बिंदिया और बबलू :- अध्याय – 22 | तीसरे बच्चे का रहस्य | हिंदी उपन्यास | कुमार सरोज | किशोरवाणी |
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कभी-कभी अतीत का कोई चेहरा अचानक सामने नहीं आता, वह पहले किसी निशान के रूप में लौटता है… फिर किसी नाम के रूप में और अंत में पूरी जिंदगी का सच बनकर खड़ा हो जाता है।
पुरानी तस्वीर में बबलू और उसके भाई अंकित के साथ एक तीसरा बच्चा दिखाई दिया। उसके पीछे लिखा था—
“हम तीनों को अलग मत करना।”
बबलू को तस्वीर में बने कमल के निशान से शर्मा बाबू के पुराने कागजात की याद आई। शर्मा बाबू ने बताया कि यह निशान ‘सहयोग मंडल’ नाम के एक संगठन का था, जिसके संस्थापक बबलू के पिता थे।
लेकिन सबसे बड़ा रहस्य अभी बाकी था—
तीसरा बच्चा कौन था?
इसी बीच बबलू को एक रहस्यमय संदेश मिला—
“जिस तीसरे बच्चे को तुम खोज रहे हो, वह तुम्हारे बहुत करीब है।”
तीसरे बच्चे का रहस्य
( अध्याय- 22 )
✍️ कुमार सरोज
शर्मा बाबू के कमरे में कुछ देर तक सन्नाटा पसरा रहा।
बबलू ने लिफाफा हाथ में पकड़े हुए पूछा—
“शर्मा बाबू, यह किसने भेजा?”
शर्मा बाबू ने सिर झुका लिया।
“जिसने भेजा है, वह तुमसे ज्यादा तुम्हारे अतीत को जानता है।”
बिंदिया ने तुरंत कहा—
“और शायद वह यह भी जानता है कि हम सच के कितने करीब पहुंच चुके हैं।”
शर्मा बाबू ने उसकी ओर देखा।
“तुम बहुत समझदार हो, बिंदिया।”
बिंदिया मुस्कुराई।
“शादी के बाद समझदार होना जरूरी हो जाता है। वरना पति की आधी बातें समझने में ही उम्र निकल जाए।”
बबलू हंस पड़ा।
“मेरी आधी बातें समझती हो?”
“हां।”
“बाकी आधी?”
“उन्हें समझने की जरूरत ही नहीं पड़ती। आपके चेहरे पर पहले ही लिखी रहती हैं।”
शर्मा बाबू भी मुस्कुरा दिए।
लेकिन अगले ही क्षण उनका चेहरा फिर गंभीर हो गया।
“मजाक अपनी जगह है, मगर अब खतरा पहले से बड़ा है।”
बबलू ने पूछा—
“तीसरा बच्चा कौन था?”
शर्मा बाबू ने कुछ देर तक चुप रहने के बाद कहा—
“तुम दोनों से जुड़ा था।”
“भाई?”
“नहीं।”
बिंदिया ने पूछा—
“बहन?”
शर्मा बाबू ने सिर हिलाया।
“हां।”
बबलू जैसे पत्थर का हो गया।
“मेरी... बहन?”
शर्मा बाबू ने धीमे स्वर में कहा—
“तुम्हारे पिता के परिवार में एक बच्ची थी। उसका नाम था—सुधा।”
बबलू की आंखों में बेचैनी उतर आई।
“मुझे कभी किसी सुधा के बारे में क्यों नहीं बताया गया?”
शर्मा बाबू ने कहा—
“क्योंकि तुम्हारे पिता ने तुम्हारी सुरक्षा के लिए तुम्हारे परिवार की पूरी पहचान ही बदल दी थी।”
बिंदिया ने पूछा—
“सुधा अब कहां है?”
शर्मा बाबू ने उत्तर नहीं दिया।
बबलू ने बेचैनी में कहा—
“आपको पता है वह कहां है?”
शर्मा बाबू ने धीमे से कहा—
“शायद।”
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उधर रंजीत और दिनेश पुराने कुएं से मिले कागजों को लेकर घर लौट रहे थे। मगर घर लौटने के पहले दिनेश के कहने पर रंजीत मेन का प्रसिद्ध महादेव मंदिर कोटेश्वर नाथ धाम का दर्शन करने के लिए मंदिर की ओर चल देता है।
कोटेश्वर नाथ धाम मंदिर मेन का बहुत ही प्राचीर मंदिर था। लोग दूर दूर से भगवान महादेव के विशाल प्रतिमा को देखने आते थे।
मंदिर की ओर चलते हुए रास्ते में दिनेश ने कहा—
“रंजीत भईया, एक बात समझ में नहीं आ रही।”
“क्या?”
