दस हाथों वाली माँ | भाग :- दूसरा | माँ दुर्गा की शक्ति और एक माँ के संघर्ष की भावुक कहानी | कुमार सरोज | किशोरवाणी |
💅 दस हाथ वाली मां
अभी तक आपने पढ़ा.......
अनामिका का बनाया हुआ प्रोजेक्ट उसका बॉस अपने नाम से कर लेता है। जब वह ऑफिस में आवाज उठाती है तो उसे नौकरी से निकालने की धमकी दी जाती है। फिर भी वह पीछे नहीं हटती है।
क्या सच में उसे नौकरी से निकाल दिया जायेगा?
फिर उसकी बेटी सिया के पढ़ाई का क्या होगा?
क्या मां दुर्गा उसकी मदद करेंगी?
पढ़िए इस भाग में......
दस हाथों वाली मां
( भाग - दूसरा )
✍️ कुमार सरोज
सिया कॉलेज में पढ़ती थी और सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय थी। वह मानती थी कि सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि अपनी बात रखने का माध्यम भी है।
एक दिन उसने देखा कि एक लड़की के बारे में सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की जा रही थीं। कुछ लोग उसकी तस्वीरों पर अभद्र बातें लिख रहे थे। सिया ने वह पोस्ट देखी तो उसे बहुत गुस्सा आया।
उसने लिखा—
“ किसी लड़की की तस्वीर पर गंदी टिप्पणी करना आपकी आजादी नहीं, आपकी सोच की गंदगी है। ”
उसकी पोस्ट तेजी से फैलने लगी।
कुछ लोगों ने उसका समर्थन किया, लेकिन कुछ लोगों ने उसे ट्रोल करना शुरू कर दिया।
किसी ने लिखा—
“बहुत बड़ी समाज सुधारक बन रही हो।”
किसी ने कहा—
“पहले अपने घर को संभालो, फिर दुनिया सुधारना।”
किसी ने उसकी तस्वीर पर टिप्पणी की।
सिया ने फोन बंद कर दिया।
लेकिन थोड़ी देर बाद फिर फोन उठाया। लगातार नोटिफिकेशन आ रहे थे।
उसकी दोस्त ने फोन किया।
“सिया, तुमने पोस्ट डिलीट क्यों नहीं कर दी?”
“क्यों करूँ?”
“लोग बहुत गंदा लिख रहे हैं।”
“तो क्या गंदा लिखने वालों की वजह से सही बात कहना छोड़ दूँ?”
“लेकिन डर नहीं लग रहा?”
सिया कुछ पल चुप रही।
“लग रहा है।”
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शाम को अनामिका ऑफिस से लौटी तो उसने सिया को चुप बैठे देखा।
“क्या हुआ?”
सिया ने फोन उसकी ओर बढ़ा दिया।
अनामिका ने सारी टिप्पणियाँ पढ़ीं।
“तुमने जवाब दिया?”
“हाँ।”
“किस तरह?”
“मैंने भी उन्हें जवाब दिया।”
अनामिका ने शांत स्वर में कहा—
“बेटी, हर लड़ाई जवाब देकर नहीं जीती जाती।”
“तो क्या चुप रहूँ?”
“नहीं। लेकिन समझदारी से कदम उठाओ।”
“माँ, अगर कोई गलत बात करे तो बोलना चाहिए।”
“बिल्कुल। लेकिन अपनी सुरक्षा का ध्यान रखकर।”
“मैं डरकर पीछे नहीं हटूँगी।”
“पीछे हटना और सही रणनीति अपनाना अलग बातें हैं।”
अनामिका ने फोन अपने हाथ में लिया।
“सबसे पहले स्क्रीनशॉट रखो। अकाउंट ब्लॉक करो। जरूरत हो तो रिपोर्ट करो। किसी भरोसेमंद व्यक्ति को बताओ। और अगर धमकी दी जा रही है, तो अकेले मत संभालना।”
सिया ने पूछा—
“माँ, क्या हर जगह लड़ना जरूरी है?”
“नहीं। लेकिन जहाँ तुम्हारी आवाज किसी कमजोर व्यक्ति को सहारा दे सकती है, वहाँ चुप रहना भी ठीक नहीं।”
“तो मैं क्या करूँ?”
“सच बोलो। लेकिन अपने विवेक के साथ।”
सिया ने माँ की ओर देखा।
“आपको कभी डर नहीं लगता?”
अनामिका मुस्कुराई।
“बहुत लगता है।”
“फिर आप लड़ती कैसे हैं?”
