बिंदिया और बबलू : अध्याय – 20 | संदूक की चाबी | हिंदी उपन्यास | कुमार सरोज | किशोरवाणी |






                  👩‍❤️‍👩  बिंदिया और बबलू  👩‍❤️‍👩 


              अभी तक आपने पढ़ा ........ 

               सच कभी अचानक सामने नहीं आता। वह पहले एक छोटी-सी आहट देता है, फिर एक सवाल बनता है और अंत में ऐसा तूफान लाता है, जो बरसों से खड़ी झूठ की दीवारों को गिरा देता है।

         शर्मा बाबू ने बबलू के सामने उसके अतीत की कई परतें खोल दीं। बबलू का असली नाम अमित था और उसका जुड़वां भाई अंकित था। दोनों को बचपन में अलग कर दिया गया था।

         दूसरी ओर रंजीत को अपने परिवार से जुड़ा एक पुराना पत्र मिला, जिससे उसे पहली बार लगा कि शायद बबलू उसका दुश्मन नहीं है।

इसी बीच उसे एक रहस्यमय संदेश मिला—

“सच जानना है तो कल सुबह गांव के पुराने तालाब पर आना।”

                            अब पढ़िए आगे ..... 




                    संदूक की चाबी 

                     (अध्याय - 20) 

                                   ✍️  कुमार सरोज 


                     सुबह की पहली किरण अभी मंझार गांव के ऊपर ठीक से फैली भी नहीं थी कि रंजीत पुराने तालाब की ओर निकल पड़ा। दिनेश भी उसके पीछे-पीछे चला आ रहा था।

“रंजीत भईया, मुझे अभी भी लगता है कि यह कोई जाल है।”

रंजीत ने चलते-चलते कहा—

“जाल तो हम पिछले कई दिनों से बिछा रहे थे। अब पहली बार कोई हमें जाल में बुला रहा है।”

दिनेश ने हंसकर कहा—

“तो लौट चले भईया। कम से कम अपना पैर तो बचा रहेगा।”

रंजीत रुक गया।

“दिनेश, तुम कभी सोचा है कि अगर बबलू सचमुच निर्दोष हुआ तो?”

दिनेश चुप हो गया।

कुछ देर बाद बोला—

“तब?”

रंजीत ने गंभीर होकर कहा—

“तब हमें उससे माफी मांगनी पड़ेगी।”

दिनेश ने मुंह बनाया।

“हमसे माफी-वाफी नहीं मांगी जाती।”

रंजीत हंस पड़ा।

“इसीलिए तुम्हारा चेहरा इतना टेढ़ा है।”

दोनों हंसते हुए आगे बढ़ गए।



               ❤️📖 अब आप नीचे दिये गए QR Code को स्कैन करके भी कहानी पढ़ सकते हैं -


             मंझार गांव का विशाल पुराना तालाब अब पहले जैसा नहीं रहा था। चारों ओर घास और झाड़ियां उग आई थीं। पानी में काई जमी थी। अब बहुत कम लोग उधर आया जाया करता थे। 

        रंजीत तालाब के पास पहुंच कर चारों ओर देखने लगा।

“कोई दिखाई नहीं दे रहा।”

दिनेश बोला—

“हमसे पहले कोई भूत आया होगा और डरकर भाग गया होगा।”

तभी पीछे से आवाज आई—

“भूत नहीं, मैं आया हूं।”

दोनों पलट गए। सामने एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

रंजीत ने पूछा—

“आपने हमें बुलाया था?”

बूढ़े ने सिर हिलाया।

“हां।”

“आप कौन हैं?”

         वह धीरे-धीरे दोनों के पास आ कर खड़ा हो गया। 

“नाम से क्या होगा? नाम बदलते देर नहीं लगती।”

रंजीत चौकन्ना हो गया।

“आप बबलू को जानते हैं?”

बूढ़े ने कहा—

“बबलू को नहीं, अमित को जानता हूं।”

रंजीत की आंखें फैल गईं।

            बूढ़े ने अपनी जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।

“यह चाबी सहदेव सिंह ने मुझे दी थी।”

रंजीत ने पूछा—

“किस चीज की?”

