बिंदिया और बबलू :- अध्याय– 23 | हरिहर सिंह का अधूरा सच | हिंदी उपन्यास | कुमार सरोज | किशोरवाणी |





                👩‍❤️‍👩  बिंदिया और बबलू  👩‍❤️‍👩 


     अभी तक आपने पढ़ा......

               कभी-कभी अपराधी और गवाह के बीच फर्क सिर्फ इतना होता है कि दोनों में से कौन अपनी कहानी पहले सुनाता है।

            बबलू को आखिरकार उसकी बहन सुधा मिल गई। लेकिन खुशी के साथ एक नया रहस्य भी सामने आया।

                सुधा ने बताया कि उसे बचपन में दिनेश्वर सिंह ने पाला था और उससे भी बड़ा झटका तब लगा, जब उसने कहा—

“मुझे वहां भेजने वाला हरिहर सिंह था।”

          यानी रंजीत के पिता हरिहर सिंह भी बबलू के परिवार के पुराने रहस्य से गहराई से जुड़े थे।

         अब सवाल था—हरिहर सिंह ने सुधा को अपने घर क्यों रखा ?

क्या वह बबलू के परिवार का दुश्मन था या उसने किसी बड़ी साजिश से बच्चों को बचाने की कोशिश की थी?



      
             हरिहर सिंह का अधूरा सच 

                    ( अध्याय- 23 )

                                    ✍️  कुमार सरोज 


                      सुधा की बात सुनकर कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया, मानो किसी ने अचानक समय को रोक दिया हो।

रंजीत जमीन पर पड़े कागजों को देख रहा था। उसके चेहरे पर विश्वास और अविश्वास दोनों लड़ रहे थे।

“सुधा, तुम मेरे पिता को कैसे जानती थीं?”

सुधा ने उसकी ओर देखा।

“तुम्हारे पिता को नहीं, उनके घर को जानती थी।”

रंजीत की आवाज कांप गई।

“मेरे घर में तुम कितने साल रहीं?”

“तीन साल।”

“और मेरे पिता ने तुम्हें वहां क्यों रखा?”

सुधा ने नजरें झुका लीं।

“उन्होंने कहा था कि एक दिन तुम्हारे भाई तुम्हें लेने जरूर आएंगे।”

बबलू की आंखों में आंसू आ गए।

“उन्होंने ऐसा कहा था?”

सुधा ने सिर हिलाया।

“हां।”

बबलू ने धीरे से पूछा—

“फिर उन्होंने मुझे बताया क्यों नहीं कि तुम जिंदा हो?”

सुधा की आंखों में भी आंसू आ गए।

“क्योंकि शायद वह खुद नहीं जानते थे कि तुम कहां हो।”

रंजीत ने जेब से अपने पिता की पुरानी तस्वीर निकाली। सुधा ने तस्वीर देखते ही उसे हाथ में ले लिया। कुछ क्षण वह तस्वीर को देखती रही। फिर उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे।

“यही थे...। ”

रंजीत ने पूछा—

“क्या?”

“इन्होंने मुझे पहली बार खाना खिलाया था।”

रंजीत स्तब्ध रह गया।

सुधा बोली—

“उस समय मैं बहुत छोटी थी। मुझे यह भी नहीं मालूम था कि मेरा अपना परिवार कौन है। तुम्हारे पिता मुझे बेटी की तरह रखते थे।”

          रंजीत ने सिर झुका लिया। उसके भीतर वर्षों से पिता के प्रति जो गर्व था, उसमें पहली बार एक नई रोशनी जुड़ गई।

“तो मेरे पिता बुरे आदमी नहीं थे?”

