उसकी माँ / Usaki Maa | भाग- तीसरा | उसने हार नहीं मानी | कुमार सरोज | किशोरवाणी |
💔 उसकी माँ
अभी तक आपने पढ़ा.....
सौम्या अपने परिवार से बगावत करके राज से शादी तो कर लेती है मगर उसका जीवन संधर्ष से भर जाता है।
वह घर खर्च के लिए एक प्राइवेट कम्पनी में नौकरी करनी पड़ती है। वह अपने मां बाप से पैसा भी नहीं मांग सकती थी।
अब पढ़िए आगे..
उसने हार नहीं मानी
( भाग - तीसरा )
✍️ कुमार सरोज
रात गहरा चुकी थी। खिड़की से आती चाँदनी कमरे में एक अजीब-सी शांति बिखेर रही थी। लेकिन उस शांति के भीतर दो दिलों में तूफ़ान चल रहा था।
निधि की आँखें लगातार केतकी के चेहरे पर टिकी थीं। उसे महसूस हो रहा था कि अब जो कहानी सामने आने वाली है, वही उसकी माँ की ज़िंदगी का सबसे काला अध्याय है।
केतकी ने गिलास से एक घूंट पानी पिया। उसकी आवाज़ भारी हो चुकी थी।
"बेटी... भगवान किसी स्त्री की परीक्षा लेता है तो पहले उसके सपने छीनता है, फिर उसके अपने... और अंत में उसके आँसू भी। लेकिन तुम्हारी माँ उन औरतों में से नहीं थी जो टूटकर बिखर जाएँ। वह टूटती थी... फिर खुद ही अपने आपको जोड़ लेती थी।"
निधि चुप रही।
सौम्या जिस कंपनी में काम करती थी, वहाँ उसकी मेहनत और विनम्रता की सब प्रशंसा करते थे। वह समय पर आती, ईमानदारी से काम करती और शाम को सीधे घर लौट जाती।
धीरे-धीरे कंपनी के मालिक और मैनेजर की नज़र उस पर टिकने लगी। लेकिन सौम्या ने कभी किसी को अपनी मुस्कान का गलत अर्थ निकालने का अवसर नहीं दिया।
एक दिन कंपनी में घोषणा हुई—
"इस शनिवार सभी कर्मचारियों के लिए वार्षिक समारोह रखा गया है। सभी की उपस्थिति अनिवार्य है।"
सौम्या ने पहले जाने से मना कर दिया। लेकिन सहकर्मियों के बहुत आग्रह पर वह कुछ समय के लिए समारोह में चली गई।
मगर उसे क्या पता था, कि यह शाम उसकी पूरी ज़िंदगी बदल देगी।
समारोह में संगीत, हँसी और शोर था। सौम्या एक कोने में बैठी थी। उसी दौरान किसी ने उसे पेय पदार्थ दिया। कुछ देर बाद उसका सिर भारी होने लगा। आँखों के सामने सब धुँधला पड़ने लगा। उसे याद है कि उसने उठने की कोशिश की, फिर सब कुछ अँधेरे में खो गया।
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जब उसे होश आया, तो उसकी दुनिया अब पहले जैसी नहीं रही थी। वह काँप रही थी। उसकी आत्मा जैसे किसी ने छलनी कर दी थी। उसके साथ एक जघन्य अपराध हुआ था। उसकी इज्जत को लुट लिया गया था।
केतकी कुछ क्षण के लिए रुक गई। उसने आँखें बंद कर लीं।
"उस दिन तुम्हारी माँ ने सिर्फ़ अपना सम्मान नहीं खोया था, बेटी, उसने इंसानों पर भरोसा भी खो दिया था।"
निधि की मुट्ठियाँ भींच गईं। उसकी साँसें तेज़ हो चुकी थीं।
सौम्या पूरी रात रोती रही। लेकिन सुबह होते ही उसने एक निर्णय लिया।
"मैं चुप नहीं रहूँगी।"
वह सीधे घर पहुँची। राज दरवाज़े पर ही मिला। उसने सौम्या का चेहरा देखा।
"क्या हुआ?"
