बिंदिया और बबलू – अध्याय 4 | चिट्ठी का रहस्य और रंजीत की दूसरी हार | गांव, प्यार और रहस्य से भरा हिंदी उपन्यास / bindiya-aur-bablu-chapter-4-chiththi-ka -rahasy-hindi -novel

   





              👩‍❤️‍👩  बिंदिया और बबलू   👩‍❤️‍👩



             मंझार गांव की गलियों में अब बिंदिया और बबलू की चर्चा हर जुबान पर है।

    एक तरफ योगेश अपने सपनों की रानी खोजने में लगा है, तो दूसरी तरफ रंजीत हर हाल में बबलू की सच्चाई दुनिया के सामने लाना चाहता है। मगर बबलू की चतुराई और बिंदिया का विश्वास हर बार उसकी चाल को नाकाम कर देता है।

   "बिंदिया और बबलू" के चौथे अध्याय में हास्य, प्रेम, रहस्य और भावनाओं का अनोखा संगम देखने को मिलेगा।



                  
             

   चिट्ठी का रहस्य और रंजीत की दूसरी हार

                    ( अध्याय – 4 )

                                          ✍️   किशोर 


                   सुबह का समय था। मंझार गांव के पूरब में फैली हल्की धूप अभी-अभी धरती पर उतर रही थी। कहीं गायों के गले की घंटियाँ बज रही थीं, तो कहीं चूल्हों से उठता धुआँ आसमान की ओर बढ़ रहा था।
                इसी बीच योगेश बड़े उत्साह में देवी मंदिर की ओर चला जा रहा था।

    कल ही पाई बिगहा के पारस पंडित ने उसे सात दिन तक देवी माता की पूजा करने की सलाह दी थी। सुंदर पत्नी पाने का सपना उसके सिर पर इस कदर सवार था कि आज उसे मंदिर के लाउडस्पीकर पर बजती आरती भी किसी फिल्मी गीत से कम नहीं लग रही थी।

      रास्ते भर वह कभी मुस्कुराता, कभी इठलाता और कभी खुद ही गुनगुनाने लगता।

"जय अम्बे गौरी..." की धुन पर उसके पैर ऐसे थिरक रहे थे, मानो किसी बारात में डीजे बज रहा हो।

   कुएँ पर स्नान करने के बाद केवल गमछा लपेटे योगेश मंदिर में जा पहुँचा।

पूजा समाप्त करके जैसे ही वह बाहर निकला, सामने से बिंदिया आती दिखाई दी।

उसे देखते ही योगेश का कलेजा खुशी से उछल पड़ा।
" अरे वाह! आज तो देवी माता ने जल्दी सुन ली। "

बिंदिया मुस्कुराई।

     " क्या बात है योगेश भैया ? आजकल मंदिर में भी दिखाई देने लगे हैं। कहीं काम-धंधा मंदा तो नहीं पड़ गया ? " 

    उसकी मधुर आवाज सुनकर योगेश का दिमाग जैसे काम करना ही भूल गया। कुछ पल तक वह बस बिंदिया को देखता ही रह गया।

" क्या हुआ ? कहाँ खो गए ? "

योगेश जैसे सपनों से बाहर आया।

" भाभी... आज तो हमारा पूजा सफल हो गया। आपको देखने के लिए हम कितना जतन किए हैं, मगर आज तक इतना पास से नहीं देख पाए थे। "

बिंदिया खिलखिलाकर हँस पड़ी।

" तो घर ही आ जाते। "

इतने में पीछे से महेश प्रकट हुआ।

" भाभी, ई पागल के घर मत बुलाइए। कल ही लड़की के चक्कर में मार खाकर आया है। "

योगेश तुरंत भड़क उठा।

" भाभी, ई झूठ बोल रहा है। खुद निकम्मा है, इसीलिए हमसे जलता है। "

महेश कुछ और बोलता, उससे पहले ही बिंदिया मुस्कुराकर मंदिर के भीतर चली गई।

तभी सुजीत हाँफता हुआ कुएँ के पास पहुँचा।

" अरे तुम यहाँ घंटी बजा रहे हो और हम तुम्हें पूरे गांव में खोज रहे हैं। " 

" का हुआ ? "

" बड़ी खुशखबरी है। "

" जल्दी बताओ! "

" बिंदिया भाभी गांव के अनपढ़ लोगों को पढ़ाने वाली हैं। "

