बिंदिया और बबलू : अध्याय 2 | नई बहू और पहली साज़िश | गाँव, प्यार और रहस्य से भरा हिंदी उपन्यास / bindiya-aur-babalu-chapter-2-nayi-bahu-aur-pehli-sazish-hindi-novel






              👩‍❤️‍👩   बिंदिया और बबलू   👩‍❤️‍👩



                    बबलू और उसकी पत्नी बिंदिया के मंझार गांव पहुँचते ही पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ जाती है। अगले दिन सुबह से ही नई नवेली बहू को देखने के लिए महिलाओं और बच्चों का तांता लग जाता है। बिंदिया अपनी सादगी और संस्कारों से सबका दिल जीत लेती है।

उधर बबलू गांव के सरपंच के सामने बच्चों को निःशुल्क पढ़ाने का प्रस्ताव रखकर सबकी वाहवाही बटोर लेता है। लेकिन गांव वालों को यह नहीं पता कि जिस बबलू को वे सबसे बड़ा विद्वान समझते हैं, वह खुद ठीक से पढ़ा-लिखा नहीं है।

इधर योगेश और झोला छाप डॉक्टर सुजीत किसी तरह बिंदिया भाभी के दर्शन करने की कोशिश में लगे हैं, तो उधर रंजीत और उसके साथी बबलू का भेद खोलने की नई चाल चल रहे हैं।


क्या बबलू का राज सबके सामने आ जाएगा ?

क्या रंजीत अपनी योजना में सफल होगा ?

और क्या बिंदिया अपने पति की इज्जत बचा पाएगी ?

             जानिए "बिंदिया और बबलू" के दूसरे अध्याय में।





           
       👩‍❤️‍👩  नई बहू और पहली साज़िश  👩‍❤️‍👩

                       (अध्याय – 2 )       

                                         ✍️  किशोर 



                      ढोल नगाड़ों की आवाज़ धीरे-धीरे थम चुकी थी, लेकिन गाँव का उत्साह अभी भी कम नहीं हुआ था। नाचते-गाते लोग बबलू और बिंदिया के साथ उसके घर तक पहुँच चुके थे।

घर के दरवाजे पर जानकी पहले से ही आरती की थाली सजाकर खड़ी थी। थाली में जलता हुआ दीपक, रोली और अक्षत रखे थे।

जैसे ही बबलू और बिंदिया रिक्शे से उतरे, जानकी ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बहू की आरती उतारी।

उधर गाँव की औरतें मंगल गीत गाने लगीं—

"आइल बाड़ी शहर से बहुरिया हो.. .........."


        बैंड वाले भी उसी लय में विवाह का धुन बजाने लगे।

बिंदिया ने झुककर जानकी के पैर छुए।

जानकी ने उसके सिर पर हाथ रखा, मगर मन के भीतर उठ रही जलन को वह छुपा नहीं पा रही थी।

"खुश रहो बहू..."

बस इतना ही कह सकी।

उधर महेश तो मानो आसमान में उड़ रहा था।

"आइए भाभी, ई आपका घर है।"

वह गर्व से सीना फुलाकर बोला।

कुछ देर बाद गाँव वाले कानाफूसी करते हुए अपने-अपने घर लौटने लगे।

लेकिन जाते-जाते भी हर कोई एक बार मुड़कर बिंदिया को जरूर देख रहा था।

गाँव में इतनी सुंदर और पढ़ी-लिखी बहू शायद पहली बार आई थी।



पिछली शाम मंझार गाँव में किसी मेले से कम नहीं थी। ढोल, मंजीरे, शहनाई और लोगों की हँसी देर रात तक गाँव की गलियों में गूँजती रही थी।

बबलू अपनी नई नवेली पत्नी बिंदिया को लेकर घर आ चुका था। गाँव वाले उसे देखकर ऐसे प्रसन्न थे, मानो किसी परदेश गए बेटे की बरसों बाद वापसी हुई हो।

रात बीत गई, लेकिन लोगों के मन का उत्साह नहीं बीता।

सुबह होते-होते बबलू के घर का आँगन औरतों से भर गया।

गाँव की स्त्रियों का स्वभाव भी बड़ा विचित्र होता है। जहाँ कोई नई बहू आए, वहाँ उनका कौतूहल किसी मेले के बच्चे से कम नहीं होता।

