बिंदिया और बबलू :- अध्याय – 21 | तस्वीर में छिपा तीसरा चेहरा | हिंदी उपन्यास | कुमार सरोज | किशोरवाणी |





               👩‍❤️‍👩  बिंदिया और बबलू  👩‍❤️‍👩


  
अभी तक आपने पढ़ा...

         कुछ तस्वीरें केवल अतीत की याद नहीं होतीं; वे आने वाले तूफान की खबर भी होती हैं।

           रंजीत को सेवरी काकी के घर से सहदेव सिंह की डायरी मिली, जिसमें बबलू के अतीत से जुड़े कई रहस्य सामने आए। उसे एहसास हुआ कि बबलू उसका दुश्मन नहीं, बल्कि किसी पुरानी साजिश का शिकार हो सकता है।

         रंजीत और बबलू ने पहली बार दुश्मनी भूलकर साथ आने का फैसला किया।

         लेकिन तभी एक अनजान युवक बबलू को एक पुरानी तस्वीर देकर चला गया। तस्वीर में बबलू के पिता, हरिहर सिंह और दिनेश्वर सिंह के साथ दो बच्चे दिखाई दे रहे थे।

         बबलू ने उन बच्चों को पहचान लिया—वह स्वयं और उसका भाई अंकित थे।

        लेकिन तस्वीर के पीछे लिखी एक पंक्ति ने सबको हिला दिया—

“असली दुश्मन उससे भी करीब है।”

         अब सवाल था—इस तस्वीर में छिपा सच आखिर किस ओर इशारा कर रहा था?




              
             तस्वीर में तीसरा चेहरा 

                 (  अध्याय - 21 ) 

                                      ✍️  कुमार सरोज 



           रात भर बबलू ठीक से सो नहीं सका। तस्वीर उसके सिरहाने रखी थी और वह बार-बार उसे उठाकर देखता।

बगल में सोई बिंदिया की भी आंख खुल गई।

“अभी तक सोए नहीं?”

बबलू ने धीमे स्वर में कहा—

“नींद आ रही है, मगर आंखें बंद करते ही बचपन सामने आ जाता है।”

बिंदिया उठकर बैठ गई।

“क्या याद आ रहा है?”

बबलू कुछ देर चुप रहा।

“एक आंगन... मां की आवाज... पिताजी का हाथ... और एक छोटा-सा लड़का, जो हर समय मेरे पीछे घूमता रहता था।”

बिंदिया ने उसका हाथ थाम लिया।

“अंकित?”

बबलू की आंखें भर आईं।

“हां... मेरा छोटा भाई।”

बिंदिया ने तस्वीर उसकी हथेली पर रख दी।

“एक बात सोचिए। अगर यह तस्वीर सच है, तो आपके पिता ने आपको कभी भुलाया नहीं था।”

बबलू ने उसकी ओर देखा।

“मगर फिर मुझे इतने सालों तक अपने परिवार से दूर क्यों रखा?”

बिंदिया ने कहा—

“क्योंकि कभी-कभी माता-पिता अपने बच्चों से सच इसलिए छिपाते हैं, ताकि वे जिंदा रह सकें।”

बबलू कुछ नहीं बोला।

उसके चेहरे पर पहली बार गुस्से से ज्यादा पिता के लिए सम्मान दिखाई दे रहा था।



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             किसी तरह रात बीत गई। सुबह होते ही दरवाजे पर जोर से दस्तक हुई।

ठक-ठक-ठक!

महेश की आवाज आई—

“भईया! उठिए! गांव में सूरज निकल आया है और आप अभी तक चारपाई से चिपके पड़े हैं।”

बिंदिया हंस पड़ी।

बबलू ने दरवाजा खोला।

महेश हाथ में खाली गिलास लिए खड़ा था।

“भईया, चाय मिलेगी?”

बबलू ने कहा—

“तुम्हें अपने घर में चाय नहीं मिलती?”

महेश ने गंभीर चेहरा बनाया।

“मिलती है, लेकिन मां की चाय में प्यार कम और डांट ज्यादा होती है।”

बिंदिया हंसते हुए बोली—

“तो आज से तुम अपनी चाय खुद बनाना सीखो।”

महेश ने तुरंत हाथ जोड़ दिए।

“भाभी, हम पढ़ना सीख सकते हैं, खेती सीख सकते हैं, लेकिन चाय बनाना हमारे बस की बात नहीं।”

बबलू बोला—

“तुमसे तो लगता है जिंदगी भर कुछ भी सीखना मुश्किल है।”

महेश मुस्कुराया—

“आपके साथ रहकर एक चीज तो सीख ही गए हैं।”

“क्या?”

