अपनों के बीच अकेला | एक विद्यार्थी के अपमान और संघर्ष की मार्मिक कहानी | काजल कुमारी | किशोरवाणी |
कभी-कभी इंसान को सबसे गहरे घाव गैरों से नहीं, बल्कि अपनों से मिलते हैं। जिन रिश्तों के बीच उसे अपनापन, सम्मान और सहारा मिलना चाहिए, उन्हीं रिश्तों के बीच उसका आत्मसम्मान धीरे-धीरे दम तोड़ने लगता है।
" अपनों के बीच अकेला’ हिमांशु की ऐसी ही दर्दभरी कहानी है, जो अपने गाँव मंझौल से शहर पढ़ने आया है। आँखों में बेहतर भविष्य के सपने लिए हिमांशु दिनभर पढ़ाई के साथ घर के कामों में भी जुटा रहता है। लेकिन उसकी मेहनत को सम्मान मिलने के बजाय उसे ताने, गालियाँ और अपमान सहना पड़ता है। आखिर कब तक वह अपने आँसुओं को छिपाकर सब कुछ सहता रहेगा? क्या अपनों के बीच रहने वाला हिमांशु कभी अपनेपन का एहसास कर पाएगा?
यह कहानी केवल एक विद्यार्थी की पीड़ा नहीं, बल्कि उन अनगिनत युवाओं के संघर्ष का आईना है, जो अपने भविष्य को सँवारने के लिए घर-परिवार से दूर रहकर पढ़ाई करते हैं।
अपनों के बीच अकेला
✍️ काजल कुमारी
यह केवल एक दिन की बात नहीं थी, यह हिमांशु के स्वाभिमान पर रोज़ गिरने वाली उस छीट की कहानी थी, जो धीरे-धीरे उसके आत्म-सम्मान को गला रही थी। मंझौल गाँव की शांत गलियों से निकलकर जब वह पढ़ाई करने शहर आया था, तो उसके सपनों में किताबों की सुगंध थी, लेकिन हकीकत में उसकी हथेलियों पर चावल के भारी बोरों का दबाव और कानों में अपनों की कड़वी गालियाँ थीं।
उस दिन सुबह से ही हिमांशु का शरीर मशीन की तरह चल रहा था। सुबह-सुबह साइकिल से क्लास जाना, फिर लौटते ही मोटरसाइकिल से बिपिन किराना दुकान की उस दमघोंटू भीड़ में घंटों खड़े रहना—सब उसने खामोशी से किया। घर में हर सामान पहुँचे, इसके लिए स्कैनर की फोटो जीजाजी को भेजी, फिर राशन का वो भारी-भरकम बोझ उठाया। सामान इतना ज़्यादा था कि उसकी रीढ़ की हड्डी तक झुक गई थी। पहले झोला और आटा ऊपर पहुँचाया, फिर हाँफते-काँपते चावल का पूरा बोरा उठा लाया।
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जब वह चावल और आटे को अलग-अलग बर्तनों में पलट रहा था, तो उसके पूरे शरीर से पसीना छन-छन कर टपक रहा था। लेकिन उस पसीने की एक बूंद की भी कद्र किसी को नहीं थी। थकान से पस्त हिमांशु की साँसें अभी शांत भी नहीं हुई थीं कि दीदी का हुक्म आया—"दीपक आने वाला है, 5 ग्लास चावल बना दो।" हिमांशु ने बिना एक पल गँवाए, बुझते हुए चिराग की तरह खुद को फिर से काम में झोंक दिया और हांडी चढ़ा दी।
सुबह उठकर जो बिस्तर उसने सलीके से सजाया था, दोपहर में लौटकर देखा तो पाखी और देव ने उसे तहस-नहस कर दिया था। उसने चुपचाप बिछावन झाड़ा, दो निवाले मुँह में डाले और फिर साइकिल उठाकर क्लास के लिए निकल पड़ा। रास्ते में दीदी का फोन आया, गोभी और धनिया पत्ती का फरमान मिला, वह भी ले आया। पर घर लौटते ही जो दृश्य दिखा, उसने उसके दिल को भीतर तक तोड़ दिया। पूरा कमरा फिर से कचरे से भर दिया गया था।
थकान से चूर हिमांशु जैसे ही बिस्तर पर लेटा और मोबाइल हाथ में लिया, दीदी की चीखती हुई आवाज़ उसके कानों में शूल की तरह चुभी—"लहसुन बोले थे लाने, लाया नहीं और मोबाइल देख रहा है हरामी!"
