जिंदगी की हर जिम्मेदारी को ऐसे संभाला, जैसे उसके भीतर माँ दुर्गा की दसों शक्तियाँ उतर आई हों।
🫸 माँ के दस हाथ 🫷
( भाग - पहला )
✍️ कुमार सरोज
पटना शहर की भागती-दौड़ती जिंदगी में सुबह कभी सूरज से पहले आती थी और कभी मोबाइल के अलार्म से हार जाती थी। लेकिन अनामिका की सुबह हर दिन एक जैसी होती थी।
सुबह के पाँच बजते ही उसकी आँखें खुल जातीं। वह चुपचाप बिस्तर से उठती, रसोई में गैस जलाती और चाय का पानी चढ़ा देती। फिर पूजा की छोटी-सी चौकी के सामने बैठ जाती।
चौकी पर माँ दुर्गा की एक सुंदर तस्वीर रखी थी। तस्वीर में माँ दुर्गा के दस हाथ थे। किसी हाथ में त्रिशूल था, किसी में कमल, किसी में शंख, तो किसी में तलवार।
अनामिका रोज तस्वीर के सामने दीपक जलाती और धीमे स्वर में कहती—
“माँ, आज भी हिम्मत देना।”
उसकी बेटी सिया अक्सर उसे देखती रहती थी। अठारह साल की सिया आधुनिक विचारों वाली लड़की थी। उसे लगता था कि पूजा-पाठ सिर्फ परंपरा है। उसके लिए असली दुनिया किताबों, कॉलेज, सोशल मीडिया और अपने सपनों से बनी थी।
उस सुबह भी सिया पानी पीने के लिए उठी तो उसने माँ को पूजा करते देखा।
“माँ, आप रोज इतनी सुबह उठकर क्या माँगती हैं?” सिया ने पूछा।
अनामिका मुस्कुराई।
“हिम्मत।”
“हिम्मत ! किससे?”
“जिंदगी से।”
सिया ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“माँ, जिंदगी से भी कोई हिम्मत माँगता है? हिम्मत तो अपने अंदर होनी चाहिए।”
अनामिका ने दीपक की लौ को देखते हुए कहा—
“बिल्कुल होनी चाहिए। लेकिन कभी-कभी अपने अंदर की हिम्मत को जगाने के लिए किसी सहारे की जरूरत पड़ती है।”
“तो क्या माँ दुर्गा आपको हिम्मत देती हैं?”
“हाँ।”
“कैसे?”
अनामिका ने तस्वीर की ओर देखा।
“जब मुझे लगता है कि मैं अकेली हूँ, तब मुझे याद आता है कि मैं अकेली नहीं हूँ। मेरे भीतर भी शक्ति है। बस उसे पहचानना होता है।”
सिया कुछ नहीं बोली।
अनामिका ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“चल, अब तैयार हो जा। कॉलेज के लिए देर हो जाएगी।”
“और आप?”
“मुझे ऑफिस जाना है। घर भी संभालना है, टिफिन भी बनाना है, तुम्हारी फीस भी जमा करनी है और आज बॉस को प्रेजेंटेशन भी देना है।”
सिया हँस पड़ी।
“माँ, आपके तो सच में दस हाथ हैं।”
अनामिका ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“नहीं बेटी, मेरे सिर्फ दो हाथ हैं। बाकी आठ हाथ जिम्मेदारियों ने बना दिए हैं।”
सिया हँसते हुए कमरे में चली गई।
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लेकिन अनामिका की मुस्कान के पीछे बहुत कुछ छिपा था। एक विधवा माँ की चिंता, एक बेटी का भविष्य, नौकरी का दबाव, समाज की बातें और जिंदगी से लगातार लड़ते रहने की मजबूरी।
वह चुपचाप रसोई में लौट गई। क्योंकि माँ की सुबह कभी सिर्फ सुबह नहीं होती।नवह पूरे घर की शुरुआत होती है।
अनामिका की उम्र चालीस वर्ष थी। पति की मृत्यु को लगभग आठ साल हो चुके थे। पति के जाने के बाद रिश्तेदारों ने बहुत सलाह दी थी।
किसी ने कहा था—
“अब नौकरी छोड़ दो। अकेली औरत के लिए बाहर की दुनिया आसान नहीं होती।”
किसी ने कहा—
“बेटी को लेकर मायके आ जाओ।”
किसी ने सहानुभूति जताई, तो किसी ने उसके भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए।
लेकिन अनामिका ने किसी की बात नहीं मानी। उसने अपनी नौकरी बचाए रखी। बेटी को अच्छे स्कूल में पढ़ाया और धीरे-धीरे अपने जीवन को फिर से खड़ा किया।
सिया को पिता की बहुत कम यादें थीं। उसे याद था कि पिता उसे साइकिल चलाना सिखाते थे। फिर एक दिन सब बदल गया। उस दिन के बाद माँ ही उसके लिए पिता भी बन गई और माँ भी।
एक रात सिया पढ़ाई कर रही थी। अनामिका कमरे में आई और उसके पास बैठ गई।
“बहुत पढ़ाई हो गई। अब सो जाओ।”
“माँ, आप थकती नहीं हैं?”