         वह बूढ़ा आदमी बिना कुछ बोले गांव के पूरब की ओर चल देता है।  पीछे पीछे रंजित और दिनेश भी चल पड़ता है। 

    गांव के पूरब में सबसे किनारे सेवरी काकी का एक छोटा सा पुराना घर था। उसका इस दुनिया में कोई नहीं था। बूढ़ी काकी अकेली ही रहती थी।

           वह बूढ़ा आदमी सेवरी काकी के घर के पास आकर सीधे अंदर चला जाता है। पीछे से रंजित और दिनेश भी घर के अंदर आ जाता है।

        सेवरी काकी उस समय अपने घर के अंदर बैठी हुक्का पी रखी थी। वह उस बूढ़ा आदमी को देखते ही खुशी के मारे फूली नहीं समाई। वह खुशी से नाचती हुई उसके पैरों में गिर कर रोने लगी।

   " आप आ गए स्वामी । 'मैं बर्षो से आपकी राह देख रही थी। " 

" सेवरी,  मालिक का अमानत उसके बेटे को सौंपने का समय आ गया है। " 



            📖✨ किशोरवाणी WhatsApp चैनल से जुड़िए ❤️


          
              सेवरी कुछ नहीं बोली चुपचाप घर के एक कोने में छिपा कर रखे हुए एक बहुत ही पुराना संदूक को ले कर आती है। 

       रंजित यह सब देखकर दंग हो रहा था। गांव वाले जानते थे कि सेवरी काकी विधवा है जबकि उसके पति अभी जिंदा थे। वह बूढ़ा आदमी सेवरी काकी के पति थे। 

        बूढ़े ने अपने पास रखे चाबी से संदूक को खोला। वह चाभी साथ लेकर आया था। 

रंजीत की धड़कन तेज हो गई।

      अंदर पुराने कागज, कुछ तस्वीरें और एक कपड़े में लिपटी डायरी थी।

बूढ़े ने डायरी रंजीत के हाथ में दे दी।

“इसे पढ़ो।”


पहले पन्ने पर लिखा था—

“अगर यह डायरी मेरे बेटों तक पहुंचे तो समझना कि मैं अपना वचन निभा नहीं सका।”

रंजीत का चेहरा गंभीर हो गया।

उसने पढ़ना शुरू किया।

  “अमित और अंकित को अलग करना मेरी जिंदगी का सबसे कठिन फैसला था।”

रंजीत ने दिनेश की ओर देखा।

फिर आगे पढ़ा।

   “मैंने यह फैसला किसी लालच में नहीं, अपने बच्चों की जान बचाने के लिए किया था।”


दिनेश अब बिल्कुल चुप था।

अगली पंक्ति पढ़ते ही रंजीत की आंखें फैल गईं।

   “हरिहर मेरा मित्र था। मगर मुझे डर था कि उसके परिवार के भीतर कोई ऐसा व्यक्ति है जो हमारी संपत्ति और संस्था पर कब्जा करना चाहता है।”

रंजीत का हाथ कांप गया।

“हरिहर चाचा...। ”

फिर एक नाम आया।

दिनेश्वर।

रंजीत की सांस जैसे अटक गई।

“यही नाम बार-बार क्यों आ रहा है?”

बूढ़े ने कहा—

“क्योंकि कहानी वहीं से शुरू होती है।”


डायरी के अगले पन्ने पर लिखा था—

  “मुझे पता चल गया था कि बच्चों को अलग करने के पीछे दिनेश्वर का हाथ है। मगर मेरे पास प्रमाण नहीं था।”


रंजीत ने डायरी बंद कर दी।

“तो फिर बबलू...। ”

बूढ़े ने कहा—

“अमित को बचाने के लिए उसका नाम बदल दिया गया।”

रंजीत ने पूछा—

“और अंकित?”

बूढ़े की आंखें नम हो गईं।

“उसे भी सुरक्षित जगह भेज दिया गया था।”

दिनेश ने पूछा—

“तो दोनों भाई इतने साल एक-दूसरे से दूर क्यों रहे?”

बूढ़े ने कहा—

“क्योंकि उन्हें अलग रखने वाला आदमी बहुत ताकतवर था।”

रंजीत ने पूछा—

“कौन?”

बूढ़े ने उसकी ओर देखा।

“तुम्हारे परिवार का आदमी।”

रंजीत की आंखों में आक्रोश भर गया।

“मेरे परिवार का मतलब हरिहर चाचा?”

बूढ़े ने सिर हिलाया।

“हरिहर नहीं, उसका अपना भाई।”

 कहते हुए वह घर के बाहर की ओर चल देता है।

 " सेवरी हमें अभी कुछ समय और ऐसे ही जीना होगा। जब तक मालिक की अमानत उनके बेटे को मिल नहीं जाती। " 

" मैंआप के इंतजार में ही तो जिंदा हूं स्वामी ।  भगवान जल्द सब ठीक कर देंगे। " 

       वह  बूढ़ा आदमी वहां से एक तरफ तेजी से चला जाता है। 

            रंजीत भी दिनेश के साथ फिर से तालाब के किनारे जाकर बैठ गया। उसके मन में पिछले महीनों की सारी घटनाएं घूमने लगीं। बबलू को बदनाम करने की कोशिश। बिंदिया पर शक। गांव में उसकी खिल्ली उड़ाना। उसके प्रमाणपत्रों की जांच करवाना।

     और अब... । उसे लग रहा था कि उसने जिस आदमी को दुश्मन समझा, वह शायद उसी षड्यंत्र का शिकार था।

दिनेश उसके पास आया।

“रंजीत भईया। ”

रंजीत ने धीमे स्वर में कहा—

“हमने बहुत बड़ी गलती कर दी।”

“गलती?”

