बिंदिया और बबलू :- अध्याय – 19 | विश्वास की दीवार | हिंदी उपन्यास | कुमार सरोज | किशोरवाणी |
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रिश्ते खून से बनते हैं, मगर विश्वास से टिकते हैं। और जब विश्वास की नींव में संदेह की एक दरार पड़ जाए, तो सबसे मजबूत रिश्ता भी डगमगाने लगता है।
पुराने बरगद के नीचे बबलू की मुलाकात अपने बिछड़े भाई से हुई। बारह साल बाद दोनों भाई आमने-सामने थे। लेकिन भाई ने ऐसा रहस्य बताया जिसने बबलू की पूरी दुनिया हिला दी—
“तुम्हारी पहचान मिटाने वालों में शर्मा बाबू का हाथ था।”
उधर रंजीत को भी एक पुराना कागज मिला, जिसमें उसके परिवार के अतीत और बबलू के परिवार के बीच किसी पुराने संबंध का संकेत था।
अब सवाल यह था—शर्मा बाबू सचमुच दोषी थे या यह किसी बड़ी साजिश का हिस्सा था ?
विश्वास की दीवार
( अध्याय- 19 )
✍️ कुमार सरोज
मंझार गांव में बरगद के पेड़ के नीचे बबलू अपने भाई के सामने खड़ा था। चेहरे पर वर्षों की पीड़ा और आंखों में हजारों सवाल थे।
“भैया, मैं शर्मा बाबू पर विश्वास करता हूं। उन्होंने मेरी जिंदगी बदलने में मेरी मदद की है। उन्होंने मुझे पढ़ाया, संभाला... फिर वह मेरे साथ ऐसा क्यों करेंगे?”
उसका भाई कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला—
“मुन्ना, मैंने यह नहीं कहा कि उन्होंने तुम्हारे साथ दुश्मनी की। मैंने सिर्फ इतना कहा है कि तुम्हारी पहचान बदलने वाली उस घटना में उनका नाम आया था।”
बिंदिया ने पूछा—
“लेकिन नाम आ जाना और दोषी होना, दोनों अलग बातें हैं।”
भाई ने पहली बार बिंदिया की ओर गौर से देखा।
“तुम्हारी यही समझदारी तुम्हें बाकी लोगों से अलग बनाती है।”
बिंदिया मुस्कुराई।
“मैं अपने पति पर किसी के कहने भर से शक नहीं कर सकती। और उनके बारे में कोई फैसला लेने से पहले सच जानना जरूरी है।”
बबलू ने बिंदिया की ओर देखा।
उसके चेहरे पर राहत की हल्की मुस्कान आ गई।
“इसीलिए तो मैंने तुम्हें अपना जीवनसाथी चुना था।”
बिंदिया ने हल्के मजाक में कहा—
“जीवनसाथी चुना था या मेरी पढ़ाई देखकर अपना मुफ्त का दिमाग खोजा था?”
बबलू हंस पड़ा।
“दोनों में अंतर क्या है?”
भाई भी वर्षों बाद खुलकर हंस दिया।
कुछ क्षण के लिए उस बरगद के नीचे जमा अतीत का बोझ हल्का हो गया।
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उधर रंजीत अपने कमरे में बैठा था। उसने बूढ़े आदमी से मिला कागज मेज पर रखा। कागज पुराना था और किनारे पीले पड़ चुके थे।
दिनेश उसके सामने बैठा था।
“खोल भी दो। ऐसे देख रहे हो जैसे अंदर सांप बैठा हो।”
रंजीत ने घूरकर कहा—
“चुप रहो। यह मजाक का समय नहीं है।”
उसने कागज खोला।
पहली पंक्ति पढ़ते ही उसका चेहरा बदल गया।
“क्या हुआ?”
रंजीत ने धीमे स्वर में पढ़ा—
“हरिहर सिंह और सहदेव सिंह, दोनों एक ही संस्था से जुड़े हुए थे।”
दिनेश चौंक पड़ा।
“मतलब हमारे चाचा और बबलू के पिता एक-दूसरे को जानते थे?”
रंजीत ने आगे पढ़ा।
उसकी आंखें अब कागज पर जमी थीं।
“सिर्फ जानते नहीं थे, दोनों ने मिलकर गरीब बच्चों के लिए छात्रवृत्ति योजना शुरू की थी।”
दिनेश ने सिर खुजाया।
“तो इसमें बबलू का क्या संबंध?”
