बिंदिया और बबलू : अध्याय – 18 | बरगद के नीचे कौन था | प्रेम, परिवार और रहस्य की कहानी | हिंदी उपन्यास | कुमार सरोज | किशोरवाणी |
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“अतीत चाहे जितना पुराना हो, उसकी परछाईं आदमी के पीछे चलती रहती है। फर्क बस इतना है कि कभी वह परछाईं दिखाई देती है और कभी मन के किसी अंधेरे कोने में छिपी रहती है।”
बबलू के अतीत का रहस्य अब धीरे-धीरे खुलने लगा है। श्यामलाल ने बताया कि बबलू का असली नाम अमित है और उसका एक जुड़वां भाई था, जिसे बचपन में उससे अलग कर दिया गया था। उधर रंजीत को पुराने कागजों से एक अनाथालय का पता मिला है।
इसी बीच बबलू के मोबाइल पर एक रहस्यमय संदेश आया—
“मुन्ना, अगर तुम सच में मुझे याद करते हो तो कल शाम पुराने बरगद के नीचे आना।”
बबलू के लिए यह नाम सिर्फ एक पुरानी याद नहीं था। यह उसके खोए हुए अतीत की सबसे बड़ी कड़ी थी।
बरगद के नीचे कौन था ?
( अध्याय - 18 )
✍️ कुमार सरोज
मंझार गांव के बाहर खड़ा वह बूढ़ा बरगद वर्षों से गांव की कई पीढ़ियों का गवाह था। उसकी मोटी जड़ों के बीच गांव के बच्चे खेलते थे और बूढ़े लोग बैठकर दुनिया भर की पंचायत किया करते थे।
लेकिन आज बबलू के कदम उस बरगद की ओर भारी थे। बिंदिया उसके साथ चल रही थी।
“आपको यकीन है कि वहां कोई आएगा?”
बबलू ने धीमे स्वर में कहा—
“यकीन नहीं है, लेकिन दिल कहता है कि संदेश झूठा नहीं था।”
बिंदिया मुस्कुराई।
“दिल की बात हमेशा सही नहीं होती।”
बबलू ने उसकी ओर देखा।
“मगर आज पहली बार मैं चाहता हूं कि मेरा दिल गलत न हो।”
दोनों कुछ देर चुपचाप चलते रहे।
तभी पीछे से महेश की आवाज आई—
“भईया! आप दोनों चोरी-छिपे कहां जा रहे हैं?”
बबलू ने पलटकर देखा।
महेश दौड़ता हुआ आ रहा था।
“तुम यहां क्या कर रहे हो?”
“हम? हम तो खेत देखने जा रहे थे।”
बिंदिया हंस पड़ी।
“खेत इधर नहीं, उधर है महेश।”
महेश ने गर्दन खुजाते हुए कहा—
“हमको मालूम था। मगर हम सोचे कि खेत अगर इधर नहीं है तो शायद भईया का कोई नया खेत खुल गया होगा।”
बबलू हंस पड़ा।
“तुम घर जाओ।”
महेश ने तुरंत कहा—
“ठीक है। लेकिन अगर कोई भूत-वूत मिले तो आवाज दे दीजिएगा।”
कहकर वह भाग गया।
बिंदिया ने हंसते हुए कहा—
“महेश गांव का सबसे बड़ा जासूस बनेगा।”
बबलू बोला—
“जासूस कम, मुसीबत ज्यादा है।”
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शाम अब गहराने लगी थी। चलते चलते दोनों बरगद के पेड़ के पास पहुंच गए।
बबलू बरगद के नीचे ही खड़ा हो गया। बिंदिया कुछ दूरी पर बैठ गई। हवा में पेड़ के पत्तों की सरसराहट थी।
अचानक बबलू को लगा जैसे किसी ने पीछे से उसका नाम पुकारा—
“मुन्ना..। ”
उसका शरीर जैसे पत्थर हो गया। उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।
अंधेरे में एक आदमी खड़ा था। चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।
बबलू ने कांपती आवाज में पूछा—
“कौन ?”
आदमी आगे बढ़ा। चांद की चांदनी उसके चेहरे पर पड़ी।
उसे देखते ही बबलू की आंखें फैल गईं। उसके होंठों से बस एक शब्द निकला—
“तुम..। "
बिंदिया भी उठकर खड़ी हो गई।
आदमी मुस्कुराया।
“बहुत देर कर दी, मुन्ना।”
बबलू की आंखों से आंसू निकल पड़े।
“भैया...। ”
कहते हुए बबलू अपने भाई से लिपट गया।
दोनों कुछ क्षण तक कुछ बोल ही नहीं पाए।
बिंदिया दूर खड़ी यह दृश्य देखती रही।
उसकी आंखें भी नम थीं।
कुछ देर बाद बबलू ने पूछा—
“तुम इतने साल कहां थे?”
उस आदमी ने गहरी सांस ली।
“जहां मुझे रखा गया था।”
“किसने?”
उसने बबलू की ओर देखा।
“उन लोगों ने, जो चाहते थे कि हम दोनों कभी एक-दूसरे तक न पहुंचें।”
बबलू का चेहरा कठोर हो गया।
“कौन लोग?”
उसने तुरंत जवाब नहीं दिया।
“अभी नहीं।”
बबलू ने नाराज होकर कहा—
“बारह साल तक मैं तुम्हें खोजता रहा और आज तुम मेरे सामने खड़े होकर कह रहे हो—अभी नहीं?”