“अगर तीसरा बच्चा लड़की थी तो वह अब कहां है?”
रंजीत ने कहा—
“यही तो पता करना है।”
दिनेश कुछ देर सोचता रहा।
फिर अचानक बोला—
“क्या हो सकता है कि वह लड़की मरी ही न हो?”
रंजीत रुक गया।
“तुम कहना क्या चाहते हो?”
“हो सकता है वह कहीं और पलकर बड़ी हुई हो।”
रंजीत ने उसकी ओर देखा।
“और अगर वह जिंदा है?”
दिनेश बोला—
“तो बबलू की पूरी जिंदगी बदल जाएगी।”
रंजीत ने कहा—
“और शायद हमारी भी।”
दोपहर तक गांव में खबर फैल गई कि बबलू के परिवार से जुड़ा कोई पुराना रहस्य सामने आया है।
तेतरी चाची को जैसे नया विषय मिल गया।
वह जानकी के पास जा बैठी।
“बहन, तुमको कुछ पता है?”
जानकी ने पूछा—
“किस बात का?”
“यही कि बबलू के परिवार में कोई तीसरा बच्चा भी था।”
जानकी चौंक गई।
“कौन तीसरा बच्चा?”
तेतरी चाची ने रहस्यमय अंदाज में आवाज धीमी की—
“अरे वही... लड़की!”
जानकी ने कहा—
“तुम्हें किसने बताया?”
तेतरी चाची ने गर्व से कहा—
“गांव में खबर छिपती है क्या? हवा भी यहां से गुजरती है तो पहले हमसे पूछकर जाती है।”
पास बैठा महेश बोल पड़ा—
“चाची, हवा अगर आपसे पूछकर चलती है तो गांव में इतनी गर्मी क्यों है?”
तेतरी चाची ने उसे घूरा।
“तुम बीच में मत बोलो।”
महेश मुस्कुराया—
“हम तो गांव की हवा का हाल बता रहे थे।”
जानकी हंसी रोक नहीं पाई।
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शाम को बिंदिया हमेशा की तरह रात्रि पाठशाला पहुंची। गांव के बच्चे और बड़े धीरे-धीरे इकट्ठा होने लगे।
महेश अपनी कॉपी लेकर सबसे आगे बैठ गया।
सुजीत ने उसे देखते ही कहा—
“आज सूरज पश्चिम से निकला है क्या?”
महेश बोला—
“क्यों?”
“तुम खुद पढ़ने आ गए?”
महेश ने कहा—
“भाभी पढ़ाती हैं, तो पढ़ने में नुकसान क्या है?”
योगेश तुरंत बोला—
“नुकसान यह है कि पढ़ाई के बाद तुम्हारा दिमाग इस्तेमाल करना पड़ेगा।”
महेश ने उसकी ओर देखा।
“और तुम्हारा दिमाग?”
योगेश बोला—
“हमारा दिमाग तो पहले से चलता है।”
महेश ने कहा—
“किधर चलता है?”
योगेश चुप हो गया।
पूरी पाठशाला हंसी से गूंज उठी।
बिंदिया भी मुस्कुरा दी।
लेकिन तभी उसकी नजर दरवाजे पर खड़ी एक अनजान लड़की पर पड़ी। लड़की चुपचाप सबको देख रही थी।
बिंदिया उसके पास गई।
“आपको कुछ चाहिए?”
लड़की ने धीरे से कहा—
“मैं भी पढ़ना चाहती हूं।”
बिंदिया ने मुस्कुराकर कहा—
“तो अंदर आइए।”
लड़की अंदर आकर सबसे पीछे बैठ गई। उसका चेहरा साधारण था, मगर आंखों में एक अजीब-सी बेचैनी थी।
कुछ देर बाद बबलू भी पाठशाला में आ गया। उसकी नजर जैसे ही उस लड़की पर पड़ी, वह कुछ क्षण के लिए रुक गया।
लड़की ने भी बबलू को देखा।
दोनों की आंखें मिलीं। लड़की के हाथ से कॉपी नीचे गिर गई।
“क्या हुआ?” बिंदिया ने पूछा।
लड़की ने तुरंत कॉपी उठा ली।
“कुछ नहीं।”
बबलू उसे लगातार देख रहा था। उसे पता नहीं क्यों उस लड़की के चेहरे में कुछ जाना-पहचाना लग रहा था।
वह धीरे से बिंदिया के पास आया।
“तुम इसे पहले से जानती हो?”
