बिंदिया और बबलू - अध्याय – 14 | सहदेव का अधूरा सच | प्रेम, परिवार और रहस्य की कहानी | हिंदी उपन्यास | किशोरवाणी |







         👩‍❤️‍👩   बिंदिया और बबलू  👩‍❤️‍👩



           अभी तक आपने पढ़ा...

                  कभी-कभी आदमी अपने अतीत से भागता नहीं, बल्कि अपनों को बचाने के लिए उसे अपने पीछे छोड़ देता है। मगर बीता हुआ कल कितना भी गहरा क्यों न दबा हो, किसी न किसी दिन उसकी आहट वर्तमान के दरवाजे तक पहुँच ही जाती है।

             रंजीत बबलू का सच जानने पटना पहुँचा था। वहाँ उसकी मुलाकात शर्मा बाबू से हुई, जिनके पास बबलू और उसके पिता सहदेव सिंह से जुड़े कुछ पुराने कागज थे। शर्मा बाबू ने रंजीत को बताया कि बबलू की कहानी उतनी सीधी नहीं है, जितनी वह समझ रहा है।

        इधर मंझार में एक अनजान आदमी बबलू को खोजते हुए आया था। शर्मा बाबू के पास मौजूद एक पुरानी तस्वीर के पीछे सिर्फ चार शब्द लिखे थे—

"सहदेव का अधूरा सच...। "

           अब सवाल यह था कि आखिर सहदेव सिंह ने ऐसा क्या छिपाया था ?




              सहदेव का अधूरा सच

                  ( अध्याय 14 )

        
                                  ✍️  कुमार सरोज 



            शर्मा बाबू के कमरे में अचानक एक अजीब-सी खामोशी छा गई थी।

रंजीत की आँखें उस पुरानी तस्वीर पर टिकी थीं।

"शर्मा बाबू, साफ-साफ बताइए। इस तस्वीर में कौन है?"

शर्मा बाबू ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और गहरी साँस ली।

"यह तस्वीर लगभग बीस साल पुरानी है। उस समय बबलू बहुत छोटा था।"

रंजीत अधीर होकर बोला—

"लेकिन तस्वीर में बबलू नहीं है। फिर इसका बबलू से क्या संबंध है?"

शर्मा बाबू कुछ क्षण चुप रहे।

फिर बोले—

"इसका संबंध बबलू से कम और उसके पिता सहदेव सिंह से ज्यादा है।"

दिनेश ने तुरंत पूछा—

"तो सहदेव बाबू ने ऐसा क्या किया था?"

शर्मा बाबू ने उसकी ओर देखा।

"उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था। बल्कि शायद किसी का जीवन बचाया था।"

रंजीत के चेहरे पर आश्चर्य उभर आया।

"जीवन बचाया था?"

"हाँ। मगर उस जीवन को बचाने की कीमत उन्हें अपनी जिंदगी भर एक झूठ ढोकर चुकानी पड़ी।"


           उधर मंझार में शाम ढल रही थी। बबलू घर के बाहर चारपाई पर बैठा था। बिंदिया उसके पास चुपचाप खड़ी थी।

तभी वही अनजान आदमी फिर दिखाई दिया।

इस बार वह सीधे बबलू के सामने आकर खड़ा हो गया।

उसकी उम्र लगभग पचास वर्ष थी। हाथ में पुराना चमड़े का बैग था और चेहरे पर यात्रा की थकान।

उसने पूछा—

"तुम बबलू हो?"

बबलू ने सावधानी से जवाब दिया—

"जी। मगर आप कौन?"

आदमी कुछ क्षण उसे देखता रहा।

फिर धीमे स्वर में बोला—

"तुम्हारे पिता को मैं बहुत अच्छी तरह जानता था।"

बबलू का चेहरा गंभीर हो गया।

"मेरे पिता को?"

"हाँ। सहदेव सिंह को।"

बिंदिया भी वहीं आकर खड़ी हो गई।

बबलू ने चारपाई से उठते हुए कहा—

"अंदर आइए।"

आदमी ने सिर हिलाया।

"अंदर जाने से पहले एक बात पूछना चाहता हूँ। क्या तुम्हारे पिता ने कभी तुम्हें एक पुरानी लाल डायरी के बारे में बताया था?"

बबलू के चेहरे का रंग बदल गया।

बिंदिया ने भी उसे गौर से देखा।

"नहीं..." बबलू ने धीरे से कहा, "लेकिन आपने यह बात क्यों पूछी?"

आदमी ने बैग को कसकर पकड़ा।

"क्योंकि वह डायरी मेरे पास थी।"


बिंदिया ने तुरंत बात संभाली।

"आप अंदर बैठिए। रास्ते से आए हैं, पहले पानी पीजिए।"

आदमी ने पानी लिया।

बबलू अभी भी उसे ध्यान से देख रहा था।

कुछ देर बाद उसने पूछा—

"आपका नाम?"

