तमाशबीन: एक गरीब मां और समाज की संवेदनहीनता की सच्ची कहानी। tamashbeen-hindi-story
आज के समय में इंसानियत और संवेदनशीलता जैसे शब्द अक्सर किताबों और भाषणों तक ही सीमित रह गए हैं। वास्तविक जीवन में हम अक्सर ऐसे दृश्य देखते हैं जहां लोग किसी की मदद करने के बजाय सिर्फ तमाशा देखने लगते हैं।
ऐसी ही एक दिल दहला देने वाली घटना पर आधारित है यह कहानी “तमाशबीन”।
यह कहानी एक गरीब विधवा मां फूलवा और उसके मासूम बेटे की है, जो समाज की बेरुखी और लोगों की संवेदनहीनता का शिकार हो जाते हैं।
यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि हमारे समाज के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल है —
क्या हम सच में इंसान हैं, या सिर्फ तमाशबीन बन चुके हैं?
तमाशबीन
✍️ किशोर
फूलवा एक गरीब, दुखियारी, अभागी विधवा स्त्री थी। वह शहर के चौक-चौराहों पर भीख मांगकर किसी तरह अपना और अपने चार वर्ष के बेटे का पेट पालती थी।
यह कहानी, या यूँ कहें कि फूलवा के साथ घटी यह सच्ची घटना, आज से लगभग एक महीने पहले मेरी ही आँखों के सामने घटित हुई थी। उस दिन के बाद से जब भी मैं एकांत में आँखें बंद करता हूँ, मेरे सामने बार-बार उस असहाय माँ का बिलखता चेहरा उभर आता है—वह चेहरा जो अपने बेटे की जान बचाने के लिए लोगों से मदद की भीख मांग रहा था, पर हर तरफ सिर्फ मूक दर्शक खड़े थे।
कोई आगे नहीं आया।
और अंत में…
बेटे के वियोग में तड़पती वह माँ भी सदा के लिए शांत हो गई।
तब से मुझे अक्सर ऐसा लगता है मानो फूलवा की आत्मा मुझसे कह रही हो—
“मुझे इंसाफ मत दिलाओ… क्योंकि मेरी जैसी गरीब की पुकार सुनने वाला कोई नहीं है। लेकिन उन लोगों को जरूर एहसास कराओ, जो मेरी और मेरे बेटे की मौत का तमाशा देख रहे थे। उन्हें यह समझना होगा कि मेरी मौत के जिम्मेदार वही लोग हैं।”
आज भी जब मैं उस दिन की घटनाएँ लिखने बैठा हूँ, तो मुझे ऐसा लग रहा है जैसे फूलवा की रूह मेरे आस-पास खड़ी सब कुछ देख रही है।
उसकी पीड़ा को याद करते ही आज भी मेरी रूह कांप उठती है।
काश! भगवान किसी भी माँ को ऐसी पीड़ा न दे।
वह दिन
मुझे आज भी वह दिन अच्छी तरह याद है।
स्थान — बिहार की राजधानी पटना का डाकबंगला चौराहा
समय — संध्या 4 बजे, 14 अक्टूबर 2021
डाकबंगला चौराहा पटना के सबसे व्यस्त चौराहों में से एक है। उस समय शाम के चार बज रहे थे। भीड़ इतनी थी कि सड़क पर गाड़ियाँ रेंगती हुई आगे बढ़ रही थीं। चारों ओर जाम लगा हुआ था।
मैं भी अपनी बाइक से चौराहे पर पहुँचा ही था कि सामने का सिग्नल लाल हो गया। मुझे रुकना पड़ा।
कुछ लोग शायद बहुत जल्दी में थे। इसलिए सिग्नल लाल होने के बावजूद भी अपनी गाड़ियाँ आगे बढ़ाते जा रहे थे।
चौराहे के एक किनारे दो-तीन पुलिसकर्मी खड़े आपस में गप्पें मार रहे थे। मगर किसी ने रेड सिग्नल तोड़ने वालों को रोकने की जहमत नहीं उठाई।
मैं अभी रुका ही था कि मेरे बगल में एक कार आकर खड़ी हो गई। उसी समय एक छोटा लड़का हाथ में खिलौने लिए कार के पास पहुँच गया। वह कार वाले से खिलौना खरीदने की विनती करने लगा।
कार वाला साफ मना कर देता है।
मगर कार की पिछली सीट पर बैठा छोटा बच्चा खिलौने को लालच भरी निगाहों से देख रहा था।
चौराहे पर और भी बहुत से लोग थे—कोई सामान बेच रहा था, कोई भीख मांग रहा था।
