बिंदिया और बबलू - अध्याय– 25 | नवादा का सरकारी विद्यालय | हिंदी उपन्यास | कुमार सरोज | किशोरवाणी |



    

         👩‍❤️‍👩  बिंदिया और बबलू  👩‍❤️‍👩 


                     अभी तक आपने पढ़ा.......

           
                बबलू, बिंदिया, सुधा और रंजीत को पता चला कि सुधा को बचपन में चाकंद के अनाथालय में रखा गया था। वहीं से उन्हें एक नया सुराग मिला—रामनाथ मिश्र, नवादा के एक पुराने स्कूल शिक्षक, जिनके पास बबलू के भाई अंकित के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी हो सकती थी।

       लेकिन नवादा जाने से पहले रास्ते में एक चेतावनी मिली—

    “ नवादा मत जाना।”

बबलू ने इसे खतरा नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण माना कि वे सही दिशा में बढ़ रहे हैं। अब सबकी मंजिल थी— नवादा।




          नवादा का सरकारी विद्यालय 

                 ( अध्याय - 25 )

                                  ✍️  कुमार सरोज 


                  सुबह की पहली किरण अभी खेतों के ऊपर पूरी तरह फैली भी नहीं थी कि बबलू के आंगन में हलचल शुरू हो गई।

महेश अपनी पुरानी साइकिल का पहिया घुमा-घुमाकर देख रहा था।

बबलू ने पूछा—

“तुम साइकिल क्यों देख रहे हो?”

महेश बोला—

“देख रहे हैं कि हवा है या नहीं।”

“हवा पहिए में नहीं, दिमाग में चाहिए। साइकिल में हवा चाहिए।”

महेश ने गंभीरता से कहा—

“भईया, यही तो हम भी कह रहे हैं। दिमाग में हवा ज्यादा हो जाए तो आदमी रास्ता भूल जाता है।”

रंजीत हंस पड़ा।

बिंदिया ने कहा—

“महेश, आज तुम्हारी बातें कुछ ज्यादा ही समझदारी वाली लग रही हैं।”

महेश ने सीना चौड़ा किया।

“भाभी, संकट के समय आदमी के अंदर छिपा विद्वान जाग जाता है।”

बबलू ने मुस्कुराकर कहा—

“तुम्हारे अंदर विद्वान सोया ही कब था?”

महेश ने तुरंत उत्तर दिया—

“जब आप गांव में नहीं थे।”

सभी हंस पड़े।

लेकिन हंसी के पीछे सबके मन में एक ही सवाल था—

क्या आज अंकित का पता चल जाएगा?


           ❤️📖 अब आप नीचे दिये गए QR Code को स्कैन करके भी कहानी पढ़ सकते हैं -


                 बबलू, बिंदिया, सुधा और रंजीत एक जीप में आगे बढ़ रहे थे। महेश पीछे अपनी साइकिल से आने की जिद पर अड़ा था।

 कुछ दूर जाने के बाद अचानक जीप रुक गई।

ड्राइवर ने नीचे उतरकर कहा—

“साहब, आगे सड़क पर बड़ा पेड़ गिरा है।”

रंजीत नीचे उतरा।

सड़क पूरी तरह बंद थी।

बबलू ने पेड़ को देखा।

“इसे हटाने में समय लगेगा।”

तभी सुधा ने दूर एक कच्चा रास्ता देखा।

“उधर से जा सकते हैं।”

बिंदिया बोली—

“वह रास्ता तो खेतों के बीच जा रहा है।”

रंजीत ने कहा—

“नवादा पहुंचने का दूसरा रास्ता भी वही है।”

बबलू ने निर्णय लिया—

“चलो।”

             जीप कच्चे रास्ते पर उतर गई। कुछ दूर जाने के बाद बबलू की नजर सड़क किनारे पड़े एक पुराने बोर्ड पर पड़ी।

उस पर धुंधले अक्षरों में लिखा था—

“नवादा प्राथमिक विद्यालय — 3 किलोमीटर।”

सुधा ने धीमे से कहा—

“यही रास्ता है।”

      बबलू ने खिड़की से बाहर देखा। उसकी धड़कन तेज हो गई।

            कुछ देर बाद सभी नवादा के एक पुराने स्कूल के सामने पहुंचे। स्कूल की दीवारों पर चूना उखड़ चुका था। स्कूल के बगल में एक विशाल नीम का पेड़ खड़ा था।

बबलू की नजर उस पेड़ पर पड़ी।

सुधा अचानक बोली—

“मुझे यह पेड़ याद है।”

बिंदिया ने पूछा—

“तुम यहां आई थीं?”