“थकती हूँ।”
“फिर आराम क्यों नहीं करतीं?”
“आराम करने का समय निकालना पड़ता है।”
“और अगर समय न मिले?”
“तो थोड़ा-सा समय चुरा लेना चाहिए।”
सिया ने किताब बंद कर दी।
“माँ, आप सच में माँ दुर्गा को मानती हैं?”
“हाँ।”
“लेकिन आप तो पढ़ी-लिखी हैं। आप भी बाकी लोगों की तरह अंधविश्वास में विश्वास करती हैं?”
अनामिका ने उसे गौर से देखा।
“आस्था और अंधविश्वास में फर्क होता है, सिया।”
“क्या फर्क?”
“अंधविश्वास तुम्हें कमजोर बनाता है। आस्था तुम्हें मजबूत बनाती है।”
सिया चुप रही।
अनामिका ने आगे कहा—
“मैं माँ दुर्गा से यह नहीं माँगती कि मेरे सारे काम कोई चमत्कार करके कर दें। मैं उनसे सिर्फ इतना माँगती हूँ कि जब मुश्किल आए तो मैं डरकर गलत रास्ता न चुनूँ।”
“मतलब?”
“मतलब यह कि शक्ति बाहर से नहीं आती। कभी-कभी किसी प्रतीक के सहारे वह हमारे भीतर जागती है।”
सिया ने तस्वीर की ओर देखा।
“तो आपके लिए माँ दुर्गा एक देवी से ज्यादा हैं?”
“वह मेरे लिए शक्ति हैं। साहस हैं। धैर्य हैं। और यह याद दिलाने वाली आवाज हैं कि औरत को कमजोर समझना सबसे बड़ी भूल है।”
“लेकिन माँ, औरतों को हर जगह लड़ना ही क्यों पड़ता है?”
अनामिका के चेहरे पर एक पल के लिए थकान उतर आई।
“क्योंकि समाज अभी भी पूरी तरह नहीं बदला है।”
“तो क्या समाज कभी बदलेगा?”
अनामिका ने बेटी का हाथ पकड़ लिया।
“बदलेगा। लेकिन सिर्फ इंतजार करने से नहीं। तुम्हें भी अपने हिस्से की रोशनी जलानी होगी।”
सिया ने धीरे से पूछा—
“और अगर डर लगे?”