भीख देने वाले बहुत कम थे, लेकिन मुफ्त का उपदेश देने वालों की कमी नहीं थी।
आजकल हिंदुस्तान में शायद सबसे सस्ता अगर कुछ है, तो वह है प्रवचन ।
फूलवा
मेरे सामने चौराहे के दूसरी तरफ करीब तीस-बत्तीस वर्ष की एक महिला अपने चार साल के बच्चे को गोद में लिए एक महंगी स्पोर्ट्स बाइक वाले युवक से भीख मांग रही थी।
उसकी साड़ी फटी-पुरानी थी। बच्चे की शर्ट भी जगह-जगह से फटी हुई थी। नीचे उसके शरीर पर कुछ भी नहीं था।
उनके चेहरे बता रहे थे कि वे दोनों कई दिनों से भूखे होंगे।
बाइक पर बैठा रईस युवक पाँच रुपये देने को तैयार नहीं था, मगर पाँच हजार का उपदेश उसे मुफ्त में सुना रहा था।
हादसा
तभी बायीं तरफ का सिग्नल हरा हो गया।
उधर खड़े वाहन तेजी से आगे बढ़ने लगे।
उसी समय एक बाइक वाला तेजी से गाड़ियों को ओवरटेक करते हुए आगे निकलने की कोशिश कर रहा था।
जैसे ही वह फूलवा के पास से निकला, उसके बाइक का हैंडल फूलवा के हाथ से टकरा गया—उसी हाथ से जिसमें वह अपने बच्चे को पकड़े हुए थी।
बच्चा उसके हाथ से छूटकर सड़क पर गिर पड़ा।
बाइक वाला बिना पीछे देखे तेजी से भाग गया।
बच्चा सड़क पर गिरकर लहूलुहान हो गया।
फूलवा की दुनिया जैसे उसी पल टूट गई।
भीड़
फूलवा अपने बेटे को उठाकर रोते-चिल्लाते लोगों से मदद मांगने लगी।
लेकिन कोई आगे नहीं आया।
कुछ लोगों ने तो मोबाइल निकालकर उसका वीडियो बनाना शुरू कर दिया।
मदद कोई नहीं कर रहा था।
सब सिर्फ तमाशा देख रहे थे।
शायद मैं भी उन्हीं में शामिल था।
अस्पताल
आखिरकार फूलवा अपने घायल बेटे को लेकर पास के एक बड़े प्राइवेट अस्पताल पहुँच गई।
लेकिन अस्पताल के कर्मचारियों ने इलाज से पहले **पचास हजार रुपये जमा करने** को कहा।
फूलवा गिड़गिड़ाने लगी।
वह लोगों के सामने अपनी साड़ी का आँचल फैलाकर भीख मांगने लगी।
हजारों लोग थे…
मगर मदद करने वाले बहुत कम।
मैंने भी अपनी जेब के पाँच सौ रुपये उसे दे दिए।
मुश्किल से चार-पाँच हजार रुपये ही इकट्ठा हो पाए।
लेकिन अस्पताल वालों का दिल नहीं पसीजा।
मौत
अंत में जब फूलवा ने अपने बेटे को उठाया, तो उसकी साँसें थम चुकी थीं।
उसका बेटा मर चुका था।
फूलवा वहीं जमीन पर बैठ गई।
अब उसके पास रोने के अलावा कुछ नहीं बचा था।
फूलवा की अंतिम पुकार
तभी फूलवा अचानक उठी और लोगों से बोली—
“जब मेरा बेटा सड़क पर घायल पड़ा था, तब तुम सबकी इंसानियत कहाँ थी?
तब तुम लोग मेरा वीडियो बना रहे थे।
अगर उस समय कोई मुझे सरकारी अस्पताल तक पहुँचा देता, तो मेरा बेटा आज जिंदा होता।
मेरे बेटे के हत्यारे अस्पताल वाले नहीं हैं…
हत्यारे तो तुम सब हो।”
उसकी बातें सबके दिल में तीर की तरह चुभ रही थीं।
अंत
अचानक बोलते-बोलते फूलवा चक्कर खाकर अपने बेटे के पास ही गिर पड़ी।
और उसी क्षण उसकी भी साँसें थम गईं।
एक माँ…
अपने बेटे के साथ…
हमेशा के लिए चली गई।
भीड़ चुपचाप सिर झुकाकर अपने-अपने रास्ते चली गई।
मैं भी चला आया।
लेकिन उस दिन के बाद से मेरे दिल पर एक बोझ हमेशा के लिए रह गया।
सवाल
यह सिर्फ फूलवा की कहानी नहीं है।
आज भी सड़कों पर दुर्घटनाएँ होती हैं।
घायल लोग तड़पते रहते हैं।
लेकिन लोग मदद करने के बजाय तमाशा देखते हैं।
अब समय आ गया है कि हम खुद से पूछें—
क्या हम इंसान हैं…
या सिर्फ तमाशबीन ?
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