"गोपाल प्रसाद। तुम्हारे पिता के पुराने परिचित।"

बबलू ने धीरे से कहा—

"मेरे पिता ने कभी आपके बारे में बताया नहीं।"

गोपाल मुस्कुराया।

"क्योंकि उन्होंने वादा किया था कि जब तक सही समय नहीं आएगा, वह मेरा नाम भी तुम्हें नहीं बताएँगे।"

बबलू चौंका।

"कौन-सा वादा?"

गोपाल ने जवाब देने के बजाय बिंदिया की ओर देखा।

"तुम्हारी पत्नी समझदार लगती है। उसे भी सुनना चाहिए।"

बिंदिया ने शांत स्वर में कहा—

"अगर बात मेरे पति और उनके परिवार से जुड़ी है तो मुझे सुनना ही चाहिए।"

गोपाल ने सिर हिलाया।

"तुम्हारे पिता ने एक बच्चे को बचाया था।"

बबलू की आँखें फैल गईं।

"किस बच्चे को?"

गोपाल कुछ कहता, उससे पहले बाहर से महेश की आवाज आई—

"भईया! सरपंच चाचा बुला रहे हैं!"

गोपाल अचानक चुप हो गया।

बबलू ने पूछा—

"आप कुछ कहने वाले थे?"

गोपाल ने बैग उठाया।

"आज नहीं। कल सुबह मैं तुम्हें वह सब बताऊँगा। मगर उससे पहले तुम्हें अपने पिता की वह लाल डायरी ढूँढ़नी होगी।"

"वह डायरी कहाँ मिलेगी?"

गोपाल ने केवल इतना कहा—

"जहाँ तुम्हारे पिता ने अपनी सबसे बड़ी गलती छिपाई थी।"

और वह बाहर निकल गया।


               उधर पटना में रंजीत अब शर्मा बाबू के घर से निकलने को तैयार नहीं था।

"शर्मा बाबू, आप हमें आधी कहानी सुनाकर नहीं छोड़ सकते।"

शर्मा बाबू बोले—

"कुछ बातें सुनने के लिए नहीं, समझने के लिए होती हैं।"

रंजीत झुंझला गया।

"हमको सिर्फ इतना बताइए कि बबलू के प्रमाणपत्र नकली क्यों थे?"

शर्मा बाबू ने उसकी आँखों में देखा।

"तुम्हें प्रमाणपत्र चाहिए या बबलू का सच?"

रंजीत चुप हो गया।

"दोनों।"

शर्मा बाबू मुस्कुराए।

"तो फिर पहले सहदेव को समझो। बबलू अपने पिता की बनाई हुई कहानी में बड़ा हुआ है।"

रंजीत ने पूछा—

"क्या सहदेव ने उसके प्रमाणपत्र बनवाए थे?"

शर्मा बाबू ने सिर झुका लिया।

"हाँ।"

दिनेश के मुँह से अनायास निकल पड़ा—

"तो हमारा शक सही था!"

शर्मा बाबू ने तुरंत कहा—

"इतनी जल्दी खुश मत हो। सहदेव ने ऐसा क्यों किया, यह जानोगे तो शायद तुम्हारी पूरी कहानी बदल जाएगी।"

रंजीत के चेहरे की खुशी गायब हो गई।

"क्यों?"

शर्मा बाबू ने धीरे से कहा—

"क्योंकि बबलू के प्रमाणपत्र नकली होने की वजह लालच नहीं थी।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

शर्मा बाबू ने आखिरकार बोलना शुरू किया—

"सहदेव का एक सपना था—अपने बेटे को बड़ा आदमी बनाना। लेकिन बबलू पढ़ाई में बिल्कुल रुचि नहीं लेता था। उसकी माँ के गुजर जाने के बाद सहदेव उसे संभाल नहीं पाए। बेटे की हर गलती को वह माँ की कमी समझकर माफ करते गए।"

रंजीत ध्यान से सुन रहा था।

"बबलू स्कूल से भागता था। कॉलेज भी नहीं जाता था। लेकिन सहदेव को लगता था कि बेटा पढ़ रहा है। जब सच सामने आने लगा तो उन्होंने बेटे को डाँटने के बजाय एक गलत रास्ता चुन लिया।"

रंजीत ने पूछा—

"नकली प्रमाणपत्र?"

"हाँ।"

"लेकिन क्यों?"

शर्मा बाबू ने उत्तर दिया—

"क्योंकि सहदेव को डर था कि अगर बबलू की असलियत सामने आ गई तो उसका बेटा समाज की नजरों में हमेशा के लिए गिर जाएगा।"

रंजीत कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

"मतलब सहदेव ने अपने बेटे को बचाने के लिए कानून तोड़ा?"

शर्मा बाबू ने गंभीर स्वर में कहा—

"गलत को सही नहीं कहा जा सकता। मगर किसी गलत काम के पीछे छिपी मजबूरी को समझे बिना पूरी कहानी भी नहीं समझी जा सकती।"


          उधर मंझार गांव में उस रात बबलू सो नहीं पाया। गोपाल की बातें उसके मन में घूम रही थीं।

"लाल डायरी...। "

         उसने पहली बार अपने पिता के पुराने सामान के बारे में सोचना शुरू किया।

बिंदिया ने उसे करवट बदलते देखा।

"नींद नहीं आ रही?"