“डर को साथ लेकर।”
सिया ने फोन उठाया और उस लड़की को निजी संदेश भेजा—
“अगर तुम्हें मदद चाहिए, तो बताना। तुम अकेली नहीं हो।”
कुछ देर बाद जवाब आया—
“धन्यवाद। पहली बार लगा कि कोई मेरे साथ है।”
सिया की आँखें नम हो गईं। उस दिन उसने जाना कि सोशल मीडिया पर एक सही आवाज भी किसी के लिए सहारा बन सकती है। लेकिन उस आवाज को समझदारी और सुरक्षा के साथ उठाना जरूरी है।
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अनामिका का छोटा भाई रोहित अक्सर उससे मिलने आता था। रोहित की सोच पारंपरिक थी। वह अपनी बहन से बहुत प्यार करता था, लेकिन उसके विचारों में समाज की पुरानी धारणाएँ गहराई से बैठी थीं।
एक रविवार रोहित घर आया। अनामिका रसोई में चाय बना रही थी और सिया अपने कमरे में पढ़ रही थी।
रोहित ने कमरे में चारों ओर देखा।
“दीदी, आप अभी भी नौकरी कर रही हैं?”
अनामिका ने चाय का कप उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा—
“हाँ, क्यों?”
“अब सिया भी बड़ी हो गई है। घर पर ध्यान देना चाहिए।”
“घर पर तो ध्यान देती हूँ।”
“मेरा मतलब है कि नौकरी छोड़कर पूरी तरह घर संभाल लो।”
अनामिका कुछ पल चुप रही।
“और खर्चे?”
“मैं हूँ न।”
“तुम कब तक रहोगे?”
रोहित ने बात बदलने की कोशिश की।
“दीदी, मेरा मतलब गलत मत समझना। मैं तुम्हारी भलाई चाहता हूँ।”
“मुझे पता है।”
“लेकिन बाहर की नौकरी में रोज इतनी परेशानी होती है। कभी बॉस का दबाव, कभी ऑफिस की राजनीति। ऊपर से सिया की पढ़ाई।”
“इसीलिए तो नौकरी जरूरी है।”
“पैसे के लिए?”
“पैसे के लिए भी। और अपने लिए भी।”
रोहित ने हैरानी से देखा।
“अपने लिए?”
“हाँ, अपने लिए।”
“दीदी, परिवार से बढ़कर भी कुछ होता है क्या?”
अनामिका ने धीरे से कहा—
“परिवार से बढ़कर कुछ नहीं। लेकिन परिवार में औरत का अपना जीवन भी होता है।”
“आपको किस बात की कमी है? घर है, बेटी है, नौकरी है।”
“कमी की बात नहीं है, रोहित। पहचान की बात है।”
“पहचान तो माँ होने से है।”
“माँ होना मेरी सबसे बड़ी पहचान है। लेकिन सिर्फ माँ होना मेरी पूरी पहचान नहीं है।”
रोहित चुप हो गया।
अनामिका ने आगे कहा—
“मैं बेटी की माँ हूँ, बहन हूँ, बहू रही हूँ, कर्मचारी हूँ। लेकिन इन सबके बीच मैं खुद भी एक इंसान हूँ। मेरे सपने हैं, मेरी इच्छाएँ हैं, मेरा आत्मसम्मान है।”
“समाज क्या कहेगा?”
“समाज मेरे घर का खर्च नहीं उठाता।”
रोहित ने गहरी साँस ली।
“लोग बातें बनाते हैं।”
“लोगों का काम बातें बनाना है। मेरा काम अपना जीवन जीना है।”
“लेकिन औरत को घर और नौकरी दोनों संभालना कितना मुश्किल होता है।”
अनामिका हल्की मुस्कान के साथ बोली—
“इसीलिए तो कहती हूँ, औरत के हाथ सिर्फ दो होते हैं, लेकिन जिम्मेदारियाँ दस हाथों जितनी होती हैं।”
उसी समय सिया कमरे से बाहर आई।
“मामा, माँ नौकरी नहीं छोड़ेंगी।”
रोहित ने उसे देखा।
“तुम बीच में मत बोलो।”
सिया ने शांत स्वर में कहा—
“मैं बीच में नहीं बोल रही। मैं अपनी माँ के साथ खड़ी हूँ।”
अनामिका ने बेटी की ओर देखा।
रोहित कुछ देर तक दोनों को देखता रहा।
फिर बोला—
“ठीक है। लेकिन अगर कभी बहुत परेशानी हो तो बताना।”
अनामिका ने मुस्कुराकर कहा—
“तुम्हें बताऊँगी। लेकिन मेरी जिंदगी का फैसला मैं खुद करूँगी।”
रोहित ने सिर झुका लिया।
उस दिन घर की दीवारों के भीतर एक छोटा-सा सवाल खड़ा हुआ था—
क्या औरत की जिंदगी का फैसला हमेशा कोई और करेगा?