इतना सुनना था कि योगेश खुशी से सुजीत को गोद में उठाकर नाचने लगा।

नाचते-नाचते उसका गमछा भी खुल गया।

" अरे बाप रे! "

सुजीत चीखा।

" पहले खुद को ढँको ! "

दोनों की हालत देखकर अगर कोई तीसरा आदमी वहाँ होता, तो हँसते-हँसते लोटपोट हो जाता।


             इधर बिंदिया जैसे ही पूजा करके महेश के साथ अपने घर के आगे पहुंचती है कि वहां बबलू के साथ रंजित को बैठा देख चौंक जाती है। मगर वह तुरंत सामान्य हो जाती है। 

                कल बबलू रंजीत को चाय पीने के लिए बुलाया था, जिसके कारण ही आज रंजीत सुबह सुबह ही चाय पीने आ गया था। 


 " बिंदिया, ये मेरा बचपन का लंगोटिया यार और गांव के सबसे बड़े किसान हरिहर सिंह का इकलौता बेटा रंजीत है। कल तुम्हारे हाथ का चाय पीने का जिद्द किया तो मैंने इसे आज चाय पर बुला लिया। " 


  " अच्छा किए। इसी बहाने कम से कम आपके गांव के दोस्तों से जान पहचान भी हो जायेगी। " 


            रंजीत तो यह सोचकर अन्दर ही अन्दर खुश हो रहा था कि आज बिंदिया अपने सामने अचानक मुझे देखकर जरूर चौकेगी। और बबलू को उसके बारे में पता चल जायेगा। मगर यहां तो एकदम उल्टा हो रहा था। बिंदिया एकदम उससे अनभिज जैसा व्यवहार कर रही थी। उसके चेहरे पर किसी तरह का कोई बदलाब या चिंता की लकीरें भी नहीं दिख रही थी। 


 " बिंदिया हम तो सोच रहे हैं, गांव के सभी दोस्तों को एक ही दिन टी पार्टी दे देते हैं। कितना का रोज मजाक सुनेंगे। " 


 " यही अच्छा रहेगा। आप लोग तब तक बातें कीजिए मैं चाय बनाकर लाती हूं । " 


     कहती हुई बिंदिया घर के अंदर चली जाती है।

             पीछे से रंजीत को खा जाने वाली निगाहों से घूरता हुआ धीरज भी चल देता है। 


  " बबलू भाई मेहरारू तो एकदम झकास खोजे हो। पढ़ी लिखी उपर से शहरी। कहां से फंसा लिया यार ? " 


 " यह सबके बस की बात नहीं है। पैसा और डिगरी रहने से ही सबकुछ नहीं मिल जाता है। उसके लिए दिमाग लगाना पड़ता है। " 


 " हमको भी अब विश्वास हो गया कि तुमसे ज्यादा तेज इस गांव में कोई और नहीं है। " 


            दोनों अभी बातें ही कर रहे थे कि तभी वहां पर हाथ में चिठ्ठी लिए तेतरी चाची आ जाती है। यह भी रंजीत का ही एक योजना था। 


 " बबूल बेटा, देखो न संजू के ससुराल वाले एक चिठ्ठी भेजे हैं। जरा पढ़कर बताओ तो कि इसमें क्या लिखा है। " 


   तेतरी चाची आते ही अपने हाथ का लिफाफा बबलू को देती हुई बोली।


           बबलू रंजीत का प्लान तुरंत समझ जाता है। वह किसी के चेहरे क्या उसके मन को भी पढ़ने में महारत हासिल की हुए था। 


 " चाची इसमें इतना परेशान होने की क्या जरुरत है, मैं अभी पढ़ कर सुना देता हूं। वैसे यह चिठ्ठी तो कोई भी पढ़कर सुना देता। " 


 " शादी की बात है बेटा। गांव में सब पर विश्वास नहीं कर सकते हैं। मगर तुम पर हमको पुरा विश्वास है। " 


  " तेतरी चाची ठीक कह रही है, बबलू। पढ़ दो बेचारी की चिठ्ठी । " 


           बबलू लिफाफा में रखा चिठ्ठी निकालकर पढ़ने लगता है।

             रंजीत को जरा भी विश्वास ही नहीं हो रहा था कि आखिर बबलू इतना धाराप्रवाह पढ़ कैसे रहा था। जबकि उसके भाई दिनेश के अनुसार तो वह अंगूठा छाप था। 