अनामिका मुस्कुराई।
“तो डर के बावजूद सही काम करना। यही हिम्मत है।”
उस रात सिया देर तक माँ की बातों के बारे में सोचती रही। उसे पहली बार लगा कि माँ की पूजा सिर्फ पूजा नहीं थी। वह उनकी जिंदगी का सहारा थी।
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अनामिका पटना की एक निजी कंपनी में प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर के पद पर काम करती थी। वह मेहनती थी, समय की पाबंद थी और अपने काम को लेकर बहुत गंभीर रहती थी। कंपनी में कई लोग उसकी सलाह लेते थे, लेकिन उसकी मेहनत का श्रेय अक्सर कोई और ले जाता था।
कंपनी में उसका वरिष्ठ अधिकारी था—विक्रम शर्मा। विक्रम शर्मा की आदत थी कि वह दूसरों की मेहनत को अपनी उपलब्धि बनाकर पेश करता था।
एक दिन कंपनी में एक महत्वपूर्ण प्रेजेंटेशन होना था। अनामिका ने पिछले तीन सप्ताह से उस प्रोजेक्ट पर काम किया था। उसने आँकड़े जुटाए, रिपोर्ट तैयार की और पूरी योजना बनाई।
सुबह वह फाइल लेकर कॉन्फ्रेंस रूम में पहुँची।
विक्रम पहले से वहाँ मौजूद था।
“आइए, अनामिका जी,” उसने मुस्कुराकर कहा, “आज आपकी मेहनत का दिन है।”
अनामिका ने फाइल टेबल पर रख दी।
“जी सर। पूरी रिपोर्ट तैयार है।”
कुछ देर बाद कंपनी के बड़े अधिकारी भी कमरे में आ गए।
विक्रम ने लैपटॉप खोला और प्रेजेंटेशन शुरू कर दिया।
स्लाइड पर अनामिका की बनाई हुई योजना थी। आँकड़े भी वही थे। निष्कर्ष भी वही था।
लेकिन विक्रम ने कहीं भी उसका नाम नहीं लिया।
वह पूरे आत्मविश्वास से बोल रहा था—
“मैंने इस प्रोजेक्ट पर काफी मेहनत की है। पिछले कई दिनों से मैं इसकी तैयारी कर रहा था।”
अनामिका चुपचाप बैठी रही। उसका चेहरा शांत था, लेकिन भीतर बहुत कुछ टूट रहा था।
प्रेजेंटेशन खत्म हुआ। सभी अधिकारियों ने विक्रम की प्रशंसा की।
“बहुत अच्छा काम किया है, शर्मा जी।”
“आपकी टीम को आप पर गर्व होना चाहिए।”
विक्रम ने गर्व से सिर हिलाया।
अनामिका की ओर किसी ने देखा तक नहीं।
मीटिंग खत्म होने के बाद अनामिका अपनी फाइल लेकर बाहर निकलने लगी।
विक्रम ने उसे रोक लिया।
“अनामिका जी, जरा रुकिए।”
“जी?”
“आपको टीम में काम करना सीखना चाहिए। हर चीज का श्रेय लेने की आदत अच्छी नहीं होती।”
अनामिका ने उसकी ओर देखा।
“श्रेय लेने की बात आपने कही, सर?”
विक्रम का चेहरा बदल गया।
“आप कहना क्या चाहती हैं?”
“मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ कि जिस काम पर मैंने तीन सप्ताह लगाए, उसे अपना बताना सही नहीं है।”
“देखिए, आप मेरी टीम में काम करती हैं।”
“नौकरी आपकी कंपनी में है, सर। मेरी मेहनत मेरी है।”
विक्रम कुछ पल चुप रहा।
अनामिका ने आगे कहा—
“मैंने कभी आपके पद का सम्मान करने से इनकार नहीं किया। लेकिन अपने काम का अपमान भी नहीं सहूँगी।”
“आप मुझे सिखाएँगी कि ऑफिस कैसे चलता है?”
“नहीं सर। मैं सिर्फ यह याद दिला रही हूँ कि किसी की मेहनत पर अपना नाम लिख देने से वह मेहनत आपकी नहीं हो जाती।”
विक्रम ने धीमे स्वर में कहा—
“आपको अपनी नौकरी की चिंता करनी चाहिए।”
अनामिका ने उसकी आँखों में देखते हुए जवाब दिया—
“नौकरी आपकी कंपनी में है, मेरी इज्जत मेरे पास है।”
वह वहाँ से चली गई।
उस दिन पहली बार उसने महसूस किया कि डर और आत्मसम्मान के बीच खड़ा होना कितना कठिन होता है। लेकिन उसने यह भी समझ लिया था कि अगर आज वह चुप रही, तो कल उसकी चुप्पी दूसरों के लिए नियम बन जाएगी।
क्रमशः आगे.....
अब आगे क्या होगा.....
क्या अनामिका को ऑफिस से निकाल दिया जायेगा ?
सिया का क्या होगा, क्या वह अपनी मां के लिए कुछ कर पाएगी?
माँ दुर्गा की परम भक्तिन अनामिका को क्या उसकी मां मदद करेंगी?
पढ़िए अगले भाग में।
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