महीने का आखिरी सप्ताह था। अनामिका टेबल पर बैठकर घर का हिसाब कर रही थी। बिजली का बिल, किराने का खर्च, सिया की कॉलेज फीस, दवाइयाँ, घर का किराया और रोजमर्रा की जरूरतें—सब कुछ उसकी डायरी में दर्ज था।
उसने कैलकुलेटर पर हिसाब लगाया। फिर दोबारा लगाया। रकम वही थी। आमदनी से खर्च कुछ ज्यादा हो गया था।
सिया कमरे से बाहर आई।
“माँ, कॉलेज की फीस की आखिरी तारीख अगले हफ्ते है।”
“हाँ, बेटा। जमा हो जाएगी।”
“पक्का?”
“पक्का।”
“लेकिन आप परेशान लग रही हैं।”
अनामिका ने डायरी बंद कर दी।
“नहीं, बस थोड़ा हिसाब देख रही थी।”
सिया ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
“माँ, अगर फीस में दिक्कत है तो मैं कुछ दिन कॉलेज की अतिरिक्त क्लास छोड़ सकती हूँ।”
“बिल्कुल नहीं।”
“लेकिन…”
“तुम्हारी पढ़ाई नहीं रुकेगी।”
“आप सब अकेले कैसे संभालती हैं?”
अनामिका ने मुस्कुराने की कोशिश की।
“अकेले कहाँ संभालती हूँ? तुम साथ हो।”
सिया ने माँ को गले लगा लिया।
लेकिन उसी दिन ऑफिस में अनामिका को एक और झटका मिला।
विक्रम शर्मा ने उसे अपने कमरे में बुलाया।
“अनामिका जी, कंपनी में कुछ बदलाव हो रहे हैं।”
“जी सर।”
“कुछ प्रोजेक्ट बंद किए जा रहे हैं। कुछ पदों की समीक्षा होगी।”
“क्या मेरा पद भी?”
विक्रम ने कंधे उचकाए।
“कह नहीं सकता।”
“लेकिन मैंने पिछले प्रोजेक्ट पर बहुत काम किया है।”
“काम तो सभी करते हैं।”
“क्या मेरे खिलाफ कोई शिकायत है?”
“ऐसी कोई बात नहीं।”
“तो फिर?”
विक्रम ने ठंडी आवाज में कहा—
“कंपनी भावनाओं पर नहीं चलती। जरूरत के हिसाब से फैसले होते हैं।”
अनामिका समझ गई कि यह सिर्फ कंपनी का फैसला नहीं था। यह उसके आत्मसम्मान का जवाब था।
वह कमरे से बाहर आ गई।
उसकी आँखों के सामने सिया की फीस घूम रही थी।
घर का किराया, बिजली का बिल और आने वाला महीना—सब जैसे एक साथ उसके सामने खड़े थे।
शाम को घर लौटते समय वह पटना की सड़कों पर चलती रही।
गाड़ियों की आवाज, हॉर्न, भीड़ और ट्रैफिक के बीच उसे अपना जीवन बहुत छोटा और असहाय लगने लगा।
घर पहुँचकर उसने दरवाजा खोला।
सिया पढ़ रही थी।
“आ गईं माँ?”
“हाँ।”
“आज बहुत देर हो गई।”
“ऑफिस में काम था।”
सिया ने माँ का चेहरा देखा।
“कुछ हुआ है?”
“नहीं।”
“माँ, आप झूठ बोलते समय आँखों में नहीं देखतीं।”
अनामिका ने बैग रखा।
फिर धीरे से बोली—
“कंपनी में कुछ बदलाव हो रहे हैं। नौकरी को लेकर थोड़ी अनिश्चितता है।”
सिया कुछ पल चुप रही।
“आपकी नौकरी जा सकती है?”
“पता नहीं।”
“तो हम क्या करेंगे?”
अनामिका ने बेटी के कंधे पर हाथ रखा।
“जो होगा, मिलकर संभालेंगे।”
“लेकिन माँ…”
“सिया, जिंदगी में मुश्किलें आती हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हम टूट जाएँ।”
“आप डर नहीं रही हैं?”
अनामिका ने सच कहा—
“डर रही हूँ।”
“फिर?”
“फिर भी खड़ी हूँ।”
उस रात अनामिका ने खर्चों की डायरी फिर खोली। उसने कुछ अनावश्यक खर्च काटे। अपनी जरूरतें कम कीं। लेकिन सिया की पढ़ाई के सामने उसने कोई समझौता नहीं किया। क्योंकि उसके लिए बेटी की शिक्षा सिर्फ खर्च नहीं थी। वह बेटी के भविष्य की नींव थी।
क्रमशः आगे........
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