          तेतरी भी मन ही मन अब रंजीत को कोस रही थी। वह उसी के कहने पर तो उसी का लिखा हुआ चिठ्ठी लेकर आई थी। 

             वास्तव में यह सब कारनामा बबलू ने अपने मोबाइल और ब्लूटूथ वाला वायरलेस हेडफोन से किया था। बबलू हमेशा अपने हाथ में फोन और कान में वायरलेस हेडफोन लगाए रहता था। वह रंजीत को बातों में उलझाकर चिठ्ठी का फोटो बिंदिया को भेज दिया था, और उस चिठ्ठी को बिंदिया ही पढ़कर बबलू को घर के अंदर से फोन पर सुना रही थी। यह सब बबलू इतनी सफाई से किया था कि रंजीत जैसा धूर्त इंसान के पकड़ में भी नहीं आ सका। यही तो बबलू की कलाकारी थी। तभी तो बिंदिया जैसी पढ़ी लिखी शहरी लड़की भी उसकी असलीयत नहीं पकड़ पाई थी। 

               तेतरी चाची अंत में चिठ्ठी लेकर चली जाती है। इधर तेतरी चाची जाती है और उधर घर के अन्दर से चाय लिए बिंदिया वहां आ जाती है। 

               रंजीत का चेहरा अब पहले जैसा खिला हुआ नहीं था।

              बिंदिया दोनों को चाय देकर घर के अन्दर चली जाती है।  

             रंजीत भी जल्दी जल्दी चाय पीकर वहां से चल देता है। 

           बिंदिया अभी अपने कमरे में आकर बैठती ही है कि बाहर से बबलू भी कमरे में आ जाता है। अभी पता नहीं क्यों बिंदिया के चेहरे पर सोच की लकीरें उभरी हुई थी। 


 " क्या हुआ, तुम कुछ परेशान दिख रही हो। " 


  बबलू बिंदिया के उदास चेहरे को देखते ही पुछ बैठा।


 " मैं आपको एक बात बताना चाह रही थी। उसी बात को लेकर मैं थोड़ी परेशान हूं। "


 " रंजीत को तुम पहले से जानती थी। यही बताना चाहती हो न। " 


 " आपको कैसे पता ? " 


 " बिंदिया जी, मैं बबलू हूं। जो किसी का सिर्फ चेहरा देख कर उसके दिल की बात समझ जाता है। तुम्हें परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। रंजीत जैसे लोग हमें या तुम्हें कुछ नहीं बिगाड सकते हैं। बैसाखी के सहारे चलने वाला इंसान कभी दौड़ते हुए इन्सान का मुकाबला नहीं कर सकता है। "


  " मगर आपको कैसे पता चला। मैंने तो कभी कुछ बताया ही नहीं ? " 


 " जिस दिन तुम गांव में कदम रखी थी, और तुम पहली बार रंजीत को देखी थी तो कुछ देर के लिए तुम्हारे चेहरे का रंग फीका पड़ गया था। मैं तभी समझ गया था कि कुछ न कुछ बात है। बाद में जब रंजीत से उसके कॉलेज के बारे में पुछा तो वह भी अपना कॉलेज का नाम तुम्हारे कॉलेज का ही बताया। फिर मैं सारा माजरा समझ गया। " 


 " आप सच में बहुत जीनियस हैं। " 


  कहती हुई बिंदिया खुशी के मारे बबलू से लिपट जाती है।  


  " बिंदिया तुम साथ हो तो हम अंगूठा छाप बबलू पुरी दुनिया भी जीत सकते हैं। " 


     कहते हुए बबलू भी बिंदिया को बाहों में भर लेता है। 

        
             एक तरफ योगेश का प्रेम रोग, दूसरी तरफ रंजीत की नई साजिश और बीच में बबलू की ऐसी चतुराई कि दुश्मन फिर रह गया हैरान !

           क्या रंजीत कभी बबलू का राज जान पाएगा ?

जानिए इस मजेदार और रोमांचक अध्याय में।
पूरा अध्याय पढ़ें केवल "किशोरवाणी" पर।
  
                   बिंदिया और बबलू    उपन्यास का पहला, दूसरा या तीसरा अध्याय आपने यदि अभी तक नहीं पढ़ा है तो आप एक बार उसे भी जरूर पढ़िए। बहुत ही मार्मिक और ग्रामीण परिवेश की भावपूर्ण रचना है। 

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