मां … मेरा कसूर क्या था ? | एक लावारिस बच्चे की दिल छू लेने वाली कविता / maa-mera-kasoor-kya-tha-hindi-poem






                  मां… एक ऐसा शब्द, जिसमें पूरी दुनिया की ममता और सुकून छिपा होता है।
लेकिन अगर यही “मां” किसी बच्चे के जीवन से छिन जाए, तो उसका बचपन सिर्फ सवाल बनकर रह जाता है।

              यह कविता एक ऐसे ही बच्चे की आवाज़ है—
जिसे जन्म तो मिला, लेकिन मां की गोद नहीं…
जिसे जिंदगी तो मिली, मगर अपनापन नहीं।

“ मां… मेरा कसूर क्या था ? ”

सिर्फ एक सवाल नहीं, बल्कि हर उस दिल की चीख है,
जो ममता के बिना अधूरा रह गया।






                मां… मेरा कसूर क्या था ?

                                      ✍️   किशोर 



मां…
बस एक बार बता दे—
मेरा कसूर क्या था?
क्यों छोड़ गई मुझे यूँ,
जैसे मैं कोई बोझ थी… कोई गलती थी तेरी।

तू रखती जैसे भी—मैं रह लेती,
तेरे हर दर्द को अपना कह लेती,
तुझसे कभी कुछ न मांगती… कसम से।

भूखी रह जाती, मगर रोती नहीं,
फटे कपड़ों में भी हंस लेती,
बस तेरे होने का सहारा काफी था।

मुझे महल नहीं चाहिए था मां,
तेरे आँचल का एक कोना ही जन्नत था,
जहां सिर रखकर सारी दुनिया भूल जाती।

यहाँ तो हर कोई ठोकर मारता है,
जिसे देखो वही जख्म दे जाता है,
तू होती… तो कम से कम ये दर्द न मिलता।

मैं तो बस तेरी गोद चाहती थी,
तेरी उँगली पकड़कर चलना चाहती थी,
मुझे दुनिया नहीं… बस “मां” चाहिए थी।

आज भी हर चेहरे में तुझे ढूंढती हूँ,
हर आहट पर दिल ठहर जाता है,
शायद तू आए… और मुझे पहचान ले।

मरते दम तक ये खालीपन रहेगा,
एक अधूरा सा रिश्ता… एक अधूरी सी पुकार,
जो कभी पूरी नहीं होगी।

पर सुन मां…
किसी और के साथ ऐसा मत करना,
अपनी ममता को यूँ हारने मत देना।

मेरे हिस्से का प्यार…
किसी और बच्चे को दे देना,
शायद मेरी तरह वो तन्हा न हो।

सवाल आज भी बहुत हैं दिल में,
पर अब तुझसे कोई शिकायत नहीं…
क्योंकि दर्द से ज्यादा,
आज भी तुझसे मोहब्बत है, मां।




             💔   करुणामई संदेश 


यह कविता सिर्फ शब्दों का मेल नहीं, बल्कि उन अनगिनत बच्चों की आवाज़ है,
जो आज भी “मां” कहने के लिए तरसते हैं।

हर मां से बस एक विनती है—

अपनी ममता को कभी कमजोर मत होने देना।
क्योंकि एक मां की गोद ही बच्चे की पूरी दुनिया होती है।



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