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वह शब्द 'हरामी' किसी तेजाब की तरह उसके स्वाभिमान पर गिरा। हिमांशु अभी संभल भी नहीं पाया था कि दीदी खुद ही बगल के घर में लहसुन माँगने चली गईं। अपमान की उस गहरी खामोशी को पीकर वह फिर उठा, साइकिल संभाली और बिपिन किराना की तरफ भागा। आधा किलो लहसुन लिया। रास्ते में सोचते हुए कि शायद घर में सबको पसंद आए, उसने अपने मन से काबुली चना और बिस्किट ले लिए। बिस्किट तो उसने अपने ही जेब के पैसों से खरीदे थे।
लेकिन जब वह लौटकर आया, तो प्यार या धन्यवाद की जगह उसे फिर से गालियों का अंबार मिला। काबुली चना ज़बरदस्ती वापस करवा दिया गया। दीदी का गुस्सा इतने पर भी नहीं थमा, वे उसके बिस्किट खरीदने पर ताना मारते हुए बोलीं—"पेटवे की लोटवे छै इक्कर... खाली बैठकर खाता है!"
अभी उसने एक पल का आराम भी नहीं किया था, जूठे बर्तनों का ढेर उसका इंतज़ार कर रहा था। और सबसे ज़्यादा दर्दनाक पल तो वो था जब दीदी उसे गालियाँ दे रही थीं, और छोटा देव पास खड़ा होकर हँस रहा था—"पगला कही का!"
उस बच्चे की इस हरकत पर दीदी ने उसे टोका तक नहीं, बल्कि नज़रअंदाज़ कर दिया। हिमांशु का ममेरा भाई दीपक भी वहीं मौजूद था, सब शांत थे, जैसे हिमांशु इंसान नहीं, कोई बेज़ुबान पत्थर हो जिस पर कोई भी चोट की जा सकती थी।
हिमांशु उस वक्त पूरी तरह मौन रहा। उसने अपनी आँखों में तैर आए आँसुओं को पलकों के भीतर ही सुखा लिया। उसके अंदर एक गहरा सन्नाटा छा गया। उसने मन ही मन सोचा—‘हाँ, शायद मैं सचमुच यहाँ मुफ़्त का बैठकर खाता हूँ... मेरी मेहनत, मेरी भाग-दौड़, मेरा पसीना, सब बेमानी है। माँ-बाप से दूर यहाँ आकर पढ़ना शायद यही कीमत माँगता है।’
उस रात, बर्तन धोते हुए नल के बहते पानी की आवाज़ में हिमांशु की सिसकियाँ दब गईं। उसकी उंगलियाँ बर्तन रगड़ रही थीं, और आँखें अपनी किस्मत पर रो रही थीं। मंझौल का वो सीधा-साधा हिमांशु उस रात मुस्कुराना भूल गया था; उसने समझ लिया था कि इस भरी दुनिया में अपनों के बीच रहकर भी अकेले कैसे जिया जाता है।
काजल कुमारी
कन्हैयाचक, खगड़िया (बिहार)
💔 मासूम संदेश
किसी के घर में रहना, उसकी सुविधाओं का इस्तेमाल करना या उससे मदद लेना किसी इंसान के आत्मसम्मान को कुचलने का अधिकार नहीं देता। खासकर उस विद्यार्थी को, जो अपने भविष्य के लिए संघर्ष कर रहा हो।
।याद रखिए, किसी की मजबूरी का मजाक उड़ाना आसान है, लेकिन उसकी जगह खड़े होकर उसका दर्द समझना मुश्किल। कभी-कभी एक अपमानजनक शब्द किसी के मन पर ऐसा घाव छोड़ जाता है, जिसे भरने में बरसों लग जाते हैं। रिश्तों की असली पहचान अधिकार जताने में नहीं, बल्कि सम्मान देने में होती है।
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