उसकी माँ / Usaki Maa | भाग- पहला | एक माँ के संघर्ष, स्वाभिमान और त्याग की दिल छू लेने वाली कहानी | किशोरवाणी |




   

                   ❤️  उसकी माँ 


              एक माँ अपने बच्चे के लिए कितनी दूर तक जा सकती है ?

                 क्या समाज के अन्याय और अपनों के विश्वासघात के बाद भी कोई स्त्री अपने स्वाभिमान के साथ नई ज़िंदगी शुरू कर सकती है ?

              उसकी माँ  एक ऐसी ही साहसी महिला सौम्या की कहानी है, जिसने प्रेम के लिए अपना परिवार छोड़ा, विश्वासघात सहा, अकेले बेटी को जन्म दिया, संघर्ष कर अपनी पहचान बनाई और अंत तक अपनी बेटी के भविष्य के लिए जीती रही।

               यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि हर उस माँ को समर्पित है जो अपने बच्चों के लिए स्वयं का हर सपना कुर्बान कर देती है।




                 वह आदमी कौन था ?

                  ( भाग- पहला )

                                   ✍️  कुमार सरोज 


                      दिल्ली की दोपहर अपने पूरे ताप पर थी। घड़ी की सुइयाँ दो बजने का संकेत दे चुकी थीं। तिलक नगर के एक पब्लिक स्कूल के बाहर अभिभावकों की भीड़ धीरे-धीरे छँट रही थी। रंग-बिरंगे बैग टाँगे बच्चे किसी चिड़िया के झुंड की तरह चहचहाते हुए अपने-अपने घरों की ओर लौट रहे थे।

             उसी भीड़ के बीच स्कूल के मुख्य द्वार के पास एक लगभग पचास वर्ष की स्त्री बार-बार सड़क की ओर देखती, फिर स्कूल के भीतर झाँकती। उसके चेहरे पर चिंता और झुँझलाहट एक साथ तैर रही थी।

उसका नाम था—केतकी।

          जिस बच्चे की उसे प्रतीक्षा थी, वह उसकी पोती नहीं, बल्कि उसकी साँसों की वजह थी।

"यह लड़की भी न...। " उसने बड़बड़ाते हुए कहा - "हर रोज़ कोई न कोई नई शरारत।"

            भीड़ लगभग समाप्त हो चुकी थी। तभी स्कूल के बरामदे से एक नन्ही-सी आवाज़ हवा में तैरती हुई आई—

"स्वीट हार्ट... आई एम कमिंग!"

केतकी ने सिर उठाकर देखा।

           गुलाबी पानी की बोतल कंधे पर झूल रही थी, दो चोटियाँ हवा में लहरा रही थीं और चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जैसे दुनिया की सारी खुशियाँ उसी की हों।

वह थी—निधि।

     निधि उछलती-कूदती दादी के सामने आकर खड़ी हो गई।

केतकी ने बनावटी गुस्से से आँखें तरेरीं।

"मैडम, घड़ी देखी है? मैं यहाँ आधे घंटे से खड़ी हूँ। इतनी देर क्यों लगा दी?"

निधि ने दोनों हाथ कमर पर रख दिए।

"ओहो... इतनी-सी बात पर टेंशन ! मैं कोई नर्सरी की बच्ची नहीं हूँ। फिफ्थ स्टैंडर्ड में पढ़ती हूँ अब।"

केतकी मुस्कुरा पड़ी।

"तुम्हारी बातें सुनकर लगता है, अभी-अभी पीएचडी करके निकली हो।"

निधि खिलखिला उठी।

"कभी-कभी मुझे लगता है, मैं आपकी दादी हूँ... और आप मेरी पोती।"

"हाँ-हाँ, बहुत बड़ी हो गई हो। चलो अब घर।"

दोनों हाथों में हाथ डाले स्कूल से बाहर निकल पड़ीं।

              स्कूल से उनका घर अधिक दूर नहीं था। इसलिए दोनों रोज़ पैदल ही आती-जाती थीं। यह रास्ता केवल घर तक नहीं जाता था, बल्कि उनके अनगिनत किस्सों, हँसी और बातों का साथी भी था।

कुछ दूर चलने के बाद केतकी ने पूछा—

"अब यह तो बताओ, आज इतनी देर क्यों हुई?"

निधि के चेहरे पर चमक आ गई।

"कल रात आपने सीता माता की जो कहानी सुनाई थी न, वही मैं अपनी फ्रेंड्स को सुना रही थी।"

"अरे पगली! मैंने तो आधी कहानी ही सुनाई थी।"

"तो मैंने भी आधी ही सुनाई। बाकी आधी तुम अभी सुना दो।"

"अभी?"

"हाँ।"

"नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि कहानी रात में सुनाई जाती है। दोपहर में नहीं।"

निधि ने होंठ फुला लिए।

"मतलब मैं इतनी दूर चुपचाप चलूँ?"

"हाँ।"

"अगर नहीं चली तो?"

केतकी ने हँसते हुए पूछा, "तो क्या करोगी?"

निधि ने बड़ी गंभीर मुद्रा बनाकर कहा—

"देख लेना... किसी दिन गुस्से में तुम्हें पीट दूँगी।"

केतकी ठहाका मारकर हँसी।

"अच्छा! जो छिपकली देखकर कुर्सी पर चढ़ जाती है, वह मुझे मारेगी?"