बिंदिया ने कहा—
“नहीं। आज पहली बार आई है।”
बबलू ने फिर लड़की की ओर देखा।
“लेकिन इसकी आंखें...। ”
बिंदिया ने पूछा—
“क्या?”
बबलू कुछ बोल नहीं पाया।
पाठशाला खत्म होने के बाद सभी लोग चले गए। मगर वह लड़की अभी भी बैठी रही।
बिंदिया ने पूछा—
“तुम घर नहीं जाओगी?”
लड़की ने कहा—
“थोड़ी देर बाद जाऊंगी।”
बबलू ने पूछा—
“तुम्हारा नाम क्या है?”
लड़की कुछ पल चुप रही।
फिर बोली—
“सुधा।”
बबलू के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई। उसने बिंदिया की ओर देखा।
बिंदिया भी स्तब्ध थी।
“तुम्हारे पिता का नाम?”
लड़की ने नजरें झुका लीं।
“सहदेव सिंह।”
कमरे में जैसे समय ठहर गया।
बबलू के मुंह से केवल एक शब्द निकला—
“बहन...। ”
लड़की की आंखों से आंसू बह निकले।
“भैया...। ”
बबलू आगे बढ़ा।
लेकिन लड़की तुरंत पीछे हट गई।
“नहीं!”
बबलू रुक गया।
“क्यों?”
सुधा ने कांपती आवाज में कहा—
“मुझे नहीं पता आप सच में मेरे भाई हैं या नहीं।”
बबलू की आंखों में दर्द उतर आया।
“मैं तुम्हें कैसे साबित करूं?”
सुधा ने कहा—
“आपको नहीं, मुझे खुद सच जानना है।”
सुधा ने अपनी मुट्ठी से एक छोटी-सी चांदी की ताबीज निकाली।
बबलू ने उसे देखते ही अपना हाथ रोक लिया।
“यह...। ”
बिंदिया ने पूछा—
“क्या हुआ?”
बबलू की आंखें भर आईं।
“पिताजी ने मुझे बचपन में ऐसी ही ताबीज पहनाई थी।”
सुधा ने कहा—
“यह मां ने मुझे दी थी।”
बबलू ने पूछा—
“मां जिंदा हैं?”
सुधा चुप हो गई।
कुछ क्षण बाद उसने कहा—
“मुझे नहीं पता।”
बबलू की आंखें भर आईं।
“तुम्हें किसने पाला?”
सुधा ने कहा—
“एक आदमी ने।”
“कौन?”
सुधा ने धीरे से नाम लिया—
“दिनेश्वर सिंह।”
बबलू और बिंदिया एक-दूसरे को देखने लगे।
उसी समय बाहर से किसी के कदमों की आवाज आई। रंजीत तेजी से अंदर आया। उसके हाथ में कुछ कागज थे।
“बबलू भईया!”
फिर उसकी नजर सुधा पर पड़ी।
रंजीत अचानक रुक गया।
“यह कौन है?”
बबलू ने धीमे स्वर में कहा—
“मेरी बहन।”
रंजीत की आंखें फैल गईं।
“क्या?”
सुधा ने रंजीत को देखा।
उसके चेहरे का रंग अचानक बदल गया।
वह उठकर पीछे हट गई।
“तुम यहां क्यों आए हो?”
रंजीत हैरान रह गया।
“तुम मुझे जानती हो?”
सुधा ने कोई जवाब नहीं दिया।
बबलू ने पूछा—
“सुधा, तुम रंजीत को कैसे जानती हो?”
सुधा की आंखों में डर उतर आया।
वह धीरे से बोली—
“क्योंकि...। ”
उसने रंजीत की ओर देखा।
“इसी के घर में मैंने बचपन के तीन साल बिताए हैं।”
रंजीत के हाथ से कागज नीचे गिर गए।
बिंदिया स्तब्ध रह गई।
बबलू के चेहरे पर अविश्वास था।
और तभी सुधा ने एक ऐसा नाम लिया, जिसने कमरे में बैठे सभी लोगों की सांस रोक दी—
“मुझे वहां भेजने वाला रंजीत का पिता हरिहर सिंह था। ”
रंजीत जैसे पत्थर का हो गया।
🔥 क्रमशः आगे...
अगले अध्याय में...
सुधा को हरिहर सिंह के घर क्यों रखा गया था?
क्या हरिहर सिंह बबलू के परिवार को बचाना चाहता था या उसके पीछे कोई और साजिश थी?
सुधा को दिनेश्वर सिंह ने इतने वर्षों तक क्यों छिपाकर रखा?
और रंजीत के परिवार का बबलू के अतीत से असली रिश्ता क्या है?
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