कौन कहता है मेरा कोई अपना नहीं | एक बेघर इंसान की सच्ची कविता / kaun-kahata-hai-mera-koi-apana -nahi -hindi-poem







                  आज की दुनिया में हर इंसान एक घर की तलाश में है—
चार दीवारों वाला, आराम और सुरक्षा से भरा हुआ घर।

लेकिन क्या हो अगर कोई ऐसा भी हो…
जिसके पास न कोई ठिकाना हो, न कोई अपना,
फिर भी वो खुद को इस पूरी दुनिया का मालिक मानता हो?

यह कविता उसी अनकही सच्चाई को बयां करती है—
जहां “बेघर” होना मजबूरी नहीं, बल्कि एक अलग तरह की आज़ादी है।
जहां रिश्तों की भीड़ में भी अकेले लोग हैं,
और अकेले होकर भी कोई पूरी दुनिया को अपना मान लेता है।

यह सिर्फ शब्द नहीं हैं…
यह एक ऐसी सोच है, जो आपको अंदर तक हिला देगी।






   कौन कहता है मेरा कोई अपना नहीं

                                ✍️   किशोर 



कौन कहता है… कहता है कौन,
कि इस जहां में मेरा कोई अपना नहीं,
कि मेरा कोई ठिकाना नहीं,
कि मेरे लिए न कोई रोता, न कोई हंसता।

मैं आज खुलकर कहता हूँ—
मेरा घर तो पूरा संसार है।
माटी, वृक्ष, जल और पवन—
ये सभी तो मेरे अपने हैं,
फुटपाथ पर पलते हर जीव में भी
मुझे अपना ही अंश दिखता है।

मुझे न धूप की तपिश का भय,
न आंधियों का कोई खौफ,
न बारिश की बूंदों से शिकायत,
न बिजली-पानी के जाने की चिंता।
न पेट की आग में भागमभाग,
न दौलत के लिए अपनों से धोखा,
न रिश्तों में छल, न जज़्बातों का खून,
न सोने को मखमली बिस्तर की चाह।

मेरा मित्र तो वह वृक्ष है,
जो तपती धूप में छाया बन जाता है,
जो बारिश की हर बूँद को
अपने सीने पर थाम लेता है।
धरती मां ही मेरी जननी है—
जो अपने आंचल में
मेरी भूख और प्यास मिटाती है।

और वह मेरा नन्हा कुत्ता मित्र—
जिसका मुलायम स्पर्श
किसी मखमली सेज से कम नहीं,
जो हर रात मुझे
अपने स्नेहिल आगोश में सुला देता है।

न कुछ खोने का भय है मुझे,
न अधिक पाने की लालसा,
न मतलबी रिश्तों का बोझ,
न अहंकार का कोई विष।

बस धरती मां के सानिध्य में—
कभी हंसकर, कभी रोकर,
हम यूँ ही जीते जा रहे हैं…
हाँ, बस जीते जा रहे हैं।



               💔🔥 करुण संदेश 


शायद हम सब कुछ पाने की दौड़ में इतना आगे निकल आए हैं,
कि “जीना” कहीं पीछे छूट गया है।

जिसे हम बेघर समझते हैं,
वो शायद हमसे ज्यादा आज़ाद है…
जिसे हम गरीब कहते हैं,
वो शायद हमसे ज्यादा अमीर है—सुकून में, संतोष में।

यह कविता एक सवाल छोड़ जाती है—
 क्या सच में घर वो है, जहां हम रहते हैं…
या फिर वो, जहां हमें सुकून मिलता है?

सोचिएगा जरूर…
क्योंकि कभी-कभी सबसे बड़ा सच
सबसे साधारण जिंदगी में छुपा होता है।



        🫸 एक और मार्मिक कविता 🫷



                 " मां मेरा कसूर क्या था "   एक अनाथ अभागे बच्चे के हृदय की करुण पुकार की कविता है।  बचपन में ही माँ उसे त्याग देती है। उस बालमन में हजारों सवाल उमड़ते रहते हैं। आप एक बार इस प्यारी कविता को जरूर पढ़िए। 

           कविता पढ़ने के लिए नीचे लिखे कविता के टाईटल पर क्लिक कीजिए - 




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