बिंदिया और बबलू :- अध्याय– 24 | अंकित की तलाश | हिंदी उपन्यास | कुमार सरोज | किशोरवाणी |
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पुराने घर के तहखाने से बबलू, बिंदिया, रंजीत और सुधा को सहयोग मंडल से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले। उनमें यह खुलासा हुआ कि हरिहर सिंह बबलू और उसके परिवार की संपत्ति के संरक्षक थे।
सबसे बड़ा रहस्य तब सामने आया, जब एक दस्तावेज में लिखा मिला—
“जब तीनों बच्चे फिर एक साथ होंगे, तभी यह अधिकार सक्रिय होगा।”
लेकिन तहखाने से बाहर किसी ने एक चेतावनी छोड़ दी—
“अब अगला नंबर अंकित का है।”
बबलू को समझ आ गया कि उसका खोया हुआ भाई सिर्फ अतीत का हिस्सा नहीं है। वह आज भी किसी ऐसे व्यक्ति के निशाने पर है, जो वर्षों पुराने रहस्य को सामने नहीं आने देना चाहता।
अब पढ़िए आगे......
अंकित की तलाश
( अध्याय - 24 )
✍️ कुमार सरोज
रात लगभग समाप्त हो चुकी थी, मगर बबलू की आंखों में नींद का नाम नहीं था। वह घर के बाहर चारपाई पर लेटा आसमान की ओर देख रहा था।
तभी घर के अंदर से बिंदिया चुपचाप उसके पास आकर बैठ गई।
कुछ देर दोनों मौन रहे।
फिर बिंदिया ने पूछा—
“आप सारी रात यहीं थे?”
बबलू ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“जिस भाई को बचपन में खो दिया हो, उसे पाने की खबर सुनकर आदमी सोता नहीं है।”
“डर लग रहा है?”
बबलू ने सिर झुका लिया।
“हां।”
बिंदिया ने आश्चर्य से पूछा—
“आपने यह मान लिया?”
बबलू मुस्कुराया।
“दुनिया के सामने मैं जितना भी बहादुर बन जाऊं, तुम्हारे सामने झूठ बोलना मुश्किल है।”
बिंदिया ने कहा—
“डरना कमजोरी नहीं है। डर के बावजूद सही रास्ते पर चलना ही हिम्मत है।”
बबलू ने उसकी ओर देखा।
“तुम मेरे साथ हो न?”
बिंदिया ने बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ लिया।
“जहां तक आपकी कहानी जाएगी, वहां तक मैं साथ चलूंगी।”
तभी पीछे से आवाज आई—
“अगर दोनों की कहानी खत्म हो गई हो तो हम एक जरूरी बात कहें?”
दोनों ने पीछे देखा।
महेश हाथ में चाय के दो गिलास लिए खड़ा था।
बबलू ने पूछा—
“तुम सुबह-सुबह यहां क्या कर रहे हो?”
महेश ने गिलास आगे करते हुए कहा—
“भईया, आप भाई खोजने जा रहे हैं। हम सोचे पहले चाय पिला दें। पता नहीं खोजते-खोजते चाय मिले न मिले।”
बिंदिया हंस पड़ी।
बबलू ने पूछा—
“और तुम्हारी जरूरी बात?”
महेश ने गंभीर चेहरा बनाया।
“हम भी आपके साथ चलेंगे।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर अंकित भईया मिल गए तो पहचान कौन कराएगा?”
बबलू बोला—
“तुम्हें कैसे पता कि तुम पहचान लोगे?”
महेश ने तुरंत कहा—
“नहीं पहचानेंगे, मगर कम से कम गलत आदमी को पहचानने में आपकी मदद कर देंगे।”
बिंदिया हंसते-हंसते बोली—
“महेश, तुम्हारे अंदर आत्मविश्वास बहुत है।”
महेश ने गर्व से कहा—
“ज्ञान थोड़ा कम है, लेकिन आत्मविश्वास पूरा है।”
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सुबह होते ही सब लोग शर्मा बाबू के घर पहुंचे। रंजीत भी वहां पहले से मौजूद था। उसके हाथ में एक पुराना नक्शा था।
“मुझे लगता है अंकित को खोजने का पहला सुराग इसमें है।”
बबलू ने नक्शा लिया। उसमें मंझार गांव से करीब पंद्रह किलोमीटर दूर एक छोटा-सा कस्बा बना हुआ था।
नाम था— चाकंद ।
बिंदिया ने पूछा—
“यह जगह क्यों?”
