रिश्तों का सौदा | आज के रिश्तों की कड़वी सच्चाई / rishton-ka-sauda-hindi-poem
आज के इस बदलते दौर में रिश्तों की परिभाषा भी बदलती जा रही है।
जहाँ कभी खून के रिश्ते सबसे पवित्र माने जाते थे,
वहीं आज वही रिश्ते लालच और स्वार्थ की आग में जलते दिखाई देते हैं।
यह कविता सिर्फ कुछ शब्दों का मेल नहीं,
बल्कि उस कड़वी सच्चाई का आईना है
जिसमें इंसान अपने ही अपनों का दुश्मन बन बैठा है।
जब दौलत रिश्तों से बड़ी हो जाए,
तो इंसानियत कहीं खो जाती है—
और तब जन्म लेती है ऐसी दर्दनाक कहानियाँ,
जो दिल को झकझोर देती हैं।
रिश्तों का सौदा
✍️ किशोर
आज के ज़माने में मैंने कैसे–कैसे रिश्ते देखे हैं,
वक्त पड़ने पर अपनों को ही खून करते देखे हैं।
कहीं बाप को बेटे से, तो कहीं बेटे को बाप से,
दौलत की ख़ातिर एक-दूजे का खून करते देखे हैं।
इंसानियत का नाम अब मानो मिट सा गया है,
तभी तो इंसान को अपनों को ही नोचते देखा है।
अब रिश्ते खून से नहीं, पैसों से तौले जाते हैं,
दौलत के आगे हर रिश्ते को झुकते देखा है।
प्यार अब पूजा नहीं, बस एक ज़रूरत बन गया है,
तभी तो अमीरों को कई चेहरों से इश्क़ करते देखा है।
आज के ज़माने में मैंने कैसे–कैसे रिश्ते देखे हैं,
वक्त पड़ने पर अपनों को ही खून करते देखे हैं।
प्यारा संदेश
रिश्ते कभी पैसों से नहीं,
बल्कि विश्वास, प्रेम और त्याग से बनते हैं।
दौलत की चमक भले ही कुछ समय के लिए आँखों को भटका दे,
लेकिन सच्चे रिश्तों की गर्माहट ही जीवन को सुकून देती है।
अगर आज भी हम नहीं संभले,
तो वो दिन दूर नहीं जब इंसान के पास सब कुछ होगा पर अपने नहीं होंगे।
इसलिए रिश्तों को बचाइए,
उन्हें समझिए, उन्हें निभाइए…
क्योंकि जब रिश्ते टूटते हैं,
तो सिर्फ दिल नहीं—
पूरी ज़िंदगी बिखर जाती है। 💔
यह कविता भी आम जन के अंतरात्मा की पुकार है। भ्रष्ट राजनेताओं से सभी चिंतित हैं बस कोई खुल कर बोल नहीं पाता है। नेता बनना चाहता हूं मगर क्या करूं कविता भी एक युवक के दिल की अथाह पीड़ा को बयां करती है।
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