बिंदिया और बबलू - अध्याय – 13 | शर्मा बाबू का राज | प्रेम, परिवार और रहस्य की कहानी | हिंदी उपन्यास | किशोरवाणी |
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रंजीत बबलू की असलियत जानने के लिए पटना तक जा पहुँचा था। उसे बबलू के पुराने कॉलेज और प्रमाणपत्रों से जुड़े कुछ ऐसे सुराग मिले थे, जिनसे उसके मन में विश्वास हो गया था कि अब बबलू ज्यादा दिन तक अपनी सच्चाई छिपा नहीं पाएगा।
मगर बबलू और बिंदिया ने अपनी समझदारी से रंजीत की कई चालों को नाकाम कर दिया।
इसी बीच रंजीत को एक ऐसा नाम पता चला, जो बबलू के नकली प्रमाणपत्रों की कहानी से जुड़ा था—शर्मा बाबू।
अब रंजीत को लगने लगा था कि बबलू का सबसे बड़ा राज शायद शर्मा बाबू के पास ही छिपा है।
शर्मा बाबू का राज
( अध्याय- 13 )
✍️ कुमार सरोज
पटना की सुबह हमेशा की तरह भाग रही थी। सड़क पर मोटरगाड़ियों की आवाजें थीं, दुकानों के शटर उठ रहे थे और चाय की दुकानों पर बैठे लोग देश-दुनिया की समस्याओं का समाधान चाय के साथ ही कर रहे थे।
लेकिन रंजीत के लिए उस सुबह पटना की भीड़ में एक ही आदमी सबसे महत्वपूर्ण था—शर्मा बाबू।
रंजीत पिछले दो दिनों से उसके बारे में जानकारी जुटा रहा था।
उसे मालूम हुआ था कि शर्मा बाबू कभी कॉलेज के कागजी कामकाज से जुड़े एक छोटे-से दफ्तर में काम करते थे और पुराने प्रमाणपत्रों तथा रजिस्टरों की अच्छी जानकारी रखते थे।
रंजीत एक पुराने मकान के सामने खड़ा होकर अपने साथी दिनेश से बोला—
"दिनेश, अगर आज शर्मा बाबू मिल गए न, तो समझो बबलू की सारी अकड़ निकल गई।"
दिनेश ने इधर-उधर देखते हुए कहा—
"मगर एक बात है। अगर शर्मा बाबू ने तुम्हें पहचानने से इनकार कर दिया तो?"
रंजीत हँस पड़ा।
"हमको पहचानें या न पहचानें, बबलू को तो पहचानते ही होंगे।"
दोनों दरवाजे तक पहुँचे।
रंजीत ने दस्तक दी।
कुछ देर बाद भीतर से एक बुजुर्ग आवाज आई—
"कौन है?"
"शर्मा बाबू से मिलना है।"
दरवाजा खुला। सफेद बाल, मोटा चश्मा और चेहरे पर वर्षों की थकान लिए एक बुजुर्ग सामने खड़े थे।
रंजीत ने तुरंत पूछा—
"आप ही शर्मा बाबू हैं?"
बुजुर्ग ने कुछ क्षण उसे देखा।
"हाँ। लेकिन तुम कौन?"
रंजीत के चेहरे पर विजय की चमक आ गई।
"हम मंझार गांव से आए हैं। बबलू सिंह को जानते हैं?"
शर्मा बाबू का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
उन्होंने दरवाजा थोड़ा और खोलते हुए कहा—
"अंदर आओ।"
कमरे में चारों तरफ पुराने कागजों के बंडल पड़े थे। एक कोने में लकड़ी की पुरानी अलमारी थी, जिस पर धूल की मोटी परत जमी थी।
शर्मा बाबू ने दोनों को बैठने का इशारा किया।
"बबलू के बारे में क्या जानना चाहते हो?"
रंजीत ने अपनी आवाज धीमी कर ली।
"हम जानना चाहते हैं कि उसके स्कूल और कॉलेज के प्रमाणपत्र असली हैं या नकली।"
शर्मा बाबू कुछ देर चुप रहे।
फिर बोले—
"तुम्हें बबलू से क्या दुश्मनी है?"
रंजीत सकपका गया।
"दुश्मनी की बात नहीं है। गांव का मामला है। सच सामने आना चाहिए।"
शर्मा बाबू हल्का-सा मुस्कुराए।
"सच सामने लाने वालों की आँखों में अक्सर अपना ही सच छिपा होता है, बेटा।"
दिनेश ने रंजीत की ओर देखा।
रंजीत ने बात बदलते हुए पूछा—
"आप बबलू के प्रमाणपत्रों के बारे में जानते हैं?"