रंजीत ने कहा—
“मेरे पिता की डायरी में बार-बार इसका जिक्र आया है।”
शर्मा बाबू ने धीरे से कहा—
“ चाकंद । ”
बबलू ने उनकी ओर देखा।
“आप इस जगह को जानते हैं?”
शर्मा बाबू ने कहा—
“बहुत अच्छी तरह।”
“वहां क्या है?”
शर्मा बाबू ने उत्तर दिया—
“एक पुराना अनाथालय।”
सुधा अचानक चौंक गई।
“अनाथालय?”
शर्मा बाबू ने उसकी ओर देखा।
“हां।”
सुधा की आंखों में जैसे कोई पुरानी याद जाग उठी।
“मुझे बचपन में किसी ने एक जगह छोड़ा था... शायद वहां।”
बबलू ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम्हें कुछ याद है?”
सुधा ने आंखें बंद कर लीं।
“एक बड़ा नीम का पेड़... लाल रंग का दरवाजा... और एक बूढ़ी औरत।”
रंजीत ने कहा—
“यही तो है!”
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दोपहर से पहले सभी चाकंद के लिए निकल पड़े। रास्ते में खेत, पगडंडियां और पुराने पेड़ उनके साथ चलते रहे।
महेश साइकिल चलाते-चलाते अचानक बोला—
“भईया, अगर अंकित भईया हमें देखते ही पहचान गए तो?”
बबलू ने कहा—
“तो अच्छा होगा।”
“और अगर नहीं पहचाने?”
“तो हम उन्हें याद दिलाएंगे।”
महेश ने कुछ सोचकर कहा—
“और अगर उन्होंने कहा कि आप हमारे भाई नहीं हैं?”
बबलू कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
“तब भी मैं उन्हें अपना भाई ही मानूंगा।”
महेश पहली बार चुप हो गया।
बिंदिया ने दूर से यह बात सुनी तो उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
शाम ढलने से पहले वे चाकंद पहुंच गए। पुराने अनाथालय का लाल दरवाजा अब भी मौजूद था। दरवाजे के पास एक बूढ़ी महिला चारपाई पर बैठी थी।
सुधा उसे देखते ही ठिठक गई।
“मैं इन्हें पहचानती हूं। ”
बूढ़ी महिला ने सुधा को गौर से देखा।
कुछ क्षण बाद उसकी आंखें फैल गईं।
“तुम। ”
सुधा आगे बढ़ी।
“अम्मा। ”
बूढ़ी महिला की आंखों में आंसू आ गए।
“तुम जिंदा हो बिटिया?”
बबलू का दिल तेजी से धड़कने लगा।
“अम्मा, आप मेरी बहन को जानती हैं?”
बूढ़ी महिला ने बबलू को देखा।
फिर सुधा को।
फिर उसके पीछे खड़े रंजीत को।
उसने कांपती आवाज में कहा—
“तुम तीनों को देखकर लगता है जैसे समय वापस लौट आया।”
बूढ़ी महिला ने उन्हें अंदर बुलाया। पुराने कमरे में धूल से ढकी अलमारियां थीं। एक कोने में लकड़ी का संदूक पड़ा था।
महिला ने कहा—
“बहुत साल पहले एक आदमी एक छोटी बच्ची को यहां छोड़कर गया था।”
सुधा ने पूछा—
“वह आदमी कौन था?”
बूढ़ी महिला ने कहा—
“नाम नहीं बताया था।”
बबलू ने पूछा—
“फिर?”
“बस इतना कहा था कि बच्ची को सुरक्षित रखना। एक दिन उसका परिवार उसे लेने आएगा।”
रंजीत ने पूछा—
“क्या वह हरिहर सिंह था?”
बूढ़ी महिला ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
सभी चौंक गए।
“तो कौन?”
बूढ़ी महिला ने कहा—
“एक आदमी था, जिसकी आवाज बहुत भारी थी।”
बबलू की नजरें शर्मा बाबू की ओर गईं।
शर्मा बाबू ने तुरंत कहा—
“मेरी आवाज ऐसी नहीं है।”
महेश धीरे से बोला—
“चाचा, अभी किसी ने आप पर आरोप लगाया भी नहीं था।”
शर्मा बाबू ने उसे घूरा। महेश चुप हो गया।
बूढ़ी महिला ने पुराना संदूक खोला। उसमें कुछ कपड़े, खिलौने और पुराने कागज थे। फिर उसने एक छोटा-सा लिफाफा निकाला।
उस पर लिखा था—
“अंकित के लिए।”
बबलू के हाथ कांप गए।
“यह किसने लिखा?”
