उसकी माँ / Usaki Maa | भाग- चार | एक मां का पुनर्जन्म | कुमार सरोज | किशोरवाणी |
💔 उसकी मां
एक माँ का पुनर्जन्म
( भाग - चार )
✍️ कुमार सरोज
केतकी कुछ देर तक चुप बैठी रही। उसकी आँखें कहीं दूर अतीत में खो गई थीं।
निधि बिना कुछ बोले उसके चेहरे को देख रही थी। अब उसे समझ आने लगा था कि उसकी माँ की कहानी केवल दुःख की कहानी नहीं थी। वह हर बार गिरकर फिर खड़े हो जाने की कहानी थी।
केतकी ने गहरी साँस ली।
"बेटी..। उस रात तुम्हारी माँ ने अपना सब कुछ खो दिया था, लेकिन अगले ही दिन उसने तय कर लिया कि अब उसकी पहचान किसी की पत्नी नहीं, बल्कि अपनी मेहनत होगी।"
बनारस रेलवे स्टेशन की वह लंबी रात समाप्त हुई। सुबह की पहली किरण के साथ सौम्या ने अपने आँसू पोंछ दिए। वह जौनपुर अपने मायके जा सकती थी। उसे पूरा विश्वास था कि अगर वह एक बार अपने माता-पिता के सामने खड़ी हो जाए, तो उनका कठोर हृदय भी पिघल जाएगा। लेकिन उसका स्वाभिमान उसे बार-बार रोक रहा था।
"जिस रास्ते पर चलने का निर्णय मैंने लिया था... उसका अंत भी मैं स्वयं देखूँगी।"
यही सोचकर उसने बनारस में ही रहने का निश्चय किया।
कुछ गहने बेचे। थोड़ी-सी बचत थी। उसी से उसने एक छोटा-सा कमरा किराए पर लिया।
कमरा इतना छोटा था कि एक तरफ़ चारपाई बिछ जाती, तो दूसरी तरफ़ मुश्किल से दो लोग खड़े हो सकते थे। लेकिन सौम्या के लिए अब वही कमरा पूरी दुनिया था।
दिन में वह सरकारी नौकरियों की तैयारी करती। रात में देर तक किताबों में डूबी रहती। कभी-कभी भूखी भी सो जाती। लेकिन अगले दिन फिर उसी उत्साह से पढ़ने बैठ जाती। उसे अब किसी से शिकायत नहीं थी।
उसका एक ही लक्ष्य था— अपने बच्चे का भविष्य।
इन्हीं दिनों मेरी उससे मुलाक़ात हुई। केतकी की आवाज़ भर्रा गई।
"मैं उस समय लोगों के घरों में काम करके अपना पेट पालती थी। मेरे पति का देहांत हो चुका था। दो बेटे और एक बेटी थे, लेकिन सबने मुझे बोझ समझकर अपने-अपने घरों के दरवाज़े बंद कर लिए थे।"
निधि ने धीरे से उनका हाथ थाम लिया।
केतकी हल्का-सा मुस्कराई।
"तुम्हारी माँ ने पहली बार मुझे 'केतकी माँ' कहकर बुलाया था। मैं चौंक गई थी। मैंने कहा—'बिटिया, मैं तो बस कामवाली हूँ।'"
वह हँस पड़ी।
"उसने जवाब दिया—"
"'रोटी बनाने वाली बाई बहुत मिल जाती हैं, लेकिन माँ किस्मत वालों को मिलती है।'"
केतकी की आँखों से आँसू बह निकले।
"उस दिन पहली बार मुझे लगा, मैं अनाथ नहीं हूँ।"
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समय धीरे-धीरे बीतता गया। सौम्या का पेट बढ़ने लगा। लेकिन उसके हौसले कभी छोटे नहीं हुए। वह रोज़ अपने पेट पर हाथ रखकर तुमसे बातें करती थी।
"मेरी बच्ची...। जब तू आएगी न, हम दोनों मिलकर नई दुनिया बनाएँगे।"
मैं अक्सर हँसकर कहती—
"अभी से बातें करती हो?"
वह मुस्कुराकर जवाब देती—
"माँ बनने के लिए बच्चे के जन्म का इंतज़ार नहीं करना पड़ता।"
फिर वह दिन आया, जब तुम इस दुनिया में आईं। पूरा अस्पताल तुम्हारी पहली किलकारी से गूँज उठा। तुम्हें पहली बार गोद में लेकर सौम्या बहुत देर तक रोती रही।
मैंने घबराकर पूछा—
"क्या हुआ बिटिया?"
वह मुस्कुराते हुए बोली—
"आज भगवान ने मुझसे सब कुछ नहीं छीना, उसने मुझे मेरी पूरी दुनिया दे दी है।"
उसने तुम्हारा नाम रखा—
निधि।
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तुम्हारे जन्म के बाद उसकी जिम्मेदारियाँ और बढ़ गईं। दिन में तुम्हारी देखभाल। रात में पढ़ाई। कई बार तुम उसकी गोद में सो जातीं और वह एक हाथ से तुम्हें थामे दूसरे हाथ से किताब पढ़ती रहती।
मैं उसे समझाती—
"थोड़ा आराम भी कर लिया करो।"
वह मुस्कुरा देती।
"अभी नहीं, माँ। जब मेरी बेटी अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी, तब खूब आराम करूँगी।"
भगवान शायद उसके संघर्ष से पिघल गए थे। एक सुबह डाकिया घर आया। उसके हाथ में एक सरकारी लिफ़ाफ़ा था।
सौम्या ने काँपते हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला। कुछ पल तक वह पत्र को देखती रही। फिर अचानक रोने लगी।
मैं घबरा गई।
"क्या हुआ?"
उसने पत्र मेरी ओर बढ़ा दिया।
उसमें लिखा था—
बनारस विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक पद पर आपकी नियुक्ति की जाती है।
मैं खुशी से चीख पड़ी।
उस दिन हमारे छोटे-से घर में पहली बार मिठाई आई।
सौम्या ने सबसे पहले वह नियुक्ति-पत्र तुम्हारे माथे से लगाया।
फिर बोली—
"यह नौकरी मेरी नहीं, मेरी बेटी की है।"
उस शाम उसने मंदिर जाकर भगवान से केवल एक ही प्रार्थना की—
"अब मेरी बेटी की ज़िंदगी में कभी अँधेरा मत आने देना।"
केतकी इतना कहकर चुप हो गई।
उसकी आँखों में खुशी की चमक भी थी और एक अनजाना डर भी।
निधि ने धीरे से पूछा—
"फिर, क्या हमारी ज़िंदगी अच्छी हो गई थी?"
केतकी ने उसकी ओर देखा।
फिर बहुत धीमे स्वर में बोली—
"हाँ बेटी। कुछ समय के लिए लगा था कि अब सारे दुःख पीछे छूट गए हैं। लेकिन...। कभी-कभी किस्मत इंसान को मंज़िल दिखाकर फिर से परीक्षा लेने लौट आती है। जिस दिन तुम्हारा पहला जन्मदिन मनाने की तैयारी चल रही थी, उसी दिन तुम्हारे अतीत ने फिर हमारे दरवाज़े पर दस्तक दी।"
केतकी की आवाज़ काँप गई। उसने आँखें बंद कर लीं।
"दरवाज़े के बाहर राज खड़ा था।"
क्रमशः आगे ...
📖💌📖 उसकी मां कहानी के यदि आपने अभी तक पीछे का भाग नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। एक नारी के प्रेम और संघर्ष की बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली मार्मिक कहानी है।
बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली कहानी है
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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