उसकी माँ / Usaki Maa | भाग- पांच | लौटकर आया अतीत | कुमार सरोज | किशोरवाणी |


     💔 उसकी माँ


         अभी तक आपने पढ़ा......


                 सौम्या अपने घर वालों से बगावत करके जिस इंसान से शादी करती है, वह उसे कुछ ही महीनों के बाद निकाल देता है। उस समय वह मां बनने वाली थी। उसके बाबजूद भी सौम्या हार नहीं मानती है और अपनी जीवन को नए तरीके से शुरू करती है और। सरकारी नौकरी हासिल कर लेती है। मगर तभी उसके जीवन में फिर से उसका पति राज आ जाता है।
 अब सौम्या के साथ क्या होने वाला है?
राज फिर वापस उसके जीवन में क्यों आया था?

                  पढ़िए इस भाग में........


        लौटकर आया अतीत

                       ( भाग - पांच)

                                 ✍️  कुमार सरोज 


                   सुबह से ही सौम्या के उस छोटे-से घर में चहल-पहल थी। रसोई से खीर की मीठी खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। बैठक के दरवाज़े पर रंग-बिरंगी झालरें टँगी थीं और कोने में रखे छोटे-से मेज़ पर एक गोल केक रखा था।

              आज कोई साधारण दिन नहीं था। आज निधि का पहला जन्मदिन था। 

            सौम्या बार-बार छोटी-सी निधि को गोद में उठाकर चूम लेती।

"आज मेरी गुड़िया पूरे एक साल की हो गई...। "

               उसकी आँखों में वही चमक थी, जो वर्षों पहले राज से प्रेम करते समय हुआ करती थी। अंतर बस इतना था कि अब उसके सपनों का केंद्र कोई पुरुष नहीं, बल्कि उसकी बेटी थी।

केतकी रसोई से बाहर आई।

"अरे बिटिया, मेहमानों के आने का समय हो गया है। अब ज़रा तैयार भी हो जाओ।"

सौम्या मुस्कराई।

"बस माँ... पाँच मिनट।"

तभी...

ट्रिन... ट्रिन...

दरवाज़े की घंटी बजी।

             सौम्या ने समझा, शायद पड़ोस की कोई सहेली होगी। उसने मुस्कराते हुए दरवाज़ा खोला। लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे की मुस्कान पत्थर बन गई।

दरवाज़े पर राज खड़ा था। वही चेहरा... वही आँखें...। लेकिन अब उनमें प्रेम नहीं, बल्कि स्वार्थ की चमक थी।

कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। सबसे पहले राज ने ही चुप्पी तोड़ी।

"कैसी हो, सौम्या?"

सौम्या का स्वर बर्फ़ जैसा ठंडा था।

"जिस दिन तुमने मुझे आधी रात को घर से निकाला था, उसी दिन तुम्हें यह पूछने का अधिकार खो दिया था।"

राज ने गहरी साँस ली।

"मुझसे गलती हो गई थी।"

"मैं तुम्हें लेने आया हूँ।"

"चलो, अपने घर चलते हैं।"

सौम्या के होंठों पर हल्की-सी कड़वी मुस्कान उभरी।

"घर ? जिस घर से एक गर्भवती पत्नी को धक्के देकर निकाला गया था, उसे तुम घर कहते हो?"

राज ने बात सँभालने की कोशिश की।

"इंसान से गलती हो जाती है। मैं सब भूल जाना चाहता हूँ।"

सौम्या ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा।

"तुम भूल सकते हो, लेकिन एक स्त्री अपने आत्मसम्मान की हत्या कभी नहीं भूलती।"

इसी बीच राज की नज़र कमरे के भीतर खेल रही छोटी-सी निधि पर पड़ी।

"यह मेरी बेटी है?"

