बिंदिया और बबल - अध्याय 5 | हर बार मात | रंजीत की नई चाल और बबलू की चतुराई | गांव, प्यार और रहस्य से भरा हिंदी उपन्यास / bindiya-aur-bablu-chapter-5-har-baar-maat-hindi -novel
👩❤️👩 बिंदिया और बबलू 👩❤️👩
मंझार गांव का रहने वाला बबलू बचपन से ही अपने पिता के साथ पटना में रहता था। गांव वालों की नजर में वह एक पढ़ा-लिखा, होनहार और प्रतिभाशाली युवक था, जबकि वास्तविकता यह थी कि वह बिल्कुल अनपढ़ था। अपने बात करने के अनोखे अंदाज और चतुराई के बल पर उसने न केवल पूरे गांव को, बल्कि पटना की एक पढ़ी-लिखी और सुंदर लड़की बिंदिया को भी प्रभावित कर उससे विवाह कर लिया।
पिता की मृत्यु के बाद बबलू अपनी पत्नी बिंदिया के साथ हमेशा के लिए गांव लौट आया। गांव वालों ने ढोल-नगाड़ों और फूल-मालाओं से दोनों का भव्य स्वागत किया। धीरे-धीरे बिंदिया भी अपने मधुर व्यवहार से पूरे गांव की चहेती बन गई।
लेकिन गांव का दबंग और धनी परिवार का लड़का रंजीत, जो कभी बिंदिया से प्रेम करता था, उसे बबलू की पत्नी के रूप में देखकर भीतर ही भीतर जलने लगा। उसने ठान लिया कि वह हर हाल में बबलू की सच्चाई सबके सामने लाकर रहेगा।
एक के बाद एक कई चालें चलने के बावजूद रंजीत हर बार असफल रहा। उधर बबलू ने अपनी सूझ-बूझ से गांव में रात्रि पाठशाला शुरू करवा दी, जहां बिंदिया गांव के स्त्री-पुरुषों और बच्चों को पढ़ाने लगी। इससे गांव में बबलू और बिंदिया का सम्मान और भी बढ़ गया।
अब रंजीत ने मन ही मन यह प्रण कर लिया था कि वह साम, दाम, दंड और भेद—हर उपाय अपनाकर बबलू का भेद खोलकर ही रहेगा।
लेकिन क्या सचमुच वह अपने मकसद में सफल हो पाएगा ?
या फिर हर बार की तरह इस बार भी बबलू अपनी चतुराई से बाजी पलट देगा ?
पढ़िए आगे— " बिंदिया और बबलू " का पाँचवाँ अध्याय — " हर बार मात "।
👩❤️👩 हर बार मात 👩❤️👩
( अध्याय – 5 )
✍️ किशोर
बबलू के घर से निकलते समय रंजीत का चेहरा ऐसा बुझा हुआ था, मानो जुए में अपनी आखिरी बाजी हारकर लौट रहा हो। जिस उत्साह से वह सुबह बिंदिया के हाथ की चाय पीने गया था, उसी उत्साह का अब कहीं नामोनिशान न था। उसके मन में बार-बार यही प्रश्न उठ रहा था कि आखिर बबलू हर बार उसके बिछाए जाल से निकल कैसे जाता है?
वह सिर झुकाए अपने घर की ओर चला जा रहा था कि सामने से सरपंच साहब आते दिखाई पड़े। उनके हाथ में एक सरकारी कागज था और चेहरे पर वही पुरानी गंभीरता।
"अरे बेटा रंजीत!" उन्होंने पास आते ही पुकारा, "जरा इस डीएम साहब की चिट्ठी पढ़कर सुना दो। अधिकारी लोग भी बड़े अजीब होते हैं, सीधे-सीधे हिंदी में नहीं लिख सकते। सब अंग्रेजी में ही लिखते हैं।"
यह सुनते ही रंजीत के चेहरे पर फिर से चमक लौट आई। जैसे डूबते आदमी को तिनके का सहारा मिल गया हो।
वह मुस्कुराकर बोला, "चाचा, आप तो जानते ही हैं, अंग्रेजी में हम भी थोड़े कमजोर हैं। आप बबलू भइया से पढ़वा लीजिए। अभी उन्हीं के घर से आ रहे हैं। घर पर ही होंगे।"
सरपंच कुछ कहते, उससे पहले ही दूर से बबलू आता दिखाई पड़ गया।
"लो, जिसका नाम लिया, वही हाजिर!" सरपंच हंस पड़े।
रंजीत के मन में लड्डू फूटने लगे।
"देखिए चाचा," वह बनावटी मुस्कान के साथ बोला, "बबलू भइया के गांव में आने से तो गांव की रौनक ही बदल गई है।"
"बिलकुल ठीक कहते हो बेटा!" सरपंच ने सहमति में सिर हिलाया।
तभी बबलू भी पास पहुंच गया।
"का बात है चाचा? किस बात पर रंजीत भाई हमारी तारीफ कर रहे हैं?" उसने मुस्कराकर पूछा।
सरपंच ने हाथ का कागज उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, "बेटा, जरा इस चिट्ठी को पढ़कर समझा दो। लगता है सरकार की कोई नई योजना आई है।"
चिट्ठी देखते ही बबलू का कलेजा धक् से रह गया। कागज अंग्रेजी में था और इस समय बिंदिया भी घर में नहाने गई हुई थी। मोबाइल से मदद लेने का कोई उपाय नहीं था।
फिर भी चेहरे पर मुस्कान लाकर वह बोला—
"लाइए चाचा, देखते हैं। रंजीत भाई नहीं पढ़ पाए क्या?"