बबलू ने धीमे स्वर में कहा—

"बिंदिया, अगर मेरे पिता ने सच में मेरे लिए कुछ ऐसा किया था, जिसे दुनिया के सामने नहीं आना चाहिए था तो?"

बिंदिया उसके पास बैठ गई।

"सच से डरकर जिंदगी नहीं जी जाती।"

"मगर मेरी वजह से पिताजी ने क्या-क्या सहा होगा...। "

बिंदिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"आपने जो गलतियाँ की हैं, उनकी जिम्मेदारी आपकी है। मगर अपने पिता की हर गलती का बोझ भी आप अपने सिर पर नहीं उठा सकते।"

बबलू ने उसकी ओर देखा।

"अगर मेरा अतीत तुम्हारे सामने पूरी तरह खुल गया तो ?"

बिंदिया मुस्कुराई।

"तब भी मैं आपके साथ रहूँगी। लेकिन एक शर्त है।"

"क्या?"

"अब से मुझसे कोई नया झूठ नहीं।"

बबलू ने सिर झुका दिया।

"वादा।"

           अगली सुबह बबलू अपने पिता के पुराने कमरे में गया।

पुरानी अलमारी खोली।

कपड़े, पुराने कागज, कुछ तस्वीरें और जमीन के दस्तावेज।

लेकिन लाल डायरी कहीं नहीं थी।

तभी बिंदिया की नजर कमरे के कोने में रखे एक पुराने संदूक पर पड़ी।

"इसे खोलिए।"

बबलू ने संदूक खोला।

ऊपर कुछ पुराने कपड़े थे।

नीचे एक लकड़ी का छोटा डिब्बा।

डिब्बे के भीतर एक चाबी थी।

और चाबी के नीचे एक कागज।

बबलू ने कागज उठाया।

उस पर उसके पिता की लिखावट थी—

"जिस दिन मेरा बेटा सच जानने लायक हो जाए, उस दिन यह चाबी उसे दे देना।"

बबलू की उँगलियाँ काँपने लगीं।

बिंदिया ने पूछा—

"यह किसकी चाबी है?"

बबलू ने कमरे की दीवार की ओर देखा।

वहाँ उसके पिता की पुरानी तस्वीर टंगी थी।

उसने तस्वीर उतारी।

पीछे दीवार में एक छोटा-सा लोहे का ताला दिखाई दिया।

बबलू ने चाबी लगाई।

क्लिक!

ताला खुल गया।

दीवार के भीतर एक छोटी-सी जगह बनी थी।

और उसमें वही थी— लाल डायरी।

बबलू ने डायरी हाथ में ली।

उसके ऊपर सिर्फ एक नाम लिखा था—

"बबलू के लिए...। " 

बिंदिया ने धीमे से कहा—

"इसे पढ़िए।"

बबलू ने डायरी खोली।

पहले पन्ने पर लिखा था—

   " बेटा, अगर तू यह डायरी पढ़ रहा है, तो समझ लेना कि अब मैं तुझसे कुछ छिपाने की हालत में नहीं हूँ। "

बबलू की आँखें भर आईं।

लेकिन अगले ही पन्ने पर जो लिखा था, उसे पढ़ते ही उसके हाथ काँपने लगे।

"बेटा, तुम्हें जिस नाम से दुनिया जानती है, वह तुम्हारा पूरा सच नहीं है।"

पढ़ते ही बबलू शन रह गया। उसके हाथ से डायरी गिर गई।

बिंदिया भी स्तब्ध रह गई।

और उसी क्षण बाहर से गोपाल की आवाज आई—

"बबलू ! अब वक्त आ गया है, तुम्हें अपने जन्म का सच जानना होगा !"

बबलू और बिंदिया ने एक-दूसरे की ओर देखा।

                 कहानी अब सिर्फ नकली प्रमाणपत्रों की नहीं रह गई थी। बबलू के जन्म का रहस्य अब उसके सामने खड़ा था।


                                       क्रमशः आगे...



        ❤️  अगले अध्याय में...

         क्या बबलू सचमुच सहदेव सिंह का अपना बेटा नहीं था ?

        लाल डायरी में उसके जन्म के बारे में क्या लिखा है ?

      गोपाल प्रसाद बबलू के अतीत से कैसे जुड़ा है ?

        और क्या रंजीत को यह सच पता चलने के बाद भी बबलू को बेनकाब करने की वही इच्छा रहेगी ?

             
                   अध्याय 15 में खुलेगा—बबलू के जन्म का वह रहस्य, जिसने सहदेव की पूरी जिंदगी बदल दी थी। तो पढ़ते रहिए...  " बिंदिया और बबलू । " 

             📖💌📖 बिंदिया और बबलू उपन्यास के यदि आपने अभी तक पीछे का अध्याय नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। ग्रामीण परिवेश की बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली रहस्यमयी कहानी है। 

            पीछे के अध्याय को पढ़ने के लिए नीचे लिखे उपन्यास के शीर्षक पर क्लिक कीजिए -





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