बिंदिया और बबलू : अध्याय – 17 | दो नाम, एक रहस्य | प्रेम, परिवार और रहस्य की कहानी | हिंदी उपन्यास | किशोरवाणी |





                👩‍❤️‍👩  बिंदिया और बबलू  👩‍❤️‍👩 



   अभी तक आपने पढ़ा...

               रंजीत बबलू के अतीत की तह तक पहुंचने के लिए पटना गया था। वहां उसे शर्मा बाबू से पता चला कि बबलू के पुराने प्रमाणपत्रों की कहानी साधारण नहीं है। दूसरी ओर, मंझार में श्यामलाल नाम का एक पुराना परिचित बबलू के पास आया और उसने बताया कि बबलू के अतीत में “अमित” नाम का एक युवक जुड़ा है।

पुराने कागज से यह भी संकेत मिला कि—

“अमित को बचाना है तो बबलू बनकर जीना होगा।”

        अब सवाल यह था कि अमित कौन था? बबलू को अपनी पहचान बदलकर क्यों जीना पड़ा? और बारह साल पहले आखिर ऐसा क्या हुआ था?




              दो नाम, एक रहस्य

                 ( अध्याय 17 )

                              ✍️  कुमार सरोज 


            शर्मा बाबू और रंजीत पुराने कार्यालय में आमने-सामने बैठे थे। बाहर बारिश हो रही थी। टीन की छत पर गिरती बूंदों की आवाज कमरे की खामोशी को और गहरा कर रही थी।

रंजीत ने बेचैनी से पूछा—

“शर्मा बाबू, अब तो साफ-साफ बताइए। आखिर अमित कौन था?”

शर्मा बाबू ने खिड़की के बाहर देखा।

“अमित, वह लड़का था जिसके लिए सहदेव सिंह ने अपनी पूरी जिंदगी बदल दी।”

रंजीत चौंका।

“सहदेव सिंह? यानी बबलू के पिता?”

“हां।”

“तो बबलू और अमित का क्या संबंध था?”

शर्मा बाबू कुछ देर चुप रहे।

फिर बोले—

“यही सवाल तुम्हें उस जगह ले जाएगा, जहां से बबलू की असली कहानी शुरू होती है।”

दिनेश अधीर होकर बोला—

“शर्मा बाबू, पहेली मत बुझाइए। हम लोग गांव से इतनी दूर सिर्फ कहानी सुनने नहीं आए हैं।”

शर्मा बाबू हल्का-सा मुस्कुराए।

“तुम्हारी यही जल्दबाजी तुम्हें हमेशा गलत निष्कर्ष तक पहुंचाती है।”

रंजीत ने गंभीर स्वर में कहा—

“इस बार मैं जल्दबाजी नहीं करूंगा।”

शर्मा बाबू ने मेज की दराज खोली।

उसमें से एक पुराना लिफाफा निकाला।

“यह बारह साल पहले सहदेव सिंह ने मुझे दिया था।”

रंजीत की नजर लिफाफे पर टिक गई।

“इसमें क्या है?”

“एक तस्वीर... और एक बयान।”

शर्मा बाबू ने लिफाफा खोला।

एक पुरानी तस्वीर मेज पर रखी।

तस्वीर में दो लड़के खड़े थे।

एक बबलू जैसा दिख रहा था। दूसरा लड़का बिल्कुल वैसा ही चेहरा लिए हुए था।

रंजीत की आंखें फैल गईं।

“ये दोनों, एक जैसे हैं!”

शर्मा बाबू ने धीरे से कहा—

“क्योंकि वे जुड़वां भाई थे।”

कमरे में जैसे बिजली गिर गई।

दिनेश के मुंह से निकल पड़ा—

“जुड़वां?”

रंजीत ने तस्वीर उठाकर फिर देखा।

“लेकिन बबलू ने कभी अपने भाई के बारे में नहीं बताया।”

शर्मा बाबू ने कहा—

“क्योंकि बबलू ने अपने भाई को कभी जाना ही नहीं।”

“मतलब?”

“उनके जन्म के कुछ समय बाद दोनों अलग हो गए थे।”

रंजीत के चेहरे पर अविश्वास था।

“लेकिन अमित कहां गया?”

शर्मा बाबू ने धीरे से कहा—

“यहीं से कहानी उलझती है।”


           इधर मंझार गांव में बिंदिया अब तक उस पुराने कागज को देख रही थी।

“बबलू, अगर अमित आपका भाई था तो आपने मुझे कभी क्यों नहीं बताया?”

बबलू ने धीमे स्वर में कहा—

“क्योंकि मुझे खुद पूरी सच्चाई नहीं पता थी।”

“लेकिन आपके पिता जानते थे?”

“शायद।”

“और उन्होंने आपको बबलू बनाकर क्यों रखा?”

बबलू ने सिर झुका लिया।

“क्योंकि उस समय किसी को बचाना जरूरी था।”

बिंदिया ने पूछा—

“किसे?”

बबलू ने उसकी आंखों में देखा।

“अमित को।”

बिंदिया कुछ क्षण तक उसे देखती रही।

“क्या वह जिंदा है?”

बबलू ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसकी खामोशी ही जैसे जवाब बन गई।
          
                 तभी श्यामलाल अंदर आया। उसने दोनों को देखा और समझ गया कि बात अब छिपी नहीं है।

“अब इन्हें सब बता दीजिए।”

बबलू ने पूछा—

“क्या?”

“जो बात तुम्हारे पिता ने मुझसे छिपाने को कही थी।”

बबलू की आंखें नम हो गईं।

“मेरे पिता ने आपसे क्या कहा था?”

