अधूरी बारिश की कहानी
✍️ किशोर
शहर के भीड़भाड़ वाले चौराहे पर रोज़ एक छोटी-सी लड़की दिखती थी —
नाम था - कजरी ।
सिर्फ तेरह साल की उम्र…
एक पैर से अपाहिज…
माँ-बाप का साया भी नहीं।
वह दिन भर हाथ फैलाकर भीख मांगती, लेकिन अपने लिए नहीं।
उसकी झोपड़ी शहर के बाहर सड़क किनारे थी, जहाँ उसके साथ लगभग बीस अनाथ बच्चे रहते थे।
कोई उसे दीदी कहता, कोई माँ।
इतनी छोटी उम्र में ही कजरी उनकी दुनिया बन चुकी थी।
छोटी उम्र, बड़ा दिल
सुबह होते ही कजरी अपनी टूटी बैसाखी संभालती, बच्चों को थोड़ा-बहुत खाने का इंतज़ाम करती और फिर चौराहे पर निकल पड़ती।
जो भी मिलता, वह पहले बच्चों के लिए रखती।
खुद भूखी रहना उसे मंज़ूर था, लेकिन बच्चों को रोते देखना नहीं।
रात को वह सबको कहानी सुनाकर सुलाती और धीरे से आसमान की ओर देखती—
“भगवान, बस इन बच्चों को सुरक्षित रखना।”
जब बारिश रुकी ही नहीं
एक साल बारिश कुछ ज़्यादा ही होने लगी।
दिन पर दिन, हफ्ते पर हफ्ते — मूसलाधार पानी थमने का नाम नहीं ले रहा था।
चौराहे पर लोग कम आने लगे।
भीख मिलना बंद हो गया।
झोपड़ी में रखा थोड़ा-बहुत राशन भी खत्म हो गया।
बच्चे भूख से रोने लगे।
सबकी आँखों में डर था।
कजरी ने पहली बार खुद को असहाय महसूस किया।
उसने तय किया —
अब मदद माँगनी ही पड़ेगी।
उम्मीद का दरवाज़ा
भीगते हुए, बैसाखी के सहारे, वह शहर के स्थानीय विधायक के बंगले तक पहुँची।
दरवाज़े पर खड़े लोगों से बोली —
“साहब से मिलना है… बच्चों के लिए खाना चाहिए।”
उसे अंदर जाने दिया गया, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था।
काफी देर तक वह भीगी हुई खड़ी रही।
आखिर एक आदमी उसे अलग ले गया, यह कहकर कि वह मदद दिलाएगा…
लेकिन वहाँ उसे मदद नहीं मिली।
उस दिन इंसानियत हार गई।
उसकी चीखें बारिश के शोर में दब गईं…
और थोड़ी देर बाद उसकी साँसें भी।
उसे पास के एक निर्माणाधीन पुल के गड्ढे में फेंक दिया गया।
बारिश लगातार गिरती रही…
जैसे आसमान भी रो रहा हो।
टूट गया आसमान
उधर झोपड़ी में बच्चे इंतज़ार करते रहे।
“दीदी आएँगी… खाना लाएँगी…”
रात बीत गई।
सुबह हो गई।
लेकिन कजरी नहीं लौटी।
कुछ दिनों बाद उसकी खबर मिली।
उस दिन उन बच्चों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।
जिस छोटी-सी लड़की ने उन्हें सहारा दिया था,
वह खुद इस दुनिया से चली गई।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई…
शहर में धीरे-धीरे यह खबर फैल गई।
कुछ लोगों की अंतरात्मा जागी।
किसी ने बच्चों के लिए खाना भेजा,
किसी ने पढ़ाई का इंतज़ाम किया,
किसी ने झोपड़ी की जगह छोटा-सा आश्रय बनवा दिया।
लोग कहते थे —
“कजरी चली गई पर हमें इंसान बनाकर गई।”
आज भी जब बारिश होती है,
उस पुल के पास खड़े लोग धीरे से कहते हैं—
“यह वही अधूरी बारिश है जिसने एक मासूम की कहानी अधूरी छोड़ दी।”
अंतिम संदेश
कजरी की कहानी सिर्फ एक लड़की की कहानी नहीं है…
यह हमारे समाज का आईना है।
जहाँ एक मासूम बच्ची दूसरों के लिए जीती रही…
और वही समाज उसे बचा नहीं पाया।
हम अक्सर भगवान से चमत्कार की उम्मीद करते हैं,
लेकिन शायद भगवान कजरी जैसे लोगों के रूप में ही आते हैं—
जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के लिए जीते हैं।
सवाल यह नहीं है कि कजरी क्यों चली गई…
सवाल यह है कि हम कब इंसान बनेंगे ?
अगर अगली बार बारिश हो…
तो सिर्फ भीगना मत—
थोड़ा ठहरकर सोचना…
कहीं कोई कजरी आज भी मदद का इंतज़ार तो नहीं कर रही ?
कजरी जैसी बहुत सारी अनाथ अभागन आज भी दर दर की ठोकरें खाने को विवश हैं। तमाशबीन कहानी भी एक अनाथ अभागन मां फूलवा की मार्मिक और करुण कहानी है। आप एक बार इस कहानी को जरूर पढ़िए।
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तमाशबीन
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शानदार कहानी, दिल को छू लिया
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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