“मुसीबत आने पर मुस्कुराना।”

बबलू और बिंदिया एक-दूसरे को देखने लगे।

महेश ने अनजाने में ऐसी बात कह दी थी, जो इस समय बबलू के दिल में उतर गई।


          उधर रंजीत सुबह-सुबह अपने पिता हरिहर सिंह के पुराने कमरे में पहुंचा।

कमरे में पुरानी संदूक, किताबें और कुछ कागजात रखे थे।

दिनेश उसके साथ था।

  “ रंजीत भईया, आप सच में यह सब खंगालने वाले हैं ? ”

“हां।”

“अगर कुछ ऐसा मिल गया जिसे देखकर आपका अपने परिवार पर से भरोसा उठ गया तो?”

रंजीत ने संदूक खोलते हुए कहा—

“झूठ पर टिका भरोसा टूट जाए तो अच्छा है। सच पर टिका भरोसा फिर से बनाया जा सकता है।”

दिनेश ने सिर हिलाया।

दोनों कागजात देखने लगे।

अचानक रंजीत के हाथ एक पुरानी डायरी लगी।

उसके ऊपर लिखा था—

“मंझार छात्र सहायता कोष — 1998”

रंजीत ने पन्ने पलटे।

एक जगह बबलू के पिता का नाम था।

दूसरी जगह उसके पिता का।

और तीसरी जगह... दिनेश्वर सिंह।

रंजीत ने गहरी सांस ली।

“वह हर जगह मौजूद था।”

दिनेश बोला—

“मतलब?”

“मतलब यह कहानी जमीन-जायदाद की नहीं थी। कोई और चीज थी, जिसके लिए इन लोगों ने इतना बड़ा खेल खेला।”

     तभी रंजीत का फोन बजा। नंबर अनजान था।

“हैलो?”

कुछ क्षण तक दूसरी ओर कोई आवाज नहीं आई।

फिर एक भारी आवाज सुनाई दी—

“अगर सच जानना है तो अपने पुराने घर के पीछे वाले कुएं में देखो।”

रंजीत ने तुरंत पूछा—

“आप कौन बोल रहे हैं?”

फोन कट गया।

दिनेश ने पूछा—

“कौन था?”

रंजीत ने कहा—

“शायद वही आदमी, जो चाहता है कि हम सच तक पहुंचें।”

दिनेश ने सिर खुजाया।

“आजकल गांव में लोग रास्ता पूछने के बजाय रहस्य क्यों बताते हैं?”

रंजीत हंस पड़ा।

“क्योंकि तुमसे रास्ता पूछने वाला भी पहले डर जाता होगा।”


 
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             दोपहर होते-होते रंजीत और दिनेश दोनों अपने पुराने घर जो की बगल के ही गांव मेन में था पहुंच गए। मेन रंजीत का पैतृक घर था, मंझार में तो उसकी नानी का घर था, मगर अब वही रहता था। मेन वाला घर हमेशा बंद ही रहता था। रंजीत के दादा बहुत बड़े जमींदार थे। घर भी बहुत बड़ा था, मगर अब खंडहर हो गया था।

          घर के पीछे चारदिवारी के अन्दर ही एक बड़ा सा कुआं  था। अब उसके आसपास बहुत सारी झाड़ियां उग आई थीं। 

दिनेश बोला—

“अगर अंदर सांप निकला तो?”

रंजीत ने कहा—

“तुम्हारी शादी नहीं हुई है। सांप से ज्यादा डरने की जरूरत तुम्हें किस बात की है?”

“ भईया मजाक मत कीजिए। ”

           रंजीत और दिनेश ने झाड़ियों को हटाना शुरू किया।

         कुछ देर बाद उसे पत्थर के नीचे लोहे का एक छोटा-सा डिब्बा दिखाई दिया।

दोनों ने उसे बाहर निकाला।

डिब्बे पर जंग लगी थी।

रंजीत ने उसे खोला।

अंदर कुछ पुराने कागजात थे।

और एक छोटी-सी तस्वीर।

तस्वीर देखते ही रंजीत के चेहरे का रंग बदल गया।

“यह तो..। ”

दिनेश ने तस्वीर छीनकर देखी।

उसमें वही दो बच्चे थे—अमित और अंकित।

लेकिन इस बार उनके साथ तीसरा बच्चा भी था।

एक लड़की। उसके गले में छोटी-सी चांदी की ताबीज थी।

पीछे लिखा था—

“हम तीनों को अलग मत करना।”

रंजीत ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

“यह लड़की कौन है?”


                उधर बिंदिया पुराने फोटो को मोबाइल में साफ करने की कोशिश कर रही थी।

उसने तस्वीर को बड़ा किया।

अचानक उसकी नजर तस्वीर के पीछे बने एक छोटे निशान पर गई।

“बबलू!”