सरपंच हंसकर बोले, "अरे, यह तो पटना कॉलेज में नाम लिखाकर ही विद्वान बन गया है। ठीक से हिंदी तक नहीं पढ़ पाता, और यह तो अंग्रेजी में है।"
रंजीत का चेहरा उतर गया।
बबलू ने कागज हाथ में लिया और मन ही मन भगवान को याद किया। तभी उसे पांच दिन पहले मोबाइल पर देखा डीएम साहब का प्रेस कॉन्फ्रेंस याद आ गया। नई योजना — 'जल जीवन हरियाली'।
अब उसके चेहरे पर आत्मविश्वास लौट आया।
वह कागज को ध्यान से देखने का अभिनय करते हुए बोला—
"चाचा, सरकार गांवों के पुराने तालाबों और कुओं को फिर से जीवित करना चाहती है। उनकी सफाई और मरम्मत करवाई जाएगी ताकि पानी का संकट दूर हो सके…"
सरपंच बड़े ध्यान से सुन रहे थे।
बबलू आगे बोला—
"हमारे मंझार गांव का पुराना तालाब भी तो सूखकर खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। अगर यह योजना लागू हो गई, तो गांव के लिए बड़ी अच्छी बात होगी।"
सरपंच साहब खुशी से खिल उठे।
"वाह बेटा! यह तो बहुत बढ़िया समाचार है।"
उधर रंजीत की हालत ऐसी हो रही थी, जैसे किसी ने उसके सपनों के महल पर फिर से पानी फेर दिया हो।
वह मन ही मन बड़बड़ाया—
"हे भगवान! यह आदमी है या मायाजाल? आखिर हर बार बच कैसे जाता है?"
उस शाम गांव की पाठशाला में बड़ा ही सुंदर दृश्य था। लालटेन की रोशनी में बच्चे, बूढ़े, स्त्रियां और युवक बैठे थे। सामने बिंदिया सबको पढ़ा रही थी।
योगेश हर पांच मिनट पर कोई न कोई बहाना बनाकर बिंदिया के पास पहुंच जाता।
"भाभी, ई 'अ' के बाद कौन अक्षर आता है?"
और थोड़ी देर बाद फिर—
"भाभी, ई 'आम' में कितना मात्रा लगता है?"
उधर सुजीत हर बार महेश को डांट रहा था—
"अबे महेश! दस बार बताएं कि क से कबूतर होता है, क से कद्दू नहीं!"
महेश मुंह फुलाकर बोला—
"हमको पढ़ना नहीं है। हम तो सिर्फ भाभी का बॉडीगार्ड बनकर आए हैं।"
और यह सुनकर पूरी पाठशाला ठहाकों से गूंज उठती।
लेकिन दूसरी ओर…
रंजीत के मन में अब हंसी नहीं, बदले की आग जल रही थी।
अगली सुबह वह अपने साथियों के साथ फिर नदी किनारे बैठा था।
इस बार उसके चेहरे पर हार की मायूसी नहीं, बल्कि शिकारी की तरह नई चाल की बेचैनी थी।
वह दांत पीसकर बोला—
"अब बहुत हो गया। साम, दाम, दंड, भेद… अब हर उपाय अपनाएंगे। देखता हूं, बबलू कब तक बचता है।"
और उसके होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान फैल गई…
क्रमशः आगे..........
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