शर्मा बाबू ने सीधे जवाब नहीं दिया।
उन्होंने अलमारी की ओर देखा।
फिर धीरे से बोले—
"जानता हूँ।"
रंजीत की आँखें चमक उठीं।
"तो फिर बताइए!"
शर्मा बाबू ने सिर हिलाया।
"इतनी जल्दी नहीं। कुछ सच कागज पर नहीं होते, लोगों की मजबूरी में लिखे होते हैं।"
उधर मंझार गांव में सुबह की धूप खेतों पर उतर चुकी थी।
बिंदिया रात्रि पाठशाला के बच्चों की कॉपियाँ जाँच रही थी। महेश सामने बैठा अपनी कॉपी छिपाने की कोशिश कर रहा था।
बिंदिया ने पूछा—
"महेश जी, अपनी कॉपी क्यों छिपा रहे हैं?"
महेश ने मुस्कुराकर कहा—
"भाभी, कॉपी नहीं छिपा रहे हैं। इसमें जो ज्ञान लिखा है, उसे दूसरों की नजर से बचा रहे हैं।"
बिंदिया हँस पड़ी।
"अच्छा! जरा दिखाइए तो आपका ज्ञान।"
महेश ने कॉपी आगे कर दी।
बिंदिया ने देखा तो पूरे पन्ने पर केवल एक ही लाइन लिखी थी—
'भारत हमारा देश है।'
वह भी पाँच बार।
बिंदिया ने पूछा—
"यह क्या है?"
महेश बोला—
"अभ्यास है भाभी। एक बात को बार-बार लिखने से दिमाग में बैठ जाती है।"
पास बैठे सुजीत ने तुरंत कहा—
"तुम्हारे दिमाग में बैठने से पहले ही कलम थक गई होगी।"
महेश ने उसे घूरा।
"तुम चुप रहो। तुम डॉक्टर होकर भी अभी तक अपनी शादी नहीं कर पाए।"
सुजीत बोला—
"शादी करने के लिए डॉक्टर होना जरूरी नहीं, मगर तुम्हारी शक्ल देखकर लड़की का जिंदा रहना जरूरी है।"
आंगन में बैठे सभी लोग ठहाका मारकर हँस पड़े।
बिंदिया भी मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी।
उसी समय बबलू चुपचाप आकर बिंदिया के पास बैठ गया।
बिंदिया ने उसके चेहरे को देखते ही पूछा—
"क्या हुआ? आज बड़े गंभीर दिखाई दे रहे हैं।"
बबलू ने धीमे स्वर में कहा—
"रंजीत पटना गया है।"
बिंदिया का चेहरा गंभीर हो गया।
"आपको कैसे पता?"
"कल सरपंच चाचा के पास रंजीत का फोन आया था। बातों-बातों में पटना का जिक्र कर रहा था।"
बिंदिया कुछ देर सोचती रही।
फिर बोली—
"तो अब?"
बबलू ने मुस्कुराने की कोशिश की।
"अब वही होगा जो हमेशा होता आया है। वह हमारी पोल खोलने जाएगा और अपनी ही कोई पोल खोलकर लौटेगा।"
बिंदिया हँसी नहीं।
उसने गंभीर होकर कहा—
"हर बार किस्मत साथ दे, यह जरूरी नहीं है बबलू।"
बबलू चुप हो गया।
बिंदिया ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा—
"अगर कभी सच सामने आया तो मैं आपसे नाराज नहीं होऊँगी। लेकिन एक बात याद रखिएगा—मैं झूठ से नहीं, आपकी अच्छाई से आपके साथ हूँ।"
बबलू की आँखें नम हो गईं।
"बिंदिया, तुम्हारे जैसी पत्नी मिलने के बाद आदमी को भगवान से और क्या मांगना चाहिए?"
नपटना में शर्मा बाबू ने आखिरकार एक पुरानी फाइल निकाली। फाइल पर धूल जमी थी।
उन्होंने उसे मेज पर रखा और बोले—
"इसमें बबलू के बारे में कुछ पुराने कागज हैं।"
रंजीत आगे झुक गया।
"यही चाहिए हमें!"
शर्मा बाबू ने पहला कागज निकाला।
रंजीत उसे देखकर चौंक गया।
उस पर बबलू का नाम था।
लेकिन नीचे दर्ज जन्मतिथि और पिता का नाम सही था।
दूसरे कागज में स्कूल का विवरण था।
तीसरे में कॉलेज का।
रंजीत के चेहरे पर उत्साह बढ़ता गया।
"देखा दिनेश! मैंने कहा था न कि आज सबूत मिलेगा!"
शर्मा बाबू ने अचानक फाइल बंद कर दी।
रंजीत भड़क गया।
"अरे! आपने बंद क्यों कर दिया?"