सौम्या तुरंत निधि के सामने आकर खड़ी हो गई।

"नहीं... यह मेरी बेटी है। जिस दिन उसे पिता की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, उस दिन उसका पिता मर चुका था।"

राज का चेहरा तमतमा उठा।

"तुम मुझे मेरी बेटी से दूर नहीं रख सकती।"

सौम्या का स्वर पहले से भी अधिक दृढ़ हो गया।

"जिस आदमी ने एक अजन्मे बच्चे तक को स्वीकार नहीं किया, उसे आज पिता कहलाने का कोई अधिकार नहीं।"

केतकी भी बाहर आ चुकी थी।

वह राज को देखते ही पहचान गई।

उसे बरसों पुरानी वह काली रात याद आ गई।

उसने गुस्से से कहा—

"बेटा, अब यहाँ से चला जा। जिस औरत को तूने ठुकराया था, आज उसी की मेहनत की कमाई पर नज़र मत डाल।"


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            राज समझ गया कि अब बातों से कुछ नहीं होगा। जाते-जाते वह ठहर गया। उसकी आँखों में एक अजीब-सी कठोरता उतर आई।

"ठीक है, अगर तुम अपनी मर्ज़ी से नहीं चलोगी तो कानून तुम्हें मेरे पास भेज देगा।"

सौम्या शांत रही।

"कानून न्याय करता है, व्यापार नहीं।"

          राज बिना कुछ बोले चला गया। लेकिन जाते-जाते वह अपने पीछे एक नया तूफ़ान छोड़ गया।


           कुछ ही दिनों बाद अदालत से नोटिस आया। राज ने दावा किया था कि वह अपनी पत्नी और बेटी को वापस अपने साथ रखना चाहता है।

निधि ने बीच में पूछा—

"दादी...। " 

"क्या माँ डर गई थीं?"

केतकी मुस्कुरा दी।

"तुम्हारी माँ? वह डरना जानती ही नहीं थी।"

            अदालत का पहला दिन। राज के वकील ने बड़ी-बड़ी बातें कहीं।

"पति अपनी पत्नी को वापस लाना चाहता है।"

"बेटी को पिता का प्यार मिलना चाहिए।"

सौम्या चुपचाप सब सुनती रही।

जब न्यायाधीश ने उससे पूछा—

"आप क्या चाहती हैं?"

तो वह धीरे से खड़ी हुई।

पूरे न्यायालय में सन्नाटा छा गया।

उसने कहा—

"माननीय न्यायालय...जिस दिन मुझे सबसे अधिक अपने पति की आवश्यकता थी, उसी दिन उसने मुझे अपराधी की तरह घर से निकाल दिया। मैं किसी अपराध की दोषी नहीं थी। मैं एक अपराध की शिकार थी।"

          उसकी आवाज़ भर्रा गई। लेकिन उसने अपने आँसू पोंछ लिए।

"आज जब मैं अपने पैरों पर खड़ी हूँ, तब इन्हें पत्नी नहीं, मेरी नौकरी दिखाई दे रही है। अगर उस रात मेरा हाथ थाम लिया होता, तो आज मैं इनके साथ खड़ी होती। लेकिन जिसने मेरे चरित्र पर नहीं, मेरे अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाया, उसके साथ लौटना मेरे आत्मसम्मान की हत्या होगी।"

पूरा न्यायालय कुछ क्षण के लिए मौन हो गया।

केतकी ने कहा—

"बेटी। " 

"उस दिन मुझे पहली बार लगा था कि सच की आवाज़ बहुत धीमी होती है, लेकिन जब बोलती है, तो झूठ का सबसे बड़ा शोर भी उसके सामने छोटा पड़ जाता है।"


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                   कई महीनों तक मुक़दमा चलता रहा।  अंततः फ़ैसला आया। न्यायालय ने सौम्या को राज से वैधानिक रूप से अलग होने का अधिकार दिया। निधि की परवरिश का पूरा अधिकार भी सौम्या को मिला।

       सौम्या अदालत से बाहर निकली। उसने आसमान की ओर देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन वे हार के नहीं जीत के आँसू थे।

उसने निधि को गोद में उठाकर कहा—

"बेटी... आज तेरी माँ ने किसी आदमी को नहीं हराया, आज उसने अपने डर को हराया है।"

             लेकिन उसे कहाँ पता था कि किस्मत ने अभी अपना आख़िरी वार बाकी रखा था। उसी भीड़ में सड़क के उस पार राज खड़ा था। उसकी आँखों में पराजय नहीं प्रतिशोध जल रहा था।


                            क्रमशः आगे....... 


                📖💌📖 उसकी मां  कहानी के यदि आपने अभी तक पीछे का भाग नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। एक महिला के संघर्ष और त्याग की बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली भावुक कहानी है। 

            पीछे के भाग को पढ़ने के लिए नीचे लिखे कहानी के शीर्षक पर क्लिक कीजिए -

          💅 उसकी माँ  


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