सुधा ने कहा—

“शायद, बहुत छोटी थी। मुझे ठीक से याद नहीं।”

            रंजीत ने स्कूल के बरामदे की ओर देखा। वहां एक बूढ़ा व्यक्ति कुर्सी पर बैठा बच्चों की कॉपियां जांच रहा था।

बबलू धीरे-धीरे उसके पास गया।

“क्या आप रामनाथ मिश्र हैं?”

बूढ़े व्यक्ति ने चश्मा ऊपर किया।

“हां। मगर आप कौन?”

बबलू ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला, लेकिन आवाज नहीं निकली। बिंदिया ने धीरे से उसका हाथ दबाया।

बबलू ने कहा—

“हम अंकित को खोज रहे हैं।”

            रामनाथ मिश्र के हाथ से कलम छूट गई। कुछ क्षण तक रामनाथ मिश्र बबलू को देखते रहे।

फिर उन्होंने धीमे से पूछा—

“अंकित का नाम तुम्हें किसने बताया?”

रंजीत आगे आया।

“पुराने दस्तावेजों से।”

रामनाथ मिश्र तुरंत सभी को स्कूल के अंदर वाले कमरे में लेकर आ जाते हैं और दरवाजा बंद कर लेते हैं। 

“यहां इस नाम को दोबारा मत लेना।”

बबलू चौंक गया।

“क्यों?”

रामनाथ मिश्र ने कहा—

“क्योंकि जिस दिन यह नाम आखिरी बार यहां लिया गया था, उसी दिन से कई लोगों की जिंदगी बदल गई।”

सुधा ने आगे बढ़कर पूछा—

“क्या आप मुझे जानते हैं?”

      रामनाथ मिश्र ने उसे गौर से देखा। उनके चेहरे पर अचानक पहचान की चमक आई।

“तुम। "

सुधा की आंखें नम हो गईं।

“हां...।  मैं सुधा हूं।”

रामनाथ मिश्र की आंखों से आंसू निकल पड़े।

“तो आखिर तुम मिल ही गईं।”

उन्होंने धीरे-धीरे कहना शुरू किया—

“बारह साल पहले एक रात एक आदमी मेरे पास आया था।”

बबलू ने पूछा—

“कौन?”

“उसने अपना नाम नहीं बताया। उसके साथ एक छोटा लड़का था।”

बबलू की सांस थम गई।

“अंकित?”

रामनाथ मिश्र ने सिर हिलाया।

“हां।”

सुधा की आंखों से आंसू बहने लगे।

बबलू ने बेचैनी से पूछा—

“वह कैसा था?”

रामनाथ मिश्र मुस्कुराए।

“बहुत जिद्दी।”

बबलू की आंखों में हल्की चमक आई।

“वह बचपन से ऐसा ही था।”

रामनाथ मिश्र बोले—

“वह बार-बार कहता था—मुझे अपने बड़े भैया के पास जाना है।”

बबलू ने मुंह फेर लिया।

उसकी आंखों में आंसू थे।

बबलू ने पूछा—

“फिर वह कहां गया?”

रामनाथ मिश्र ने गहरी सांस ली।

“मैंने उसे यहां कुछ महीनों तक रखा। फिर एक दिन दो आदमी आए।”

“कौन?”

“एक का नाम दिनेश्वर था।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

बबलू ने मुट्ठी भींच ली।

“और दूसरा?”

रामनाथ मिश्र कुछ क्षण चुप रहे।

फिर बोले—

“हरिहर सिंह।”

रंजीत जैसे कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

“मेरे पिता?”

रामनाथ मिश्र ने उसकी ओर देखा।

“हां।”

रंजीत की आवाज कांप गई।

“उन्होंने अंकित को यहां से ले गए थे ?”

“हां।”

“कहां?”

रामनाथ मिश्र ने सिर झुका लिया।

“मुझे नहीं पता।”

रंजीत की आंखों में बेचैनी थी।

“आपने मेरे पिता को हमेशा अच्छा आदमी बताया। फिर उन्होंने अंकित को क्यों छिपाया?”

रामनाथ मिश्र ने कहा—

“क्योंकि वह उसे छिपा नहीं रहे थे।”

सब चौंक गए।

“तो?”

“वह उसे बचा रहे थे।”

रंजीत की आंखें फैल गईं।

“किससे?”

रामनाथ मिश्र ने कहा—

“दिनेश्वर सिंह से।”

बबलू ने पूछा—

“लेकिन वह दोनों साथ आए थे?”

“साथ आए थे। मगर उनका मकसद अलग था।”

बबलू ने गहरी सांस ली।

“तो मेरे पिता के दुश्मन कौन थे?”

