बिंदिया और बबलू - अध्याय – 16 | लिफाफे में बंद अतीत | प्रेम, परिवार और रहस्य की कहानी | हिंदी उपन्यास | किशोरवाणी |







          👩‍❤️‍👩   बिंदिया और बबलू   👩‍❤️‍👩


     
            अभी तक आपने पढ़ा - 

           कुछ राज ऐसे होते हैं जिन्हें आदमी दुनिया से नहीं, स्वयं अपने आप से छिपाता है। मगर समय की आदत है—वह बंद दरवाजों को भी एक दिन खोल देता है। 

      रंजित को पटना जाने पर शर्मा बाबू से यह पता चलता है कि वास्तव में बबलू का नाम बबलू नहीं है। वह तो अपनी नाम और पहचान दोनों बदलकर रह रहा है। 

      आखिर बबलू और अमित के नाम का चक्कर क्या है ?

    क्या सच में बबलू ही अमित है ? 

    जानने के लिए पढ़िए यह अध्याय :- 




             लिफाफे में बंद अतीत

                 ( अध्याय 16 ) 

                                ✍️  कुमार सरोज 


              रात गहरी हो चुकी थी। मंझार गांव की गलियां सुनसान थीं। कहीं-कहीं किसी घर के बाहर टिमटिमाता दिया अंधेरे से लड़ रहा था।

बबलू के हाथ में वही पुराना लिफाफा था, जिस पर केवल एक नाम लिखा था—

“अमित”

       उस नाम को देखते ही जैसे उसके भीतर वर्षों पुराना कोई घाव फिर से हरा हो गया था।

बिंदिया चुपचाप उसके सामने खड़ी थी।

“बबलू... कौन है अमित?”

बबलू ने कोई उत्तर नहीं दिया।

उसने सामने खड़े आदमी की ओर देखा।

“तुम इतने साल बाद यहां क्यों आए हो?”

आदमी ने धीमे स्वर में कहा—

“क्योंकि अब वह समय आ गया है जब तुम्हें अपने अतीत का सामना करना ही पड़ेगा।”

बिंदिया ने बीच में पूछा—

“आप कौन हैं?”

आदमी ने उसकी ओर देखा।

“मेरा नाम श्यामलाल है। कभी मैं पटना में शर्मा बाबू के साथ काम करता था।”

बबलू चौंक गया।

“तो तुम शर्मा बाबू को जानते हो?”

“जानता हूं। और तुम्हें भी उस समय से जानता हूं, जब लोग तुम्हें बबलू नहीं, अमित कहकर बुलाते थे।”

बिंदिया के चेहरे पर आश्चर्य फैल गया।

“अमित?”

बबलू ने आंखें बंद कर लीं।

कुछ क्षण बाद वह धीरे से बोला—

“बिंदिया, आज शायद तुम्हें वह सब जानना पड़ेगा, जिसे बताने की हिम्मत मैं अब तक नहीं जुटा पाया।”

  बबलू ने चारपाई पर बैठते हुए गहरी सांस ली।

“बारह साल पहले मैं पटना में था। मेरे पास न पैसा था, न कोई पहचान। लेकिन पढ़ने की बहुत इच्छा थी।”

बिंदिया चुपचाप सुनती रही।

“मैं दिन में छोटे-मोटे काम करता और रात में पढ़ाई करता था। तभी मेरी मुलाकात शर्मा बाबू से हुई। उन्होंने मेरी मेहनत देखी और मुझे आगे पढ़ने का मौका दिया।”

श्यामलाल ने बीच में कहा—

“तुम्हें याद है वह रात?”

बबलू की आंखें झुक गईं।

“कैसे भूल सकता हूं?”

बिंदिया ने पूछा—

“कौन-सी रात?”

बबलू ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा—

“जिस रात मेरे सारे कागज चोरी हो गए थे।”

बिंदिया चौंकी।

“चोरी ?”