“हम बबलू की पोल खोलना चाहते थे। मगर उसकी जिंदगी की किताब में हम खुद एक गलत पन्ना बन गए।”

दिनेश पहली बार गंभीर हुआ।

“तो अब?”

रंजीत ने डायरी उठाई।

“अब बबलू से लड़ाई नहीं होगी।”

“फिर?”

“अब उसके साथ मिलकर असली आदमी को खोजेंगे।”


      उधर आज बबलू सुबह से बेचैन था।

बिंदिया ने पूछा—

“क्या सोच रहे हैं?”

“रंजीत।”

“उसके बारे में क्यों?”

“मुझे लगता है वह अब कुछ अलग करने वाला है।”

बिंदिया मुस्कुराई।

“आपको उसके मन की बात भी पता चल जाती है क्या?”

बबलू हंस पड़ा।

“तुम्हारे मन की बात तो शादी के बाद से समझने लगा हूं।”

बिंदिया ने मजाक में कहा—

“तो बताइए अभी मैं क्या सोच रही हूं?”

बबलू ने कुछ पल उसे देखा।

“तुम सोच रही हो कि मैंने अभी तक तुम्हें चाय क्यों नहीं बनाई।”

बिंदिया हंस पड़ी।

“वाह! इतना बड़ा जीनियस बनने का फायदा क्या हुआ?”

“बड़ा फायदा है।”

“क्या?”

“पत्नी नाराज हो तो तुरंत पहचान जाता हूं।”

दोनों हंस पड़े।

लेकिन तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

महेश दौड़ता हुआ अंदर आया।

“भईया! रंजीत आया है।”

बबलू का चेहरा गंभीर हो गया।

“अकेला?”

महेश बोला—

“हां। और इस बार उसके हाथ में कोई कागज नहीं है।”

बिंदिया ने बबलू की ओर देखा।

“शायद बात करने आया है।”


    रंजीत घर में दाखिल हुआ। कुछ पल तक दोनों आमने-सामने खड़े रहे।

         वह रंजीत नहीं था जो हमेशा बबलू की कमजोरी खोजता था। आज उसकी आंखों में संकोच था।

“बबलू भईया...। ”

बबलू ने कहा—

“बैठो।”

रंजीत बैठ गया।

कुछ क्षण बाद उसने सिर झुका लिया।

“मुझे आपसे माफी मांगनी है।”

बबलू चौंक गया।

“किस बात की?”

“हर उस बात की, जिसमें मैंने आपको गलत समझा।”

बबलू शांत रहा।

रंजीत ने डायरी उसके सामने रख दी।

“यह आपके पिता की डायरी है।”

बबलू ने डायरी उठाई।

पहला पन्ना पढ़ते ही उसकी आंखें भर आईं।

“यह पिताजी की लिखावट है।”

रंजीत ने कहा—

“अब मुझे लगता है कि हमें मिलकर सच खोजना चाहिए।”

बबलू ने उसकी ओर देखा।

“तुम्हें मुझ पर विश्वास हो गया?”

रंजीत ने कहा—

“नहीं।”

बबलू चौंका।

रंजीत मुस्कुराया।

“अब मुझे तुम पर विश्वास करने की जरूरत नहीं है। मुझे तुम्हारे साथ खड़ा होना है, ताकि सच सामने आ सके।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

        फिर बबलू ने हाथ आगे बढ़ाया। रंजीत ने उसका हाथ पकड़ लिया।

        दोनों के बीच पहली बार दुश्मनी की जगह समझदारी का रिश्ता बन रहा था।

रंजीत जाने लगा तो बिंदिया ने पूछा—

“रंजीत, अब अगला कदम क्या होगा?”

रंजीत ने कहा—

“दिनेश्वर सिंह को खोजेंगे।”

बबलू ने तुरंत पूछा—

“वह कहां है?”

रंजीत ने उत्तर दिया—

“यही तो सबसे बड़ा सवाल है।”

तभी बाहर से महेश की आवाज आई—

“भईया! एक आदमी आपको बुला रहा है!”

बबलू बाहर आया।

        सामने एक अनजान युवक खड़ा था।

उसने बबलू को देखते ही कहा—

“आप अमित हैं?”