रामनाथ मिश्र ने उत्तर देने के बजाय खिड़की से बाहर देखा।

“तुम्हारे पिता के दुश्मन बाहर नहीं थे।”

उन्होंने बबलू की ओर देखा।

“वे उनके बहुत करीब थे।”

रामनाथ मिश्र ने अपनी मेज की दराज खोली।

वहां से एक पुरानी चिट्ठी निकाली।

“यह मुझे हरिहर सिंह ने दी थी।”

रंजीत ने चिट्ठी पकड़ ली।

उसमें लिखा था—

“रामनाथ जी, यदि कभी मेरा बेटा बबलू यहां आए, तो उसे यह मत बताना कि अंकित कहां है। पहले यह सुनिश्चित करना कि उसके पीछे कोई खतरा नहीं है।”

रंजीत की आंखों में आंसू आ गए।

“उन्होंने बबलू को बचाने के लिए इतना सब किया?”

बबलू चुप था।

उसने चिट्ठी हाथ में ली।

नीचे एक और पंक्ति थी—

“और यदि सुधा भी कभी लौटे, तो उसे उसके दोनों भाइयों से मिलाने में देर मत करना।”

सुधा रो पड़ी।

“पिताजी। " 

      बबलू ने उसकी ओर देखा। पहली बार दोनों भाई-बहन ने एक-दूसरे को गले लगा लिया। बबलू ने सुधा के सिर पर हाथ रखा।

“बहुत देर कर दी हमने तुम्हें ढूंढ़ने में।”

सुधा ने कहा—

“देर हुई है भैया, लेकिन अब मैं आपको खोना नहीं चाहती।”

बबलू ने कहा—

“अब कोई हमें अलग नहीं करेगा।”

बिंदिया की आंखें भी नम हो गईं।

रंजीत कुछ दूर खड़ा अपने पिता की चिट्ठी को देख रहा था।

बिंदिया उसके पास गई।

“आप ठीक हैं?”

रंजीत ने कहा—

“आज पहली बार समझ आया कि मेरे पिता ने अपनी जिंदगी में कितने राज अकेले ढोए होंगे।”

बिंदिया बोली—

“सच कभी-कभी आदमी को देर से मिलता है, लेकिन जब मिलता है तो पुराने फैसलों का अर्थ बदल देता है।”

बबलू ने रामनाथ मिश्र से पूछा—

“आपने कहा था कि हरिहर सिंह अंकित को यहां से ले गए थे। उसके बाद?”

रामनाथ मिश्र ने एक पुरानी डायरी खोली।

एक पन्ने पर तारीख लिखी थी।

उसके सामने केवल एक स्थान का नाम था—

“वैशाली।”

बबलू ने पूछा—

“वैशाली?”

रामनाथ मिश्र ने कहा—

“वहीं आखिरी बार अंकित को देखा गया था।”

रंजीत ने पूछा—

“वैशाली कहां है?”

रामनाथ मिश्र ने कहा—

“यहां से करीब अस्सी किलोमीटर दूर।”

महेश, जो अब तक चुप बैठा था, अचानक बोला—

“ अस्सी किलोमीटर!”

बबलू ने पूछा—

“क्या हुआ?”

महेश ने सिर पकड़ लिया।

“हम तो सोच रहे थे भाई मिलने जाएंगे। अब लगता है पूरा जिला घूमना पड़ेगा।”

बिंदिया हंस पड़ी।

“तुम चाहो तो घर लौट जाओ।”

महेश ने तुरंत कहा—

“नहीं भाभी। अब तो अंकित भईया से मिलकर ही लौटेंगे। आखिर हमें भी तो देखना है कि बबलू भईया बचपन में कितने शरारती थे।”

बबलू मुस्कुराया।

“अंकित से पूछ लेना।”


         📖✨ नियमित कहानियां पढ़ने के लिए किशोरवाणी WhatsApp चैनल से जुड़िए ❤️



                उसी शाम जब सब लोग नवादा से लौटने की तैयारी कर रहे थे, स्कूल के बाहर एक आदमी खड़ा था।

उसने रामनाथ मिश्र से पूछा—

“वे लोग यहां आए थे?”

रामनाथ मिश्र ने डरते हुए कहा—

“कौन लोग?”

आदमी मुस्कुराया।

“आप जानते हैं।”

रामनाथ मिश्र चुप रहे।

आदमी ने कहा—

“उन्हें वैशाली मत जाने देना।”

रामनाथ मिश्र ने पूछा—

“क्यों?”

उसने उत्तर दिया—

“क्योंकि वहां अब अंकित अकेला नहीं है।”

रामनाथ मिश्र के चेहरे का रंग उड़ गया।

“तो कौन है उसके साथ?”

आदमी ने सिर्फ इतना कहा—

“जिसका नाम सुनकर बबलू अपने अतीत पर भरोसा करना छोड़ देगा।”

   और वह कहते हुए अंधेरे में गायब हो गया।

            रास्ते में बबलू का फोन बजा। अनजान नंबर था। उसने फोन उठाया।

                दूसरी ओर कुछ क्षण तक कोई आवाज नहीं आई। फिर बहुत धीमी आवाज सुनाई दी—

“अगर अंकित को जिंदा देखना चाहते हो, तो वैशाली अकेले आना।”

बबलू ने तुरंत पूछा—

“तुम कौन हो?”