“हां। मेरे सारे प्रमाणपत्र, पहचान के कागज... सब।”

श्यामलाल ने कहा—

“और उसी के बाद तुम्हारी जिंदगी बदल गई थी।”

बबलू ने सिर हिलाया।

“उस घटना के बाद मुझे मजबूरी में दूसरी पहचान के कागज बनवाने पड़े। लेकिन मैंने कभी किसी को धोखा देने के लिए वह रास्ता नहीं चुना था।”

बिंदिया की आंखों में नमी आ गई।

“तो आपने मुझसे भी यह बात क्यों छिपाई?”

बबलू ने उसकी ओर देखा।

“क्योंकि मुझे डर था कि तुम भी बाकी दुनिया की तरह केवल कागज देखोगी, इंसान नहीं।”

बिंदिया ने तुरंत कहा—

“मैंने तुम्हें कागज देखकर नहीं, तुम्हारे कर्म देखकर अपना पति माना है।”

बबलू की आंखें भर आईं।


          उसी समय पटना में रंजीत शर्मा बाबू के पुराने कार्यालय के बाहर खड़ा था।

दरवाजा बंद था।

उसने कई बार दस्तक दी। कोई उत्तर नहीं मिला।

दिनेश घबराकर बोला—

“रंजीत भईया , लगता है शर्मा बाबू कहीं चले गए।”

रंजीत ने दरवाजे पर हाथ रखते हुए कहा—

“नहीं। बात कुछ और है।”

“क्या?”

“जिस आदमी ने कल हमें सच बताने का वादा किया था, वह आज अचानक गायब नहीं हो सकता।”

तभी रंजीत की नजर जमीन पर पड़ी।

वहां एक छोटा-सा कागज पड़ा था।

उसने उठाकर देखा।

उस पर सिर्फ इतना लिखा था—

“जिसे तुम बबलू समझ रहे हो, वह पूरी कहानी नहीं है।”

दिनेश का चेहरा उतर गया।

“अब?”

रंजीत ने कागज मुट्ठी में दबा लिया।

“अब हम उस अमित को खोजेंगे।”


             इधर बबलू ने पुरानी संदूकची खोली। उसमें कुछ पुराने कागज और एक छोटी-सी तस्वीर रखी थी। तस्वीर में दो किशोर लड़के दिखाई दे रहे थे।

बिंदिया ने तस्वीर हाथ में ली।

“यह आप हैं?”

बबलू मुस्कुराया।

“हां।”

“और दूसरा कौन है?”

बबलू ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि श्यामलाल बोल पड़ा—

“अमित।”

कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

बिंदिया तस्वीर को गौर से देखने लगी।

“आप दोनों भाई जैसे लगते हैं।”

बबलू की आंखें नम हो गईं।

“भाई से भी बढ़कर था।”

“फिर वह कहां है?”

बबलू ने सिर झुका लिया।

“यही तो सबसे बड़ा सवाल है।”

श्यामलाल ने धीमे स्वर में कहा—

“अमित मरा नहीं था।”

बबलू ने अचानक उसकी ओर देखा।

“क्या?”

“हां। वह उस रात तुम्हारे साथ था। लेकिन तुम्हारे कागज चोरी होने के बाद वह भी गायब हो गया।”

बिंदिया के चेहरे पर चिंता उभर आई।

“तो इतने साल तक वह कहां था?”

श्यामलाल ने कहा—

“यह मैं नहीं जानता। लेकिन कुछ महीने पहले मुझे उसका पता मिला था।”

बबलू उठ खड़ा हुआ।

“कहां?”

श्यामलाल ने जवाब देने से पहले चारों ओर देखा।

फिर धीमे स्वर में बोला—

“नेपाल सीमा के पास एक छोटे से कस्बे में।”

बबलू जैसे पत्थर का हो गया।


           बाहर अचानक किसी के दौड़ने की आवाज आई। महेश दरवाजा खोलते हुए अंदर आया।

“भईया! भाभी! बहुत जरूरी खबर है।”

बबलू ने पूछा—

“क्या हुआ?”