रंजीत ने अगले पन्ने पर नजर डाली।
अचानक उसकी उंगलियां कांपने लगीं।
“यह देख।”
दिनेश ने कागज देखा।
नीचे दो बच्चों के नाम लिखे थे—
अमित — छात्र क्रमांक 17
अंकित — छात्र क्रमांक 18
दिनेश बोला—
“अंकित कौन?”
रंजीत ने कहा—
“शायद वही दूसरा बच्चा, जिसे हम अमित का भाई समझ रहे हैं।”
फिर उसकी नजर सबसे नीचे लिखे हस्ताक्षर पर पड़ी।
“हरिहर सिंह।”
रंजीत कुर्सी पर पीछे टिक गया। उसका चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
“अगर यह सच है तो...। ”
दिनेश ने पूछा—
“तो क्या?”
रंजीत ने धीमे स्वर में कहा—
“हम इतने दिनों से जिस आदमी को अपना दुश्मन समझ रहे हैं, उसके अतीत में हमारे परिवार का भी हिस्सा है।”
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उधर रात काफी हो चुकी थी, इसीलिए बबलू और बिंदिया साथ में घर लौट पड़े। बबलू का भाई भी एक तरफ अंधेरे की ओर चल पड़ा।
जानकी चूल्हे के पास बैठी थी। महेश वहीं चारपाई पर बैठा कुछ खा रहा था।
बबलू को देखते ही महेश बोला—
“भईया, इतनी रात को कहां से आ रहे हैं?”
बबलू ने मुस्कुराकर कहा—
“जरा पुराने दोस्त से मिलने गए थे।”
महेश ने तुरंत पूछा—
“दोस्त या दुश्मन?”
बिंदिया ने हंसते हुए कहा—
“तुम्हें हर बात में जासूसी क्यों करनी होती है?”
महेश ने गर्व से कहा—
“गांव में कोई तो होना चाहिए जो सब पर नजर रखे।”
जानकी बोली—
“पहले अपनी किताब पर नजर रख ले। पिछले साल का हिसाब अभी तक पूरा नहीं हुआ।”
महेश चुप हो गया।
“मां, हमको लगा था आज खाना खिलाओगी।”
जानकी ने कहा—
“तुम्हारे लिए खाना रखा है। मगर पहले हाथ-मुंह धोकर आओ।”
महेश जाते-जाते बबलू से बोला—
“भईया, शादी के बाद आप बहुत बदल गए हैं। पहले मां से डरते थे, अब भाभी से डरते हैं।”
बिंदिया हंसते-हंसते दोहरी हो गई।
बबलू ने चप्पल उठाने का अभिनय किया।
“रुक, आज तेरी जासूसी निकालता हूं।”
महेश भागते हुए बोला—
“भाभी बचाइए!”
घर में कई दिनों बाद ऐसी हंसी गूंजी थी।
लेकिन बबलू के मन के भीतर अभी भी तूफान था।
खाना खाने के बाद बिंदिया और बबलू सोने के लिए अपने कमरे में आ गए। मगर दोनों में से किसी को नींद नहीं आ रही थी। बस दोनों सोच में डूबे बिस्तर पर करवट बदल रहे थे।
ठीक तभी रात के करीब बारह बजे दरवाजे पर दस्तक हुई।
ठक... ठक... ठक...
बबलू की आंख खुल गई।
बिंदिया ने पूछा—
“इतनी रात में कौन हो सकता है?”
बबलू उठकर बाहर गया।
दरवाजा खोला।
सामने शर्मा बाबू खड़े थे।
बबलू कुछ क्षण उन्हें देखता रह गया।
“आप?”
शर्मा बाबू ने गंभीर स्वर में कहा—
“हां। मुझे तुमसे जरूरी बात करनी है।”
बिंदिया भी बाहर आ गई।
शर्मा बाबू की नजर उस पर पड़ी।
“तुम्हें भी यह बात सुननी होगी।”
बबलू ने उन्हें अंदर बुलाया।
तीनों कमरे में बैठ गए।
कुछ देर तक कोई नहीं बोला।
फिर बबलू ने सीधे सवाल किया—
“क्या आप मेरे अतीत के बारे में जानते थे?”
शर्मा बाबू ने आंखें बंद कर लीं।
“हां।”
बिंदिया और बबलू दोनों चौंक गए।
“कितना?”
“जितना तुम्हें आज तक किसी ने नहीं बताया।”
बबलू की आवाज में तल्खी आ गई।
“तो फिर इतने साल चुप क्यों रहे?”
शर्मा बाबू ने उसकी ओर देखा।
“क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे वचन दिया था कि जब तक खतरा खत्म न हो, मैं तुम्हारी पहचान किसी के सामने नहीं खोलूंगा।”
बबलू ने मेज पर हाथ मार दिया।
“कौन-सा खतरा?”