कोई कहती—

"सुना है बहुत पढ़ी-लिखी है।"

दूसरी जवाब देती—

"पढ़ी-लिखी होगी तभी तो बबलू जैसे होनहार लड़के से ब्याह हुआ है।"

तीसरी धीरे से फुसफुसाती—

"रूप भी देखना है उसका।"

आँगन में एक चौकी बिछी थी।

उस पर बिंदिया सिर पर आँचल डाले बैठी थी।

चेहरे पर शहर की नफासत थी, लेकिन आँखों में गाँव की बहुओं जैसी विनम्रता।

जो भी औरत आती, वह उठकर उसके पैर छू लेती।

यही बात लोगों को सबसे अधिक भा रही थी।

"देखो तो, शहर में पली-बढ़ी होकर भी कितनी संस्कारी है।"

एक बूढ़ी औरत ने कहा।

"आजकल की लड़कियाँ कहाँ पैर छूती हैं!"

दूसरी ने हामी भरी।

पास ही महेश चौकीदार की तरह खड़ा था।

ऐसा लगता था जैसे पूरा गाँव नहीं, बल्कि कोई राजा-महाराजा की रानी आई हो और उसकी सुरक्षा का जिम्मा उसी के कंधों पर हो।

तेतरी चाची जब आँगन में पहुँचीं तो महेश को देखकर मुस्कुरा उठीं।

"का रे महेसवा, बहुरिया के रखवाला बन गया है क्या ?"

महेश गर्व से बोला—

"चाची, अब हम भाभी के बॉडीगार्ड हैं।"

आँगन ठहाकों से गूँज उठा।

तेतरी चाची ने सौ रुपये निकालकर बिंदिया की हथेली पर रखे और आशीर्वाद देते हुए बोलीं—

"दूधो नहाओ, पूतो फलो बेटी।"

फिर महेश की ओर देखकर बोलीं—

"और तू इनके संग-संग रहना। शायद कुछ अकल ही आ जाए।"

महेश ने तुरंत जवाब दिया—

"चाची, अकल तो बहुत है। बस लड़की नहीं मिल रही।"

इस बार हँसी का फव्वारा और जोर से फूटा।

उधर जानकी यह सब देख रही थी।

चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन मन में हिसाब-किताब चल रहा था।

उसे बहू से नहीं, बहू के आने से होने वाले नुकसान से परेशानी थी।

अब तक खेत का सारा अनाज उसके घर आता था।

अब बबलू आ गया था।

हिस्सेदारी की बात भी उठेगी।

और हिस्सेदारी से बड़ा दुःख किसान की गृहस्थी में दूसरा नहीं होता।

जानकी की आँखें बार-बार बिंदिया की ओर उठ जातीं।

उसे लग रहा था, यह शहर की लड़की सिर्फ घर में नहीं आई है, बल्कि उसके वर्षों पुराने आराम में भी हिस्सा लेने आई है। 


उधर बबलू सुबह-सुबह ही सरपंच साहब के दरवाजे पर जा पहुँचा था।

गाँव के कई बुजुर्ग वहाँ बैठे थे।

सरपंच ने हुक्का पीते हुए लंबी साँस भरते हुए कहा—

"बबलू, गाँव के लड़कों का पढ़ाई में मन ही नहीं लगता। इस साल भी आधे बच्चे मैट्रिक में फेल हो गए।"

बबलू ने गंभीर चेहरा बनाया।

"चाचा, अब चिंता छोड़ दीजिए। जब तक बबलू जिंदा है, गाँव का कोई बच्चा अनपढ़ नहीं रहेगा।"

सभी प्रभावित होकर उसकी तरफ देखने लगे।

सरपंच की आँखें चमक उठीं।

"सच कह रहे हो बेटा?"