बबलू ने उसकी ओर देखा।

“शायद नहीं।”

रंजीत की आंखें नम हो गईं।

“मैंने भी उन्हें कभी ठीक से समझने की कोशिश नहीं की।”

बिंदिया ने शांत स्वर में कहा—

“किसी इंसान को समझने के लिए उसकी मौत के बाद उसकी तस्वीर देखना काफी नहीं होता। उसकी जिंदगी के बंद दरवाजे भी खोलने पड़ते हैं।”

सुधा अचानक उठी।

“मेरे पास कुछ है।”



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              वह अपने कपड़ों की छोटी-सी गठरी खोलने लगी। उसमें से उसने एक पुराना कपड़े का टुकड़ा निकाला। उसमें लिपटी थी एक छोटी-सी पीतल की चाबी।

बबलू ने पूछा—

“यह किसकी चाबी है?”

सुधा बोली—

“मुझे नहीं पता।”

“तुम्हें यह किसने दी?”

“दिनेश्वर सिंह ने।”

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

रंजीत ने तुरंत पूछा—

“उन्होंने तुम्हें यह कब दी?”

सुधा ने कहा—

“जब मैं वहां से जा रही थी।”

“और क्या कहा था?”

सुधा कुछ क्षण चुप रही।

फिर बोली—

“उन्होंने कहा था—जब तुम्हें अपने दोनों भाइयों में से कोई मिल जाए, तब यह चाबी उसे देना।”

बबलू ने चाबी अपने हाथ में ले ली।

“दोनों भाई?”

सुधा ने उसकी ओर देखा।

“उन्होंने यही कहा था।”

रंजीत ने धीरे से पूछा—

“लेकिन तुम्हें कैसे पता था कि तुम्हारे भाई जिंदा हैं?”

सुधा ने कहा—

“मुझे नहीं पता था।”

फिर वह मुस्कुराई।

“लेकिन दिनेश्वर सिंह को पता था।”

बबलू बेचैन हो उठा।

“अगर दिनेश्वर सिंह को मेरे बारे में पता था, तो उन्होंने मुझे खोजा क्यों नहीं?”

शर्मा बाबू, जो अब तक चुप बैठे थे, पहली बार बोले—

“क्योंकि शायद वह तुम्हें खोज नहीं रहे थे।”

बबलू ने उनकी ओर देखा।

“तो?”

शर्मा बाबू ने कहा—

“वह यह देख रहे थे कि तुम कब अपने अतीत तक पहुंचते हो।”

बिंदिया ने पूछा—

“लेकिन क्यों?”

शर्मा बाबू बोले—

“क्योंकि कुछ रहस्य ऐसे होते हैं जिन्हें छिपाकर रखना मुश्किल होता है। इसलिए अपराधी कभी-कभी इंतजार करता है कि सच खुद उसके पास आए।”

महेश, जो दरवाजे के पास चुपचाप सब सुन रहा था, अचानक बोला—

“तो क्या हम इतने दिनों से सच को ढूंढ़ रहे थे और सच खुद हमको ढूंढ़ रहा था?”

बबलू ने उसकी ओर देखा।

“पहली बार तूने काम की बात कही है।”

महेश मुस्कुराया।

“भईया, हम कभी-कभी काम की बात भी कर देते हैं। बस लोग नोटिस नहीं करते।”

बिंदिया हंस पड़ी।

तनाव भरे कमरे में कुछ पल के लिए हंसी लौट आई।

                बबलू ने चाबी को गौर से देखा। उस पर एक छोटा-सा निशान बना था—

कमल के भीतर ‘S’

बिंदिया तुरंत बोली—

“यही निशान..    !”

रंजीत ने पूछा—

“कहां?”

“सहयोग मंडल के पुराने कागजात पर।”

शर्मा बाबू ने चाबी देखते ही गहरी सांस ली।

“तो आखिर वह चाबी अभी तक बची हुई थी।”

बबलू ने पूछा—

“आप जानते हैं यह किसकी है?”

शर्मा बाबू ने कहा—

“हां।”

“किसकी?”

“तुम्हारे पिता की पुरानी हवेली में बने तहखाने की।”

बबलू चौंक पड़ा।

“तहखाना?”

शर्मा बाबू ने कहा—

“तुम्हारे पिता ने उसे बनवाया था। लेकिन उसके बारे में बहुत कम लोग जानते थे।”

रंजीत तुरंत बोला—

“मेरे पिता जानते थे?”