शर्मा बाबू बोले—
“तुम्हें मारने का।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
बिंदिया की आंखें फैल गईं।
शर्मा बाबू ने कहना शुरू किया—
“बारह साल पहले तुम्हारे पिता को पता चला कि कुछ लोग तुम्हारे परिवार की जमीन और संस्था की संपत्ति पर कब्जा करना चाहते हैं।”
बबलू ध्यान से सुन रहा था।
“तुम दोनों भाई उस समय बहुत छोटे थे। तुम्हारे पिता ने तुम्हें अलग-अलग जगह भेज दिया ताकि कम से कम एक बच्चा सुरक्षित रहे।”
बबलू ने पूछा—
“और अमित?”
शर्मा बाबू बोले—
“जिसे तुम अमित समझते रहे, वह वास्तव में तुम्हारा भाई अंकित था।”
बबलू के चेहरे पर अविश्वास छा गया।
“तो मेरा नाम?”
शर्मा बाबू ने कहा—
“तुम्हारा नाम अमित था।”
बबलू की आंखों में आंसू आ गए।
“और मेरा भाई?”
“अंकित।”
बिंदिया ने धीरे से पूछा—
“तो दोनों की पहचान क्यों बदल दी गई?”
शर्मा बाबू ने कहा—
“क्योंकि जिस बच्चे को लोग ढूंढ़ रहे थे, वह अमित था।”
बबलू की सांस रुक-सी गई।
“मुझे?”
शर्मा बाबू ने सिर हिलाया।
“हां।”
बबलू ने पूछा—
“लेकिन कौन मुझे मारना चाहता था?”
शर्मा बाबू ने उत्तर देने के बजाय जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।
तस्वीर में तीन आदमी थे।
सहदेव सिंह।
हरिहर सिंह।
और तीसरा आदमी...
बबलू तस्वीर देखते ही ठिठक गया।
“यह कौन है?”
शर्मा बाबू ने कहा—
“जिससे तुम्हें सबसे ज्यादा सावधान रहना चाहिए।”
बिंदिया ने तस्वीर हाथ में ली।
वह तीसरे आदमी का चेहरा पहचानने की कोशिश करने लगी।
तभी उसकी आंखें फैल गईं।
“यह तो...”
बबलू ने पूछा—
“कौन?”
बिंदिया ने धीरे से कहा—
“रंजीत के मामा... दिनेश्वर सिंह।”
शर्मा बाबू ने सिर झुका लिया।
“अब तुम्हें समझ आया कि असली खेल कहां है?”
बबलू कुछ बोल नहीं पाया।
उधर रंजित के घर उसी समय उसे मां के पुराने बक्से से एक और पत्र मिला। इस बार पत्र उसकी मां के नाम था।
उसने पढ़ना शुरू किया। कुछ पंक्तियां पढ़ते ही उसकी आंखों में अविश्वास भर गया।
“नहीं... यह नहीं हो सकता।”
दिनेश ने पूछा—
“क्या लिखा है?”
रंजीत ने पत्र उसकी ओर बढ़ा दिया।
दिनेश ने पढ़ा और कुछ देर तक चुप रहा।
फिर बोला—
“रंजीत... अगर यह सच है तो बबलू हमारा दुश्मन नहीं है।”
रंजीत ने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा—
“तो असली दुश्मन कौन है?”
तभी बाहर किसी के कदमों की आवाज सुनाई दी।
दोनों चौंककर दरवाजे की ओर देखने लगे।
दरवाजा धीरे-धीरे खुला।
लेकिन बाहर कोई नहीं था।
सिर्फ जमीन पर एक लिफाफा पड़ा था।
रंजीत ने उसे उठाया।
ऊपर लिखा था—
“सच जानना है तो कल सुबह गांव के बाहर वाले पुराने तालाब पर आना।”
रंजीत ने लिफाफा बंद किया।
उसके चेहरे पर पहली बार बबलू के प्रति दुश्मनी से ज्यादा जिज्ञासा थी।
क्रमशः आगे...
📖❤️ अगले अध्याय में पढ़िए—
पुराने तालाब पर रंजीत को कौन-सा राज मिलने वाला है?
क्या रंजीत पहली बार बबलू को निर्दोष समझने लगेगा?
दिनेश्वर सिंह का बबलू के अतीत से क्या संबंध है?
और क्या बबलू अपने खोए हुए भाई अंकित को हमेशा के लिए अपने साथ रख पाएगा ?
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