सौम्या फूट-फूटकर रो पड़ी। उसने बिना कुछ छिपाए पूरी घटना बता दी। वह चाहती तो यह बात हमेशा के लिए अपने भीतर दफना सकती थी। लेकिन उसने अपने पति से सच छिपाना उचित नहीं समझा।
सुनकर कुछ देर तक राज चुप बैठा रहा। सौम्या को लगा, राज उसे अगले ही पल उसका हाथ पकड़कर पुलिस स्टेशन ले जाएगा। लेकिन राज ने जो कहा, उसने सौम्या के पैरों तले की ज़मीन खिसका दी।
" तुम्हारे साथ जो हुआ, उसके बाद अब तुम मेरे किसी काम की नहीं रहीं।"
सौम्या ने अविश्वास से उसकी ओर देखा।
"राज...! मैंने क्या गलती की है?"
राज की आँखों में न दया थी... न प्रेम... न विश्वास। सिर्फ़ संकीर्ण सोच और स्वार्थ था।
"लोग क्या कहेंगे?" मैं ऐसी औरत के साथ नहीं रह सकता।"
सौम्या उसके पैरों पर बैठ गई।
"मेरी गलती क्या है?" मुझे तुम्हारे सहारे की ज़रूरत है। चलो पुलिस के पास चलते हैं। "
राज ने उसका हाथ झटक दिया।
"मेरे घर से निकल जाओ। अभी... इसी वक्त।"
सौम्या के लाख गिड़गिड़ाने के बाबजूद भी राज का दिल नहीं पिघला। अंततः वह बुझे मन उसी समय वहां से एक अजनबी मंजिल की ओर निकल पड़ती है।
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उस रात बनारस की सड़कें सुनसान थीं। आसमान में बादल थे। हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी। सौम्या के पास अभी सिर्फ एक छोटा सा बैग था। उसके पास अब न कोई अपना था... न कोई मंज़िल। लेकिन उसके भीतर अभी भी एक धड़कन थी, जो उसे हारने नहीं दे रही थी। वह धड़कन उसके गर्भ में पल रही तीन महीने की बच्ची की थी। वह मां बनने वाली थी।
सौम्या ने अपने पेट पर हाथ रखा।
धीरे से बोली—
"बेटी...। तेरी माँ हारकर नहीं रोएगी, अब तेरे लिए जिएगी।"
उस रात उसने बनारस रेलवे स्टेशन के एक बेंच पर बैठकर पूरी रात काटी। आँखों में नींद नहीं थी, लेकिन एक नया संकल्प ज़रूर था।
"दादी...। "
निधि की आँखें भर आईं।
"क्या माँ उस समय मुझे महसूस करती थीं?"
केतकी मुस्कुराई।
"हर पल।"
"वह अक्सर अपने पेट पर हाथ रखकर कहती थीं—"
"'मुझे दुनिया से लड़ने की ताक़त मेरी बेटी दे रही है।'"
निधि अब अपने आँसू नहीं रोक सकी। वह चुपचाप केतकी का हाथ पकड़कर बैठ गई।
केतकी ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
"बेटी...। "
"उस रात तुम्हारी माँ ने एक पति को खोया था।लेकिन उसी रात एक माँ का जन्म हुआ था।"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। दीवार पर टंगी सौम्या की तस्वीर जैसे मुस्कुरा रही थी। मानो कह रही हो—
"मेरी असली यात्रा तो अब शुरू हुई थी...। "
क्रमशः आगे ...
📖💌📖 उसकी मां कहानी के यदि आपने अभी तक पीछे का भाग नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। एक नारी के प्रेम और संघर्ष की बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली मार्मिक कहानी है।
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💅 उसकी मां
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