दहेज के बोझ तले टूटता फकीरा | दहेज प्रथा पर मार्मिक हिंदी कहानी । Dahej ke Bojh Tale Tutata Fakira
दहेज के बोझ तले टूटता फकीरा
✍️ किशोर
फकीरा एक छोटे से गांव में पैदा हुआ था। उसके पिता सरकारी शिक्षक थे और मां गृहिणी। माता-पिता की बस एक ही इच्छा थी — उनका बेटा पढ़-लिखकर सरकारी नौकरी करे और परिवार का नाम रोशन करे।
बचपन और पढ़ाई
फकीरा बचपन से ही शहर में रहकर पढ़ाई करता रहा। उसने मेहनत की, सपने देखे, प्रतियोगी परीक्षाएं दीं, मगर किस्मत उसका साथ नहीं दे सकी। साल दर साल गुजरते गए, और सरकारी नौकरी उसका सपना ही बनी रही।
थक-हार कर आखिरकार वह गांव लौट आया।
शादी की उम्र और नई चिंता
समय के साथ उसकी शादी की उम्र हो गई। रिश्ते आने लगे। गांव-समाज के लोग भी कहने लगे —
“अब तो लड़के की शादी कर दो।”
लेकिन हर रिश्ता एक ही जगह आकर टूट जाता — दहेज।
किसी को मोटरसाइकिल चाहिए, किसी को लाखों रुपये, तो किसी को जमीन। फकीरा के माता-पिता भी कम दहेज में शादी करने को तैयार नहीं थे। उन्हें लगता था कि उन्होंने बेटे को पढ़ाया है, अब बदले में अच्छा दहेज मिलना चाहिए।
टूटता मन
एक-एक कर उसके सभी दोस्तों की शादी हो गई। घर में बारातें आईं, शहनाइयाँ बजीं…
और फकीरा हर बार अकेला रह गया।
धीरे-धीरे वह चुप रहने लगा।
रातों को जागने लगा।
उसे लगने लगा कि वह कोई इंसान नहीं, बल्कि दहेज की बोली में खड़ा सामान है।
उसने कई बार माता-पिता को समझाया —
“मुझे दहेज नहीं चाहिए, बस एक अच्छी लड़की चाहिए।”
मगर लालच आंखों पर पर्दा डाल चुका था।
आखिरी फैसला
एक रात फकीरा देर तक आंगन में बैठा रहा।
घर के भीतर दहेज की चर्चा फिर शुरू थी।
उस रात उसने तय कर लिया —
वह अब बोझ बनकर नहीं रहेगा।
सुबह जब परिवार जागा, फकीरा घर में नहीं था।
उसका बिस्तर खाली था…
और तकिये के नीचे एक चिट्ठी रखी थी:
“मां-पिता जी,
मुझे माफ करना। मैं दहेज की कीमत पर बिकना नहीं चाहता।
जब इंसान की इज्जत पैसों से तय होने लगे, तो वहां रहना मुश्किल हो जाता है।
आप खुश रहिए।”
सन्नाटा
घर में सन्नाटा छा गया।
माता-पिता की आंखों से पहली बार लालच नहीं, पछतावे के आंसू बह रहे थे।
उन्हें समझ आ चुका था —
**दहेज ने बेटे की शादी नहीं रोकी…
उनसे उनका बेटा छीन लिया।**
कहानी की सीख
दहेज सिर्फ एक सामाजिक बुराई नहीं, यह रिश्तों को तोड़ने वाली दीमक है।
जब तक समाज इसे प्रतिष्ठा समझेगा, तब तक कई फकीरा यूं ही टूटते रहेंगे।
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