बबलू पास आया।

“क्या हुआ?”

बिंदिया ने स्क्रीन दिखाते हुए कहा—

“यह निशान देखिए।”

बबलू ने देखा।

तस्वीर के कोने में एक छोटा-सा चिन्ह बना था—

एक कमल के भीतर ‘S’।

बबलू ने माथे पर हाथ रख लिया।

“मैंने यह निशान पहले भी देखा है।”

“कहां?”

“शर्मा बाबू के पुराने कागजों पर।”

बिंदिया कुछ क्षण चुप रही।

फिर बोली—

“तो शायद शर्मा बाबू केवल आपके अतीत के गवाह नहीं हैं।”

बबलू ने उसकी ओर देखा।

“तुम क्या कहना चाहती हो?”

“हो सकता है वह इस पूरी कहानी का एक जरूरी हिस्सा हों।”

बबलू का चेहरा गंभीर हो गया।


         शाम को बबलू सीधे शर्मा बाबू के घर पहुंचा।

दरवाजा खुलते ही उसने पूछा—

“आपके पास कमल का निशान क्यों है?”

शर्मा बाबू कुछ क्षण उसे देखते रहे।

फिर उनकी आंखें झुक गईं।

“तुमने वह निशान कहां देखा?”

बबलू ने तस्वीर सामने कर दी।

शर्मा बाबू के हाथ कांपने लगे।

“यह तस्वीर तुम्हें कहां मिली?”

“अब आप सवाल मत कीजिए। जवाब दीजिए।”

शर्मा बाबू कुर्सी पर बैठ गए। उनकी आवाज भारी हो गई।

“यह निशान एक पुराने संगठन का था।”

बिंदिया ने पूछा—

“किस संगठन का?”

शर्मा बाबू बोले—

“‘सहयोग मंडल’।”

बबलू ने पूछा—

“और इसका मेरे परिवार से क्या संबंध था?”

शर्मा बाबू ने धीरे से कहा—

“तुम्हारे पिता उसके संस्थापक थे।”

बबलू स्तब्ध रह गया।

लेकिन शर्मा बाबू ने अगली बात कहकर सबको और चौंका दिया—

“और दिनेश्वर सिंह उस संगठन का सदस्य था।”

बबलू ने पूछा—

“तो फिर वह मेरे पीछे क्यों पड़ा?”

शर्मा बाबू ने कहा—

“क्योंकि उसे संगठन की असली संपत्ति के बारे में पता चल गया था।”

“कौन-सी संपत्ति?”

शर्मा बाबू ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

“वह संपत्ति जमीन नहीं थी।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

बिंदिया ने धीरे से पूछा—

“फिर क्या थी?”

शर्मा बाबू ने उत्तर दिया—

“ऐसे दस्तावेज, जिनमें गांव की कई जमीनों का असली मालिकाना हक दर्ज था।”

बबलू के चेहरे पर चिंता उभर आई।

“और वे दस्तावेज कहां हैं?”

शर्मा बाबू ने कहा—

“तुम्हारे पिता ने उन्हें ऐसी जगह छिपाया था, जहां कोई सोच भी नहीं सकता।”

“कहां?”

शर्मा बाबू कुछ कह पाते, उससे पहले बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।

तीनों चुप हो गए। कदमों की आवाज दरवाजे के पास आकर रुक गई।

फिर बाहर से आवाज आई—

“शर्मा बाबू... बहुत साल छिपा लिया। अब सच बताने का समय आ गया है।”

शर्मा बाबू का चेहरा सफेद पड़ गया।

           बबलू ने धीरे से दरवाजे की ओर कदम बढ़ाया।दरवाजा खोला। बाहर कोई नहीं था। सिर्फ जमीन पर एक पुराना लिफाफा पड़ा था।

बबलू ने लिफाफा उठाया।

उस पर लिखा था—

“जिस तीसरे बच्चे को तुम खोज रहे हो, वह तुम्हारे बहुत करीब है।”

बबलू और बिंदिया एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।



                            🔥 क्रमशः आगे...


अगले अध्याय में...

तीसरा बच्चा आखिर कौन है?

क्या वह बबलू के गांव में ही मौजूद है?

‘सहयोग मंडल’ की असली कहानी क्या थी?

और क्या दिनेश्वर सिंह के पास आज भी वह राज मौजूद है, जिसके लिए बारह साल पहले दो भाइयों को अलग किया गया था?

             📖💌📖 बिंदिया और बबलू उपन्यास के यदि आपने अभी तक पीछे का अध्याय नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। ग्रामीण परिवेश की बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली रहस्यमयी कहानी है। 

            पीछे के अध्याय को पढ़ने के लिए नीचे लिखे उपन्यास के शीर्षक पर क्लिक कीजिए -





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