बिंदिया और बबलू - अध्याय – 15 | सच की पहली दस्तक | प्रेम, परिवार और रहस्य की कहानी | हिंदी उपन्यास | किशोरवाणी |
👩❤️👩 बिंदिया और बबलू 👩❤️👩
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कभी-कभी आदमी जिस सच को दुनिया से छिपाता है, वही सच एक दिन उसके सामने आईना बनकर खड़ा हो जाता है।
रंजीत बबलू की असलियत जानने के लिए पटना तक जा पहुँचा था। उसे बबलू के पुराने कॉलेज और प्रमाणपत्रों से जुड़े कुछ ऐसे सुराग मिले थे, जिनसे उसके मन में विश्वास हो गया था कि अब बबलू ज्यादा दिन तक अपनी सच्चाई छिपा नहीं पाएगा।
मगर बबलू और बिंदिया ने अपनी समझदारी से रंजीत की कई चालों को नाकाम कर दिया।
इसी बीच रंजीत को एक ऐसा नाम पता चला, जो बबलू के नकली प्रमाणपत्रों की कहानी से जुड़ा था।
इधर रंजीत को लगने लगा था कि बबलू का सबसे बड़ा राज अब उसके हाथ लग गया है।
❤️ सच की पहली दस्तक
( अध्याय - 15 )
✍️ कुमार सरोज
सुबह की धूप अभी मंझार गांव की कच्ची गलियों तक पूरी तरह नहीं पहुंची थी। खेतों पर ओस की बूंदें चमक रही थीं और गांव के पुराने पीपल के नीचे बैठे बुजुर्ग रोज की तरह हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे।
लेकिन उस सुबह रंजीत के मन में कोई और ही हलचल थी।
पिछली रात शर्मा बाबू से हुई मुलाकात ने उसके मन को बेचैन कर दिया था। पहली बार उसे लगा था कि बबलू के बारे में जो कहानी वह अब तक सुनता आया था, उसमें कई पन्ने ऐसे हैं जिन्हें किसी ने जान-बूझकर फाड़ दिया है।
रंजीत के साथ दिनेश भी बैठा था।
“दिनेश, मुझे लगता है हमने बबलू को समझने में बहुत बड़ी गलती की है।”
दिनेश ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
“कल तक तो तुम कह रहे थे कि बबलू को गांव के सामने बेनकाब करके ही दम लोगे। आज अचानक उसके पक्ष में बोलने लगे?”
रंजीत कुछ देर चुप रहा।
“मैं उसके पक्ष में नहीं हूं। मैं सिर्फ सच के पक्ष में होना चाहता हूं।”
दिनेश हंस पड़ा।
“वाह रे रंजीत बाबू ! कल तक बबलू तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन था, आज सच तुम्हारा दोस्त हो गया ! ”
रंजीत ने उसकी ओर गंभीर नजरों से देखा।
“मजाक मत करो दिनेश। शर्मा बाबू ने जो बताया है, अगर वह सच है तो बबलू की कहानी वैसी नहीं है जैसी हम समझ रहे हैं।”
“तो फिर साफ-साफ बताओ, शर्मा बाबू ने क्या कहा?”
रंजीत ने धीरे से जेब में रखा कागज बाहर निकाला।
“उन्होंने कहा है कि बबलू के प्रमाणपत्रों की कहानी पटना से शुरू होती जरूर है, लेकिन उसका अंत कहीं और है।”
दिनेश की भौंहें सिकुड़ गईं।
“कहीं और मतलब?”
“यही तो पता करना है।”
इधर बिंदिया आंगन में बैठकर बच्चों को पढ़ा रही थी।
महेश अपनी कॉपी लेकर सबसे आगे बैठा था।
“भाभी, ई बताइए—‘ईमानदारी’ का मतलब का होता है। अगर आप सही जवाब दिए न तो हम आपको अंग्रेजी फार्म घुमाने के लिए ले चलेंगे आज ही ?”