महेश हांफते हुए बोला—

“सरपंच चाचा के यहां पटना से कोई आदमी आया है। वह आपके बारे में पूछ रहा है।”

बबलू ने तुरंत श्यामलाल की ओर देखा।

श्यामलाल समझ गया।

“लगता है रंजीत को कुछ पता चल गया।”

बिंदिया ने पूछा—

“अब क्या करेंगे?”

बबलू कुछ पल सोचता रहा।

फिर शांत स्वर में बोला—

“अब भागेंगे नहीं।”

“तो?”

“अब सच को उसके घर तक ले जाएंगे।”

बिंदिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मैं भी आपके साथ हूं।”

बबलू मुस्कुराया।

“मुझे पता है।”





         अगली सुबह रंजीत को आखिरकार एक पुराना रजिस्टर मिला। उसमें बारह वर्ष पहले का एक नाम दर्ज था—

“अमित कुमार — ग्रामीण शिक्षा परियोजना।”

रंजीत की धड़कन तेज हो गई।

लेकिन उसके नीचे एक और नाम लिखा था।

“बबलू प्रसाद।”

रंजीत की आंखें फैल गईं।

“एक ही परियोजना में दोनों?”

दिनेश ने कहा—

“तो इसका मतलब दोनों पहले से एक-दूसरे को जानते थे?”

रंजीत ने रजिस्टर बंद कर दिया।

“नहीं दिनेश... मुझे लगता है कहानी इससे बहुत बड़ी है।”

तभी पीछे से किसी की आवाज आई—

“क्योंकि अमित और बबलू दो नाम हैं... लेकिन कहानी एक ही आदमी की नहीं है।”

रंजीत पलटकर खड़ा हो गया।

सामने शर्मा बाबू खड़े थे।

रंजीत ने आश्चर्य से पूछा—

“आप! आप कहां चले गए थे?”

शर्मा बाबू ने गंभीर स्वर में कहा—

“तुम्हें बचाने के लिए।”

“किससे?”

शर्मा बाबू ने चारों ओर देखा।

फिर धीमे स्वर में बोले—

“उन लोगों से, जिन्होंने बारह साल पहले अमित को गायब किया था।”

रंजीत के हाथ से रजिस्टर लगभग छूट गया।

“कौन लोग?”

शर्मा बाबू ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

“अगर तुमने यह सच खोज लिया, तो बबलू की कहानी ही नहीं, कई बड़े लोगों के चेहरे बेनकाब हो जाएंगे।”

रंजीत कुछ बोल नहीं पाया।

दूर कहीं मंदिर की घंटी बजने लगी।

             और उसी समय मंझार गांव में बबलू अपने पुराने संदूक से एक और कागज निकाल रहा था।

कागज के पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

“अमित को बचाना है तो बबलू बनकर जीना होगा।”

बबलू ने कागज को देखा।

उसकी आंखों में आंसू थे।

बिंदिया ने पूछा—

“अब भी मुझे कुछ नहीं बताएंगे?”

बबलू ने उसकी ओर देखा।

“अब कुछ छिपा नहीं है, बिंदिया। बस सही समय का इंतजार है।”



                                        क्रमशः आगे...


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          📖 अगले अध्याय में पढ़िए—

           अमित और बबलू के बीच आखिर क्या रिश्ता था ?

बबलू को अपनी पहचान क्यों बदलनी पड़ी?

बारह साल पहले हुए उस हादसे के पीछे कौन लोग थे?

क्या रंजीत सच की तह तक पहुंच पाएगा?

और क्या बिंदिया बबलू के अतीत का वह राज जान पाएगी, जो उसकी पूरी जिंदगी बदल सकता है?

       
                    📖💌📖 बिंदिया और बबलू उपन्यास के यदि आपने अभी तक पीछे का अध्याय नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। ग्रामीण परिवेश की बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली रहस्यमयी कहानी है। 

            पीछे के अध्याय को पढ़ने के लिए नीचे लिखे उपन्यास के शीर्षक पर क्लिक कीजिए -






         
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