फोन कट गया।

बिंदिया ने पूछा—

“क्या हुआ?”

बबलू ने फोन नीचे किया।

“अंकित। ”

रंजीत समझ गया।

“क्या वह जिंदा है?”

बबलू ने कहा—

“हां, शायद।”

          फिर उसने फोन की स्क्रीन देखी। अज्ञात नंबर से एक तस्वीर आई थी। तस्वीर में एक युवक दिखाई दे रहा था। चेहरा साफ नहीं था। लेकिन उसकी कलाई पर वही चांदी की ताबीज थी, जो बबलू के बचपन की यादों में थी। बबलू की आंखों से आंसू निकल पड़े।

“यह मेरा भाई है..। " 

बिंदिया ने तस्वीर देखी।

उसने धीरे से कहा—

“तो अब हमें वैशाली जाना होगा।”

       बबलू ने सिर उठाया। उसकी आंखों में वर्षों बाद उम्मीद थी। लेकिन उसी उम्मीद के पीछे एक गहरा डर भी छिपा था।  क्योंकि तस्वीर के नीचे सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—

“आखिरी मौका, बबलू।”


                                     🔥 क्रमशः आगे...


   अगले अध्याय में...

  वैशाली में अंकित आखिर किसके कब्जे में है? 

क्या हरिहर सिंह ने अंकित को बचाने के लिए उसे वहां भेजा था?
          
अंकित की कलाई में वही ताबीज कैसे आई?
         
बबलू को अकेले वैशाली बुलाने वाला रहस्यमय व्यक्ति कौन है?
                  📖💌📖 बिंदिया और बबलू   उपन्यास के यदि आपने अभी तक पीछे का अध्याय नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। ग्रामीण परिवेश की बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली रहस्यमयी कहानी है। 

              पीछे के अध्याय को पढ़ने के लिए नीचे लिखे उपन्यास के शीर्षक पर क्लिक कीजिए -




       ❤️ किशोरवाणी को आपका समर्थन 

               हमारी कहानियों को पढ़ने के लिए आपका प्यार ही हमारी सबसे बड़ी प्रेरणा है। 

           यदि आपको हमारी कोई कहानी पसंद आई हो और आप किशोरवाणी के साहित्यिक कार्य को आगे बढ़ाने में स्वेच्छा से योगदान करना चाहते हैं, तो आप अपनी इच्छा अनुसार योगदान कर सकते हैं।

            आपका छोटा-सा योगदान हमें नई कहानियाँ लिखने और प्रकाशित करने की प्रेरणा देगा। 

    🙏 धन्यवाद — किशोरवाणी परिवार

          UPI ID - 9430972634-4@ybl


                  ❤️ अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई हो...

👉 किशोरवाणी को फॉलो करें, जहाँ हमेशा ऐसी ही भावनात्मक, प्रेरणादायक और सामाजिक कहानियाँ प्रकाशित होती हैं।

💬 नीचे कमेंट करके ज़रूर बताइए कि कहानी का कौन-सा हिस्सा आपको सबसे ज़्यादा पसंद आया।

📲 इस कहानी को अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें, क्योंकि शायद किसी एक व्यक्ति तक यह संदेश पहुँचना ज़रूरी हो।

📖 आपकी एक टिप्पणी और एक शेयर हमें बेहतर कहानियाँ लिखने की प्रेरणा देता है।

     धन्यवाद  ❤️

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। आपका कॉमेंट हमें बेहतर लिखने की प्रेरणा देता है।

Popular Post

अधूरी बारिश की कहानी – एक अनाथ बच्ची की मार्मिक कहानी । Adhuri-Barish-Ki-Kahani-real -story

सात जन्मों का अधूरा बंधन | एक मार्मिक अधूरी सच्ची प्रेम कहानी । saat- janno -ka-adhura -bandhan -real -love -story

अधूरी चाय – एक दिल छू लेने वाली भावुक हिंदी कहानी | Adhuri Chai Hindi Story

अधूरी ख्वाहिश: प्रेम, संगीत और कर्मा की एक मार्मिक कहानी | Adhoori Khwaahish - A Story of Love & Destiny

जब गांव की गलियां याद आईं | दिल को छू लेने वाली प्रेरणादायक कहानी | Village Life Emotional Story

मोबाइल वाला बेटा – भावुक कहानी | परिवार और रिश्तों की सच्चाई। Mobile Wala Beta

माँ का आँचल | दिल छू लेने वाली प्रेरक हिन्दी कहानी / Maa- Ka-Aanchal -Emotional-Inspirational- Hindi -Kahani