"हाँ चाचा। अब हम गाँव छोड़कर कहीं नहीं जाने वाले।"

यह सुनते ही लोगों के चेहरे खिल उठे।

बबलू ने आगे कहा—

"कल से पुस्तकालय में बच्चों के लिए निःशुल्क पढ़ाई शुरू होगी।"

भीड़ में बैठे लोग खुशी से एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।

किसी को क्या पता था कि जो आदमी पूरे गाँव को पढ़ाने की बात कर रहा है, वह खुद ठीक से पढ़ना भी नहीं जानता है। 


         उधर योगेश सुबह से नहा-धोकर नई शर्ट पहनकर दुकान पर बैठा था।

लेकिन उसका ध्यान ग्राहकों पर नहीं, बबलू के घर पर था।

हर पाँच मिनट बाद वह उठता, बबलू के दरवाजे तक जाता और फिर वापस अपने दुकान पर लौट आता।

    इतने में सुजीत भी अपनी साइकिल से क्लीनिक पर आ जाता है। 

"का योगेश भाई इंतजार कर रहे हो भाभी के दर्शन का ?"

योगेश ने दुखी स्वर में कहा—

"सुबह से बैठे हैं। मगर औरतों की भीड़ खत्म ही नहीं हो रही।"

सुजीत मुस्कुराया।

"चिंता मत करो। डॉक्टर आ गया है।"

उसने झोले से एक आई ड्रॉप निकाला।

"ई स्पेशल दवा है। आँख में डालते ही सब साफ दिखाई देगा।"

योगेश खुशी से बोला—

"जल्दी डालो!"

कुछ ही देर बाद दोनों सज-धजकर बबलू के घर की तरफ बढ़े। लेकिन उन्हें क्या पता था कि महेश नाम का एक पहाड़ उनके रास्ते में खड़ा है। 

 जैसे ही योगेश और सुजीत बबलू के घर के पास गए, ठीक तभी घर के अंदर से महेश बाहर निकला। वह दोनों को तुरंत वहां से भगा देता है। 

दोनों महेश को मन ही मन गाली देते हुए बुझे दिल से वापस चल पड़ता है ।


उधर नदी किनारे रंजीत अपने साथियों के साथ बैठा था। चिलम का धुआँ हवा में तैर रहा था। लेकिन आज उसके मन में सिर्फ एक ही नाम घूम रहा था -  बिंदिया।

 वही बिंदिया, जिसे उसने कभी अपने सपनों की रानी समझा था। और आज उसी के गांव में उसके दुश्मन की बीबी बनकर आ गई थी। 

उसने दाँत पीसते हुए कहा—

"बबलू से हम हार नहीं सकते।"

किसन ने धीरे से कहा—

"हारोगे भी नहीं।"

"कैसे ?"

 किसन की आँखों में चालाकी चमक उठी।

" दिनेश बोल रहा था कि आज शाम पुस्तकालय में मीटिंग है ? " 

"हाँ है तो।"

"सबके सामने बबलू को बच्चों का शिक्षक बना देना।"

कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया।

फिर रंजीत के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।


रंजीत ने चिलम का आखिरी कश लिया और मुस्कुराया।

"कल तक पूरा गाँव बबलू को विद्वान समझता था..."
"अब वही गाँव उसकी असलियत देखेगा।"

 सुनकर सभी हंसने लगे। 

"और जब बबलू का पूरे गांव के सामने उसकी असलियत आएगी तो वह किसी को मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहेगा। .." 

  रंजीत चिलम से गांजा का कस लगाते हुए बोला। 

  "तो बिंदिया भी उससे दूर हो जाएगी।"

  किसन मुस्कुराते हुए बोला। 

    कुछ सोचकर रंजीत की आँखों में एक खतरनाक चमक उभर आई। 

        सभी मन ही मन अभी से ही खुशियां मनाते हुए जुआ खेलने लगे। 




                                    क्रमश आगे ...



अगले भाग में

● क्या पुस्तकालय की बैठक में बबलू खुद अपने जाल में फंस जाएगा?

● क्या रंजीत गांव वालों के सामने बबलू को शिक्षक बनाने की मांग करेगा?

● क्या बिंदिया और रंजीत आमने-सामने आएंगे?

● क्या बबलू की सच्चाई सामने आने वाली है?


  पढ़ते रहिए—

"बिंदिया और बबलू"
"जहाँ प्यार के पीछे छुपे हैं कई राज..."

        केवल "किशोरवाणी" पर।


          बिंदिया और बबलू  उपन्यास का पहला अध्याय आपने यदि अभी तक नहीं पढ़ा तो उसे आप एक बार जरूर पढ़िए। 

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