शर्मा बाबू ने उसकी ओर देखा।

“हां।”

रंजीत की सांस अटक गई।



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                    अगली सुबह बबलू, बिंदिया, रंजीत, सुधा और शर्मा बाबू मंझार गढ़ की ओर निकल पड़े। मंझार गांव का इतिहास बहुत पुराना है। अंग्रेजों के समय पहले यह गढ़ हुआ करता था। मंझार गढ़। गांव के बाहर आम के पुराने बगीचे के बगल में अभी भी बहुत सारे पुराने किले और महल के अवशेष थे। 

         सभी के पीछे चुपके से महेश भी चल पड़ा। मगर बबलू ने उसे देखा।

“तुम यहां क्यों आए?”

महेश बोला—

“भईया, गांव में कोई रहस्य हो और हम न रहें, ऐसा कैसे हो सकता है?”

बिंदिया हंसते हुए बोली—

“तुम रहस्य सुलझाने जा रहे हो या तमाशा देखने?”

महेश ने कहा—

“दोनों में ज्यादा अंतर नहीं है।”

रंजीत पहली बार खुलकर हंसा।

“महेश, तुम सही जगह पैदा हुए हो।”

महेश बोला—

“हमको भी यही लगता है। बस घर वाले गलत जगह समझते हैं।”

                मंझार गढ़ के पीछे एक टूटी हुई ऊँची  दीवार के पास आकर बबलू रुक गया। उसे इतना पता था कि पहले यही उसके पुरखों की हवेली थी। जो अब जर्जर हो गई थी। 

       सभी के रुकते ही सुधा ने चाबी अपने भाई की ओर बढ़ा दी।

        दीवार के नीचे पत्थरों के बीच लोहे का एक छोटा-सा ताला लगा था। जो ढूंढने पर मिल गई।

बबलू ने चाबी लगाई।

क्लिक!

ताला खुल गया।

दरवाजा धीरे-धीरे नीचे की ओर खुला।

अंदर अंधेरा था।

रंजीत ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

सभी धीरे-धीरे नीचे उतरने लगे।

दीवारों पर पुराने निशान बने थे।

एक जगह लिखा था—

“जिसे बचाना हो, उसके लिए अपना नाम मिटाना पड़ता है।”

बबलू उस वाक्य को पढ़कर ठिठक गया।

बिंदिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“यह आपके पिता ने लिखा होगा।”

बबलू बोला—

“शायद।” 

              तहखाने के आखिरी कमरे में एक बड़ा लोहे का संदूक रखा था। उस पर वही कमल का निशान था।

शर्मा बाबू ने कहा—

“यही है।”

बबलू ने संदूक खोलने की कोशिश की।

लेकिन ताला बंद था।

सुधा ने अपनी दूसरी जेब से एक छोटा कागज निकाला।

उस पर चार अंक लिखे थे—

1—9—9—8

रंजीत ने कहा—

“यह वर्ष है।”

बबलू ने ताले में अंक मिलाए।

क्लिक!

संदूक खुल गया।

अंदर कागजों का ढेर था।

पुरानी तस्वीरें।

जमीन के दस्तावेज।

और एक मोटी फाइल।

बिंदिया ने फाइल उठाई।

पहले पन्ने पर लिखा था—

“सहयोग मंडल — अंतिम समझौता”

रंजीत ने पढ़ना शुरू किया।

लेकिन दूसरे ही पन्ने पर उसकी आंखें फैल गईं।

“यह क्या है?”

बबलू ने पूछा—

“क्या हुआ?”

रंजीत ने कागज उसकी ओर बढ़ा दिया।

उस पर लिखा था—

“यदि किसी कारण से अमित और अंकित अलग हो जाएं, तो उनकी संपत्ति और संस्था की जिम्मेदारी तीसरे संरक्षक के पास रहेगी।”

बिंदिया ने पूछा—

“तीसरा संरक्षक कौन था?”