       बबलू कुछ बोल पाता, उससे पहले वह युवक एक लिफाफा देकर तेजी से वहां से चला गया।

           बबलू ने लिफाफा खोला। अंदर एक तस्वीर थी। तस्वीर में एक परिवार खड़ा था।

         बबलू ने तस्वीर देखते ही सांस रोक ली। उस तस्वीर में उसके पिता थे। हरिहर सिंह थे। और उनके बीच दिनेश्वर सिंह।

तस्वीर के पीछे सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—

“जिसे तुम अपना दुश्मन समझ रहे हो, असली दुश्मन उससे भी करीब है।”

बिंदिया ने तस्वीर देखी।

उसका चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

“बबलू... यह तस्वीर तो..।  " 

बबलू ने कहा—

“हां।”

“क्या?”

         बबलू ने धीरे से तस्वीर के एक कोने की ओर इशारा किया। वहां एक छोटा बच्चा खड़ा था। उसके चेहरे पर बबलू की ही शक्ल थी। और उसके पास एक दूसरा बच्चा था।

अंकित।

बबलू की आंखों से आंसू बह निकले।

“तो पिताजी ने हम दोनों को बचाने के लिए झूठ नहीं बोला था...। ”

रंजीत ने पूछा—

“फिर?”

बबलू ने तस्वीर को सीने से लगा लिया।

“उन्होंने हमें बचाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी कुर्बान कर दी थी।”



                               क्रमशः आगे...


     अगले अध्याय में पढ़िए.... 

 दिनेश्वर सिंह आखिर कहां गायब है?

क्या रंजीत और बबलू मिलकर उसे खोज पाएंगे?

बबलू और अंकित को अलग करने की असली वजह क्या थी?

और तस्वीर में दिखाई देने वाला तीसरा बच्चा कौन है, जिसकी पहचान पूरी कहानी को एक नया मोड़ देने वाली है?

          📖💌📖 बिंदिया और बबलू उपन्यास के यदि आपने अभी तक पीछे का अध्याय नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। ग्रामीण परिवेश की बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली रहस्यमयी कहानी है। 

            पीछे के अध्याय को पढ़ने के लिए नीचे लिखे उपन्यास के शीर्षक पर क्लिक कीजिए -





                    ❤️ किशोरवाणी को आपका समर्थन  - 

          हमारी कहानियों को पढ़ने के लिए आपका प्यार ही हमारी सबसे बड़ी प्रेरणा है। 
यदि आपको हमारी कोई कहानी पसंद आई हो और आप किशोरवाणी के साहित्यिक कार्य को आगे बढ़ाने में स्वेच्छा से योगदान करना चाहते हैं, तो आप अपनी इच्छा अनुसार योगदान कर सकते हैं।
आपका छोटा-सा योगदान हमें नई कहानियाँ लिखने और प्रकाशित करने की प्रेरणा देगा। 

   🙏 धन्यवाद — किशोरवाणी परिवार

     
        UPI ID - 9430972634-4@ybl



                 ❤️ अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई हो...

👉 किशोरवाणी को फॉलो करें, जहाँ हर सप्ताह ऐसी ही भावनात्मक, प्रेरणादायक और सामाजिक कहानियाँ प्रकाशित होती हैं।

💬 नीचे कमेंट करके ज़रूर बताइए कि कहानी का कौन-सा हिस्सा आपको सबसे ज़्यादा पसंद आया।

📲 इस कहानी को अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें, क्योंकि शायद किसी एक व्यक्ति तक यह संदेश पहुँचना ज़रूरी हो।

📖 आपकी एक टिप्पणी और एक शेयर हमें बेहतर कहानियाँ लिखने की प्रेरणा देता है।

धन्यवाद! ❤️

टिप्पणियाँ

Popular Post

अधूरी बारिश की कहानी – एक अनाथ बच्ची की मार्मिक कहानी । Adhuri-Barish-Ki-Kahani-real -story

सात जन्मों का अधूरा बंधन | एक मार्मिक अधूरी सच्ची प्रेम कहानी । saat- janno -ka-adhura -bandhan -real -love -story

अधूरी चाय – एक दिल छू लेने वाली भावुक हिंदी कहानी | Adhuri Chai Hindi Story

अधूरी ख्वाहिश: प्रेम, संगीत और कर्मा की एक मार्मिक कहानी | Adhoori Khwaahish - A Story of Love & Destiny

जब गांव की गलियां याद आईं | दिल को छू लेने वाली प्रेरणादायक कहानी | Village Life Emotional Story

मोबाइल वाला बेटा – भावुक कहानी | परिवार और रिश्तों की सच्चाई। Mobile Wala Beta

माँ का आँचल | दिल छू लेने वाली प्रेरक हिन्दी कहानी / Maa- Ka-Aanchal -Emotional-Inspirational- Hindi -Kahani