महिला ने कहा—
“जिस आदमी ने सुधा को यहां छोड़ा था।”
बबलू ने लिफाफा खोला।
अंदर एक छोटा कागज था।
उस पर केवल एक वाक्य लिखा था—
“अंकित को चाकंद मत आने देना।”
रंजीत ने पूछा—
“क्यों?”
बूढ़ी महिला ने सिर झुका लिया।
“क्योंकि अंकित को पहले ही किसी दूसरी जगह भेज दिया गया था।”
बबलू ने बेचैनी से पूछा—
“कहां?”
बूढ़ी महिला ने कहा—
“नवादा।”
बिंदिया ने पूछा—
“नवादा में कौन?”
महिला ने जवाब दिया—
“एक स्कूल मास्टर।”
बूढ़ी महिला ने संदूक से एक और कागज निकाला। उस पर लिखा था—
“रामनाथ मिश्र — प्राथमिक विद्यालय, नवादा।”
रंजीत ने कागज पढ़ते हुए कहा—
“यह तो बहुत पुराना पता है।”
शर्मा बाबू बोले—
“लेकिन शायद यही अगला सुराग है।”
बबलू ने कागज अपने हाथ में लिया।
“तो हम नवादा जाएंगे।”
बिंदिया ने कहा—
“अभी?”
बबलू ने दृढ़ स्वर में कहा—
“जब बारह साल इंतजार किया है, तो एक रात और सही। लेकिन अब हम रुकेंगे नहीं।”
उधर अनाथालय से कुछ दूरी पर एक पेड़ के पीछे एक आदमी खड़ा था। उसने पूरी बातचीत सुनी थी। उसने जेब से फोन निकाला।
“वे नवादा जा रहे हैं।”
दूसरी तरफ से आवाज आई—
“उन्हें वहां पहुंचने मत देना।”
उस आदमी ने पूछा—
“अगर पहुंच गए तो?”
कुछ क्षण सन्नाटा रहा।
फिर आवाज आई—
“तो अंकित तक पहुंचने से पहले उन्हें रोक दो।”
फोन कट गया। उस आदमी ने पीछे मुड़कर देखा। उसकी आंखों में एक अजीब-सी कठोरता थी। फिर वह अंधेरे में गायब हो गया।
रास्ते में बबलू चुप था।
बिंदिया ने पूछा—
“क्या सोच रहे हैं?”
बबलू ने कहा—
“अंकित अगर सचमुच जिंदा है, तो उसने इतने साल क्या सहा होगा?”
बिंदिया ने कहा—
“अब वह अकेला नहीं होगा।”
“अगर उसने मुझे भाई मानने से इनकार कर दिया तो?”
बिंदिया मुस्कुराई।
“आपने कहा था न—रिश्ता खून से नहीं, निभाने से बनता है।”
बबलू ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हें मेरी हर बात याद रहती है?”
“आपकी जरूरी बातें याद रहती हैं। बाकी बातें भूल जाती हूं।”
बबलू मुस्कुरा दिया।
लेकिन तभी रंजीत की आवाज आई—
“सब लोग रुकिए!”
सभी रुक गए।
सड़क के बीचोंबीच एक पत्थर पड़ा था।
उस पर लाल रंग से लिखा था—
“नवादा मत जाना।”
महेश ने उसे पढ़ा और बोला—
“लगता है किसी ने हमारे लिए रास्ते में स्वागत संदेश लिख रखा है।”
रंजीत ने गंभीर होकर कहा—
“यह स्वागत नहीं, चेतावनी है।”
बबलू ने पत्थर की ओर देखा।
फिर दृढ़ आवाज में बोला—
“अब तो नवादा जरूर जाएंगे।”
बिंदिया ने पूछा—
“क्यों?”
बबलू ने कहा—
“क्योंकि जो आदमी रास्ता रोकने लगा है, वह डर गया है कि हम सच तक पहुंच जाएंगे।”
सभी आगे बढ़ गए।
और पीछे अंधेरे में वही अनजान आदमी खड़ा उन्हें जाता हुआ देखता रहा।
उसने धीरे से कहा—
“बबलू, तुम सच के जितने करीब जा रहे हो, उतने ही अपने अंत के करीब भी।”
🔥 क्रमशः आगे...
अगले अध्याय में...
नवादा में कौन है रामनाथ मिश्र?
क्या वह अंकित के बारे में सच बताएगा?
क्या अंकित सचमुच जिंदा है?
और बबलू को नवादा जाने से रोकने वाला रहस्यमय आदमी आखिर कौन है?
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