उसने बबलू का हाथ पकड़ लिया।
“अगर मैं आज सब बता दूंगा तो शायद हम दोनों कल तक सुरक्षित नहीं रहेंगे।”
बिंदिया आगे बढ़ी।
“तो फिर आप कौन हैं? और आखिर बबलू को बबलू बनकर क्यों जीना पड़ा?”
वह कुछ क्षण बिंदिया को देखता रहा।
फिर बोला—
“तुम बिंदिया हो?”
बिंदिया चौंकी।
“आप मेरा नाम जानते हैं?”
“मैं तुम्हें नहीं जानता था। लेकिन तुम्हारे बारे में बहुत कुछ सुना है।”
बबलू ने पूछा—
“किससे?”
वह मुस्कुराया।
“शर्मा बाबू से।”
बबलू का चेहरा गंभीर हो गया।
उसने अपनी जेब से एक पुराना कागज निकाला।
“यह पिता ने मेरे पास छोड़ा था।”
बबलू ने कागज लेने के लिए हाथ बढ़ाया।
कागज पर उसके पिता की लिखावट थी।
बबलू उसे पहचानते ही भावुक हो गया।
“पिताजी..। .”
उसने पढ़ना शुरू किया। कुछ पंक्तियां पढ़ते ही उसके हाथ कांपने लगे।
बिंदिया ने पूछा—
“क्या लिखा है?”
बबलू ने धीरे से कहा—
“उन्होंने लिखा है कि मेरी असली पहचान छिपाना उनकी मजबूरी थी।”
“क्यों?”
बबलू ने आगे पढ़ा। फिर अचानक रुक गया। उसकी आंखें फैल गईं।
“यह नाम..। .”
बिंदिया ने पूछा—
“किसका नाम है?”
बबलू ने कागज उसकी ओर बढ़ा दिया।
उस पर लिखा था—
“रंजीत के पिता — हरिहर सिंह।”
बिंदिया स्तब्ध रह गई।
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उधर उसी समय रंजीत पटना से लौटने की तैयारी कर रहा था। उसके हाथ में अनाथालय की पुरानी फाइल थी।
दिनेश ने पूछा—
“इसमें ऐसा क्या मिला?”
रंजीत बोला—
“एक नाम।”
“किसका?”
रंजीत ने फाइल बंद कर दी।
“बबलू का।”
दिनेश हंस पड़ा।
“इसमें नया क्या है?”
रंजीत ने गंभीर होकर कहा—
“नाम बबलू का है, लेकिन फोटो किसी और की।”
दिनेश की हंसी गायब हो गई।
“मतलब?”
“मतलब यह कि जिस आदमी को हम बबलू समझ रहे हैं, शायद वह वही आदमी नहीं है।”
रात में रंजीत के घर के बाहर किसी ने दस्तक दी। रंजीत ने दरवाजा खोला। सामने एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।
“तुम रंजीत हो?”
“हां। मगर आप कौन?”
बूढ़े ने जेब से एक कागज निकाला।
“तुम्हारे पिता को यह देना था। मगर वह समय रहते ले नहीं पाए।”
रंजीत ने कागज लिया।
“क्या है इसमें?”
बूढ़े ने कहा—
“तुम्हारे परिवार का सबसे पुराना राज।”
रंजीत ने कागज खोलने की कोशिश की।
लेकिन बूढ़े ने उसका हाथ रोक दिया।
“इसे अकेले में पढ़ना।”
“क्यों?”
बूढ़ा उसकी आंखों में देखकर बोला—
“क्योंकि इसे पढ़ने के बाद तुम बबलू को दुश्मन समझोगे या अपना, यह फैसला तुम्हें करना होगा।”
रंजीत अवाक रह गया।
उधर बरगद के नीचे बबलू अभी भी अपने भाई के सामने खड़ा था।
“भैया, क्या हम दोनों के अलग होने के पीछे पिताजी का कोई हाथ था?”
उसने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“फिर किसका था?”
वह कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला—
“एक ऐसे आदमी का, जिसे तुम आज भी बहुत सम्मान देते हो।”
बबलू ने हैरानी से पूछा—
“मैं?”
“हां।”
“कौन?”
उसने बबलू की आंखों में देखते हुए कहा—
“तुम्हारे गुरु, शर्मा बाबू।”
बबलू पीछे हट गया।
“नहीं! शर्मा बाबू ऐसा नहीं कर सकते।”
भाई ने शांत स्वर में कहा—
“सच अक्सर वही होता है, जिस पर विश्वास करने का मन नहीं करता।”
बिंदिया ने दोनों भाइयों की ओर देखा। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
अब इस कहानी में सिर्फ अतीत का राज नहीं था। विश्वास और विश्वासघात के बीच की रेखा भी मिटने लगी थी।
🔥 क्रमशः आगे...
अगले अध्याय में पढ़िए—
क्या शर्मा बाबू सचमुच बबलू के अतीत के दोषी हैं?
हरिहर सिंह और बबलू के पिता के बीच क्या संबंध था?
रंजीत को मिले पुराने कागज में उसके परिवार का कौन-सा राज छिपा है?
और क्या बबलू अपने भाई की बात पर विश्वास करेगा या शर्मा बाबू से जवाब मांगेगा ?
❤️ किशोरवाणी को आपका समर्थन 🙏 धन्यवाद ।
📖💌📖 बिंदिया और बबलू उपन्यास के यदि आपने अभी तक पीछे का अध्याय नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। ग्रामीण परिवेश की बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली रहस्यमयी कहानी है।
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