शर्मा बाबू ने शांत स्वर में कहा—
"क्योंकि तुमने अभी आधा सच देखा है।"
"आधा सच?"
"हाँ। बाकी आधा सच जानोगे तो शायद बबलू को देखने का तुम्हारा नजरिया बदल जाए।"
रंजीत चुप हो गया।
शर्मा बाबू ने एक पुराना लिफाफा निकाला।
उस पर केवल इतना लिखा था—
'सहदेव सिंह — व्यक्तिगत'
रंजीत ने नाम पढ़ते ही कहा—
"यह तो बबलू के पिता का नाम है!"
शर्मा बाबू ने सिर हिलाया।
"हाँ। और इस लिफाफे में वह कहानी है जिसे शायद बबलू खुद भी पूरी तरह नहीं जानता।"
रंजीत की आवाज काँपने लगी।
"तो बताइए न शर्मा बाबू! आखिर क्या था इसमें?"
शर्मा बाबू ने लिफाफा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।
लेकिन तभी बाहर से किसी ने जोर से दरवाजा खटखटाया।
ठक... ठक... ठक!
तीनों चौंक गए।
शर्मा बाबू ने फौरन लिफाफा बंद कर दिया।
"कौन?"
बाहर से आवाज आई—
"शर्मा जी, दरवाजा खोलिए। बहुत जरूरी काम है।"
शर्मा बाबू का चेहरा अचानक पीला पड़ गया।
रंजीत ने पूछा—
"क्या हुआ?"
शर्मा बाबू ने धीरे से कहा—
"जिस आदमी से मैं पिछले पंद्रह साल से बच रहा हूँ... शायद वही आज यहाँ आया है।"
रंजीत और दिनेश एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
दरवाजे पर फिर दस्तक हुई।
इस बार आवाज और कठोर थी—
"शर्मा जी! हमें पता है कि आप अंदर हैं।"
शर्मा बाबू ने फुसफुसाकर कहा—
"रंजीत, अगर तुम्हें बबलू का सच जानना है तो अभी चुप रहना।"
उधर मंझार में बबलू अपने घर के बाहर बैठा था। तभी महेश दौड़ता हुआ आया।
"भईया! एक आदमी आपको खोज रहा है।"
बबलू ने पूछा—
"कौन?"
महेश बोला—
"नाम तो नहीं बताया। लेकिन कह रहा था कि पटना से आया है।"
बबलू के चेहरे का रंग बदल गया।
"पटना से?"
उसी समय बिंदिया भी बाहर आ गई। उसने बबलू के चेहरे को देखा और समझ गई कि बात मामूली नहीं है।
"कौन आया है?"
महेश ने कहा—
"पता नहीं भाभी। मगर आदमी बड़ा अजीब था। उसने आते ही पूछा—'बबलू सिंह का घर यही है?' और फिर बिना कुछ बताए चला गया।"
बिंदिया ने बबलू की ओर देखा।
"लगता है रंजीत अकेला नहीं लौटा है।"
बबलू ने गहरी साँस ली।
"नहीं बिंदिया... मुझे लगता है अब मेरा अतीत खुद मेरे दरवाजे तक आ गया है।"
और तभी पटना में शर्मा बाबू ने काँपते हाथों से लिफाफा फिर खोला।
अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।
रंजीत ने तस्वीर देखते ही पूछा—
"यह कौन है?"
शर्मा बाबू ने तस्वीर को देर तक देखा।
फिर उनकी आँखों में एक अजीब-सी नमी उतर आई।
"यह बबलू नहीं है..."
रंजीत चौंक गया।
"तो कौन है?"
शर्मा बाबू ने धीमे स्वर में कहा—
"जिसे तुम बबलू समझ रहे हो उसकी कहानी इससे कहीं ज्यादा पुरानी है।"
रंजीत की साँस जैसे रुक गई।
शर्मा बाबू ने तस्वीर पलटी।
पीछे केवल चार शब्द लिखे थे—
"सहदेव का अधूरा सच..."
क्रमशः आगे...
अगले अध्याय में...
शर्मा बाबू के पास मौजूद तस्वीर में कौन है ?
सहदेव सिंह ने बबलू के अतीत का कौन-सा राज छिपाया था?
पटना से मंझार पहुँचा वह अनजान आदमी आखिर कौन है?
और क्या रंजीत सच के इतने करीब पहुँच चुका है कि अब बबलू के लिए बच निकलना मुश्किल होगा?
अध्याय 14 में खुलेगा—बबलू की जिंदगी का वह पन्ना, जिसे उसके पिता ने पूरी दुनिया से छिपाकर रखा था।
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