निधि भी हँसने लगी।

             मगर अगले ही पल केतकी की हँसी जैसे किसी ने छीन ली।

उसकी निगाह सड़क के दूसरी ओर जाकर ठहर गई।

एक आदमी बिजली के खंभे के पास खड़ा था।

उसकी आँखें लगातार इसी ओर लगी थीं।

केतकी का चेहरा पलभर में पीला पड़ गया।

दिल की धड़कन अचानक तेज हो गई।

उसने बिना कुछ कहे निधि का हाथ कसकर पकड़ लिया।

"चलो..."

"लेकिन दादी, हमारा रास्ता तो..."

"मैंने कहा न... चलो।"

इस बार उसकी आवाज़ में ऐसा कंपन था कि निधि चुप हो गई।

दोनों मुख्य सड़क छोड़कर दूसरी गली में मुड़ गईं।

यह रास्ता लंबा था।

         मगर आज केतकी को दूरी से अधिक किसी और बात का डर था।

पूरे रास्ते निधि कुछ नहीं बोली।

वह जानती थी—

दादी यूँ बिना वजह कभी रास्ता नहीं बदलतीं।


              घर पहुँचते ही केतकी ने राहत की साँस ली। जैसे किसी तूफ़ान से बचकर लौटी हो।

      घर पहुंच कर उसने दरवाज़ा बंद किया ही था कि पीछे से निधि की आवाज़ आई—

"दादी...। "

केतकी ठिठक गई।

"वह आदमी कौन था ? " 

केतकी ने सामान्य बनने की कोशिश की।

"कौन आदमी?"

"वही... जिसे देखते ही तुम रास्ता बदलकर घर आ गईं।"

केतकी मुस्कराई।

"अरे, कोई नहीं था। बस मेरा मन किया, दूसरी गली से आ गई।"

"झूठ।"

"क्या?"

"तुम झूठ बोल रही हो।"

केतकी ने उसकी ओर देखा।

    निधि की आँखें अब किसी बच्चे की नहीं, बल्कि सच खोजते इंसान की थीं।

"मैं तुम्हारे चेहरे को पढ़ना जानती हूँ। आज तुम डरी हुई थीं।"

केतकी ने बात बदलनी चाही।

"चलो, पहले कपड़े बदलो। मैं खाना लगाती हूँ।"

     वह रसोई की ओर बढ़ी ही थी कि निधि उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

"पहले सच।"

"निधि...। " 

"दादी, मेरी माँ की कसम खाकर कह दो कि तुम उस आदमी को नहीं जानती।"

       निधि की ये बात सुनते ही जैसे किसी ने केतकी के पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली।

      उसकी आँखें भर आईं। धीरे से उसने निधि का चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया।

"बेटी... तेरी माँ की झूठी कसम मैं मरते दम तक नहीं खा सकती।"

दोनों की आँखें भीग चुकी थीं।

          कमरे में कुछ पल के लिए ऐसा सन्नाटा छा गया कि दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक भी भारी लगने लगी।

निधि ने धीरे से उनका हाथ थाम लिया।

"अब बताओ... । दादी... वह आदमी कौन था?"

केतकी सोफ़े पर बैठ गई। उसके हाथ काँप रहे थे।





            निधि भी सामने बैठ गई। आज पहली बार उसे महसूस हुआ दादी के सीने में कोई ऐसा राज़ दफ़्न है, जो वर्षों से बाहर आने के लिए तड़प रहा है।

काफी देर तक केतकी चुप रही।

फिर काँपते होंठों से बोली—

"निधि...। "

"हाँ ?"

"अगर मैं जो कहूँ, उसे सुनकर तुम्हारी दुनिया बदल जाए तब ?"

निधि ने बिना पलक झपकाए उत्तर दिया—

  "सच चाहे जितना कठिन हो , झूठ से अच्छा होता है।"

केतकी की आँखों से आँसू बह निकले।

उसने भर्राए स्वर में कहा—

"सड़क के उस पार खड़ा आदमी...। " 

वह एक पल के लिए रुक गई।

"...तुम्हारा पिता था।"


            निधि के कानों में जैसे किसी ने तेज़ धमाका कर दिया। वह एक झटके से खड़ी हो गई।

"क्या...?"

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

"मेरे... पापा ?"

उसने आज तक यही जाना था कि उसके पिता इस दुनिया में नहीं हैं। फिर... आज अचानक...। वह ज़िंदा कैसे हो सकते थे ?

केतकी ने आँखें बंद कर लीं।

"हाँ...। वह ज़िंदा है, लेकिन केवल अपने लिए।।तुम्हारी माँ और तुम्हारे लिए... वह बारह साल पहले ही मर चुका था।"

कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया मानो समय भी ठहर गया हो।

         निधि की आँखों में एक साथ सैकड़ों प्रश्न तैरने लगे।

उसने धीमे स्वर में पूछा—

"दादी... मेरी माँ कौन थीं ? और... मेरे पिता ने हमें क्यों छोड़ दिया ? "

केतकी ने गहरी साँस ली।

उसने सामने दीवार पर टँगी सौम्या की तस्वीर की ओर देखा।

उसकी आँखों में गर्व भी था... दर्द भी... और एक अधूरा वादा भी।

धीरे से उसके होंठ हिले—

"आज समय आ गया है कि तुम अपनी माँ की पूरी कहानी जानो... उस माँ की कहानी... जिसने हारना कभी नहीं सीखा।"


                                  क्रमशः आगे ...

             ❤️  यह कहानी भी आपको पसंद आयेगी 



        
          💔  माँ ही बनी सौदागर  - यह कहानी एक ऐसी दुखियारी बेटी की है जिसके लिए उसकी अपनी मां ही सबसे बड़ी दुश्मन थी। जब मां की करतूतों का पता बेटी को चलता है तो क्या होता है ? जानने के लिए इस कहानी को एक बार जरूर पढ़िए।

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