श्यामलाल ने गहरी सांस ली।

“उन्होंने कहा था—अगर कभी मेरा बेटा अमित को खोजने निकले, तो उसे पहले यह बताना कि वह जिस नाम से जी रहा है, वह उसका दिया हुआ नाम नहीं है।”

बिंदिया ने धीरे से पूछा—

“तो बबलू का असली नाम?”

श्यामलाल ने उसकी ओर देखा।

“अमित।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

बबलू जैसे अपनी ही पहचान से सामना कर रहा था।

“तो मैं...। ”

श्यामलाल ने बात पूरी की—

“तुम अमित हो।”

        बबलू की आंखों के सामने जैसे पुराने दृश्य घूमने लगे।

        एक छोटा-सा घर। एक औरत की गोद। दो बच्चों की हंसी। और फिर अचानक एक लंबी यात्रा।

उसे कुछ धुंधला-धुंधला याद आने लगा।

“मुझे एक चेहरा याद आ रहा है।”

बिंदिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“किसका?”

“एक लड़के का। वह हमेशा मेरे साथ रहता था।”

श्यामलाल बोला—

“वही अमित था।”

बबलू ने सिर हिलाया।

“नहीं, मैं उसे अमित कहकर नहीं बुलाता था।”

“तो क्या कहते थे?”

बबलू की आंखों में हल्की मुस्कान आई।

“मुन्ना।”

श्यामलाल की आंखें भर आईं।

“तुम्हें याद आ गया...। ”


            पटना में रंजीत ने पुरानी फाइल के बीच एक और कागज देखा।

उस पर एक पता लिखा था—

“ भागलपुर जिले का पुराना अनाथालय।”

रंजीत ने पूछा—

“यह जगह?”

शर्मा बाबू बोले—

“यहीं से तुम्हें अमित का पहला सुराग मिलेगा।”

दिनेश ने उत्साह में कहा—

“तो चलिए!”

रंजीत ने उसे रोक दिया।

“नहीं। पहले मुझे यह समझना है कि अमित वहां क्यों गया था।”

शर्मा बाबू ने कहा—

“वह वहां गया नहीं था...”

रंजीत ने उनकी ओर देखा।

“तो?”

“उसे वहां पहुंचाया गया था।”

“किसने?”

शर्मा बाबू चुप रहे।

    रंजीत समझ गया कि कहानी में अभी बहुत कुछ बाकी है।



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             मंझार में सुबह होते ही बबलू ने सबसे पहले घर में रखा हुआ अपना एक पुराना संदूक खोला। उसमें उसे एक छोटी-सी लकड़ी की गाड़ी मिली।

बिंदिया ने पूछा—

“यह क्या है?”

बबलू उसे हाथ में लेकर देर तक देखता रहा।

फिर बोला—

“यह मेरे बचपन की है।”

श्यामलाल ने उसे देखते ही कहा—

“यह तुम्हारे भाई की थी।”

बबलू ने चौंककर उसकी ओर देखा।

“मेरे पास क्यों है?”

श्यामलाल ने धीमे स्वर में कहा—

“क्योंकि जिस दिन दोनों भाई अलग हुए थे, तुम्हारे पिता ने यह खिलौना तुम्हारे पास रख दिया था।”

बबलू की आंखों से आंसू निकल पड़े।

“पिताजी ने मुझे कभी सच क्यों नहीं बताया?”

श्यामलाल ने कहा—

“क्योंकि वह चाहते थे कि तुम पहले इंसान बनो, फिर अपने अतीत को जानो।”

बिंदिया ने बबलू के कंधे पर हाथ रखा।

“शायद उन्होंने गलत तरीका चुना, लेकिन उनका इरादा गलत नहीं था।”

बबलू ने धीमे से कहा—

“अब मैं अपने भाई को खोजूंगा।”

श्यामलाल ने गंभीर स्वर में कहा—

“तो तैयार हो जाओ।”

“क्यों?”

“क्योंकि जिस आदमी को तुम खोज रहे हो वह भी तुम्हें खोज रहा है।”

बबलू और बिंदिया दोनों चौंक गए।


       उसी समय बबलू के मोबाइल पर एक अनजान नंबर से संदेश आया।

सिर्फ एक पंक्ति—

“मुन्ना, अगर तुम सच में मुझे याद करते हो तो कल शाम पुराने बरगद के नीचे आना।”

बबलू का चेहरा सफेद पड़ गया।

बिंदिया ने पूछा—

“क्या हुआ?”

बबलू ने मोबाइल उसकी ओर बढ़ा दिया।

संदेश पढ़ते ही बिंदिया की आंखें भी फैल गईं।

“मुन्ना...”

बबलू ने कांपती आवाज में कहा—

“यह नाम सिर्फ एक आदमी जानता था...। ”

“कौन ?”

बबलू ने दूर देखते हुए कहा—

“मेरा भाई अमित।”



                                     क्रमशः आगे...


     📖📖 अगले अध्याय में पढ़िए—

            क्या पुराने बरगद के नीचे बबलू की मुलाकात उसके खोए हुए भाई से होगी ?

            क्या अमित का असली अतीत सामने आएगा ?

          सहदेव सिंह ने आखिर अपने दोनों बेटों को अलग क्यों किया था?

            और दूसरी ओर रंजीत जिस अनाथालय की ओर बढ़ रहा है, वहां उसे ऐसा कौन-सा सबूत मिलेगा जो बबलू की पूरी पहचान बदल सकता है ?



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             📖💌📖  बिंदिया और बबलू   उपन्यास के यदि आपने अभी तक पीछे का अध्याय नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। ग्रामीण परिवेश की बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली रहस्यमयी कहानी है। 

            पीछे के अध्याय को पढ़ने के लिए नीचे लिखे उपन्यास के शीर्षक पर क्लिक कीजिए -




   
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