नीचे नाम लिखा था—

हरिहर सिंह।

रंजीत जैसे जम गया।

रंजीत ने कांपती आवाज में कहा—

“मेरे पिता, इन दोनों की संपत्ति के संरक्षक थे?”

शर्मा बाबू ने सिर झुका लिया।

“हां।”

रंजीत ने पूछा—

“तो फिर उन्होंने सब कुछ क्यों नहीं बताया?”

शर्मा बाबू बोले—

“क्योंकि उन्होंने वचन दिया था।”

“किससे?”

शर्मा बाबू ने धीरे से कहा—

“तुम्हारे पिता से।”

रंजीत की आंखें भर आईं।

“तो मेरे पिता ने बबलू को कभी धोखा नहीं दिया?”

शर्मा बाबू ने कहा—

“उन्होंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा राज छिपाकर रखा था।”

बबलू चुप खड़ा था।

फिर उसने धीरे से कहा—

“और हम उन्हें दुश्मन समझते रहे।”


बिंदिया फाइल के आखिरी पन्ने पलट रही थी।

अचानक उसके हाथ रुक गए।

“बबलू..।.”

बबलू उसके पास आया।

पन्ने के नीचे एक नाम लिखा था।

“अगला संरक्षक — सुधा।”

सुधा के हाथ से लालटेन लगभग छूट गई।

“मैं?”

बबलू ने उसे देखा।

“लेकिन तुम तो...। ”

सुधा की आंखों में आंसू थे।

“मुझे कुछ नहीं पता।”

बिंदिया ने कागज को ध्यान से देखा।

उसके नीचे एक और पंक्ति थी—

“जब तीनों बच्चे फिर एक साथ होंगे, तभी यह अधिकार सक्रिय होगा।”

रंजीत ने पूछा—

“तीनों?”

बबलू की नजर सुधा पर गई।

फिर उसने धीरे से कहा—

“मैं... अंकित... और सुधा।”

           तभी तहखाने के बाहर किसी चीज के गिरने की तेज आवाज आई।

सभी चौंक गए।

महेश लालटेन लेकर बाहर भागा।

“कोई है!”

कुछ क्षण बाद वह वापस आया।

उसके हाथ में एक पुराना कपड़ा था।

उस कपड़े पर खून का छोटा-सा निशान था।

और उसके साथ एक कागज।

बबलू ने कागज खोला।

उस पर लिखा था—

“तुमने तहखाना खोलकर सबसे बड़ी गलती कर दी है। अब अगला नंबर अंकित का है।”

बबलू का चेहरा सख्त हो गया।

“अंकित..। .”

सुधा रो पड़ी।

रंजीत ने मुट्ठी भींच ली।

            और बिंदिया ने पहली बार बबलू की आंखों में ऐसा संकल्प देखा, जैसा उसने पहले कभी नहीं देखा था।

“अब हम अपने भाई को खोजेंगे।”

बबलू ने दृढ़ स्वर में कहा—

“और इस बार उसे हमसे कोई अलग नहीं कर पाएगा।”


                           🔥 क्रमशः आगे...


अगले अध्याय में...

अंकित आखिर कहां है?
क्या वह अब भी जिंदा है?
कौन चाहता है कि तीनों भाई-बहन फिर कभी एक साथ न हों?
और तहखाने में मिले दस्तावेज क्या दिनेश्वर सिंह के खिलाफ वह सबूत हैं, जिसका रंजीत इतने दिनों से इंतजार कर रहा था?

लेकिन सबसे बड़ा सवाल—
अगर हरिहर सिंह ने बबलू के परिवार की रक्षा की थी, तो फिर दिनेश्वर सिंह ने उसे अपना दुश्मन क्यों बनाया?
  
                     📖💌📖 बिंदिया और बबलू   उपन्यास के यदि आपने अभी तक पीछे का अध्याय नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। ग्रामीण परिवेश की बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली रहस्यमयी कहानी है। 

            पीछे के अध्याय को पढ़ने के लिए नीचे लिखे उपन्यास के शीर्षक पर क्लिक कीजिए -





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