बिंदिया मुस्कुराई।
“महेश, जब कोई आदमी मुश्किल में भी गलत रास्ता न चुने, उसे ईमानदारी कहते हैं।”
महेश ने तुरंत हाथ उठा दिया।
“भाभी, तब तो गांव में हमसे ज्यादा ईमानदार कोई नहीं है।”
बिंदिया हंस पड़ी।
“ऐसा क्यों?”
“काहे कि हमको गलत रास्ता पता ही नहीं है।”
पास बैठे बच्चे खिलखिला उठे।
तभी बबलू वहां आ गया।
“महेश, तुम्हारे अंदर एक गुण तो है।”
महेश ने गर्व से पूछा—
“कौन-सा भईया?”
“तुम अपनी बेवकूफी को भी आत्मविश्वास के साथ पेश करना जानते हो।”
पूरा आंगन हंसी से गूंज उठा।
बिंदिया ने मुस्कुराते हुए बबलू की ओर देखा।
“आज बहुत खुश दिखाई दे रहे हैं?”
बबलू का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
“खुश तो हूं... लेकिन लगता है कुछ पुरानी परछाइयां फिर हमारे पीछे चली आई हैं।”
बिंदिया समझ गई कि बात गंभीर है।
उसने बच्चों को पढ़ने के लिए कहा और बबलू को एक तरफ बुलाकर बोली—
“शर्मा बाबू?”
बबलू ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हें कैसे पता?”
“आपके चेहरे पर चिंता तभी आती है जब बात आपके अतीत से जुड़ी हो।”
बबलू कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
“रंजीत पटना गया था। वहां उसे शर्मा बाबू मिले हैं। अब वह मेरे प्रमाणपत्रों के पीछे पड़ा है।”
बिंदिया ने शांत स्वर में पूछा—
“और आपको डर किस बात का है?”
बबलू ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
“डर प्रमाणपत्रों के सामने आने का नहीं है, बिंदिया। डर इस बात का है कि अगर मेरे अतीत का पूरा सच सामने आया, तो लोग मेरे आज को भी उसी नजर से देखने लगेंगे।”
बिंदिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“जो आदमी अपने अतीत से भागता है, वह कमजोर होता है। लेकिन जो उसका सामना करता है, वही मजबूत होता है।”
बबलू हल्का-सा मुस्कुराया।
“इसीलिए तो तुम मेरे साथ हो।”
उसी दिन दोपहर में फिर से रंजीत पटना जाने की तैयारी करने लगा।
दिनेश ने पूछा—
“अब क्या करने वाले हो?”
“इस बार कोई अधूरा सबूत नहीं चाहिए। मुझे ऐसा प्रमाण चाहिए जिसे बबलू चाहकर भी झुठला न सके।”
“और वह मिलेगा कहां?”
रंजीत ने धीरे से कहा—
“शर्मा बाबू के पुराने कार्यालय में।”
दिनेश चौंक गया।
“लेकिन वहां तो पुराने रिकॉर्ड ही होंगे।”
“वही रिकॉर्ड हमारे काम आएंगे।”
रंजीत की आंखों में फिर वही पुरानी चमक लौट आई थी।
लेकिन इस बार उसके भीतर केवल बदले की आग नहीं थी। वह खुद भी जानना चाहता था कि बबलू आखिर कौन था।
पटने शहर के पुराने हिस्से में एक छोटी-सी इमारत थी। दीवारों पर चूना उखड़ चुका था और लकड़ी का दरवाजा समय की मार से काला पड़ गया था।
शर्मा बाबू वहीं बैठे पुराने कागजों को व्यवस्थित कर रहे थे।
रंजीत को देखते ही उन्होंने चश्मा उतार दिया।
“तुम फिर आ गए?”
“जी। मुझे कुछ जानना है।”
“क्या?”
“बबलू के प्रमाणपत्रों के बारे में।”
शर्मा बाबू कुछ देर उसे देखते रहे।
फिर बोले—
“तुम्हें प्रमाणपत्र चाहिए या सच?”
रंजीत चुप हो गया।
“दोनों में फर्क है, बेटा।”
“मैं सच जानना चाहता हूं।”
शर्मा बाबू ने एक पुरानी फाइल निकाली।
फाइल पर धूल की मोटी परत जमी थी।
उन्होंने उसे मेज पर रखा।
“यह फाइल तुम्हें बबलू के बारे में वह बताएगी, जो तुमने कभी सोचा भी नहीं होगा।”
रंजीत ने कांपते हाथों से फाइल खोली।
कुछ पुराने कागज थे।
कुछ आवेदन।
कुछ रसीदें।
और सबसे नीचे एक पुराना फोटो।
रंजीत ने फोटो उठाया।
उसमें बबलू जैसा दिखने वाला एक युवक किसी गरीब बच्चों के समूह के बीच खड़ा था।
रंजीत के चेहरे का रंग बदल गया।
“यह... बबलू है?”
शर्मा बाबू ने धीरे से कहा—
“हां।”
“लेकिन यह तो बहुत पुराना है।”
“बहुत पुराना।”
“यहां वह बच्चों के साथ क्या कर रहा था?”
शर्मा बाबू ने उत्तर नहीं दिया।
उन्होंने एक और कागज उसकी ओर बढ़ा दिया।
उस पर लिखा था—
“ग्रामीण शिक्षा अभियान—स्वैच्छिक शिक्षक।”
रंजीत कुछ समझ नहीं पा रहा था।
“इसका बबलू के प्रमाणपत्रों से क्या संबंध है?”
शर्मा बाबू बोले—
“यही तो कहानी है।”
रंजीत बेचैन होकर बोला—
“आप साफ-साफ क्यों नहीं बताते?”
शर्मा बाबू ने गहरी सांस ली।
“क्योंकि बबलू ने अपने बारे में बहुत कुछ छिपाया है। लेकिन उसने जो छिपाया है, उसमें केवल झूठ नहीं है।”
रंजीत ने चौंककर पूछा—
“तो क्या उसके प्रमाणपत्र असली हैं?”
शर्मा बाबू ने सीधे जवाब देने के बजाय कहा—
“कुछ कागज ऐसे हैं जिनकी कहानी अलग है।”
“कौन-से?”
शर्मा बाबू ने फाइल का आखिरी हिस्सा खोला।
वहां एक पुराना नाम लिखा था।
रंजीत ने पढ़ा—
“अमित...”
वह रुक गया।
“यह कौन है?”
शर्मा बाबू की आंखों में अचानक चिंता दिखाई दी।
“जिसका नाम तुमने अभी पढ़ा है, उसी नाम से बबलू की जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य जुड़ा हुआ है।”
रंजीत कुछ कह पाता, उससे पहले बाहर से किसी ने दरवाजा खटखटाया।
तीनों की नजरें दरवाजे की ओर उठ गईं।
शर्मा बाबू का चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।
“इस समय यहां कौन आ गया?”
दरवाजा फिर खटखटाया गया।
इस बार आवाज थोड़ी तेज थी।
रंजीत ने धीरे से पूछा—
“कौन है?”
बाहर से कोई उत्तर नहीं आया।
शर्मा बाबू ने फाइल तुरंत बंद कर दी।
“रंजीत, यह फाइल अभी अपने साथ मत ले जाना।”
“क्यों?”
“क्योंकि अब सिर्फ तुम्हें ही नहीं, मुझे भी खतरा है।”
रंजीत स्तब्ध रह गया।
बबलू अपने घर के बाहर चारपाई पर बैठा आसमान की ओर देख रहा था।
बिंदिया उसके पास आकर बैठ गई।
“क्या सोच रहे हैं?”
बबलू ने धीमे स्वर में कहा—
“सोच रहा हूं कि आदमी कितना भी अपने अतीत से दूर भागे, एक दिन अतीत उसके दरवाजे पर दस्तक जरूर देता है।”
बिंदिया ने पूछा—
“अगर वह दस्तक कल फिर हुई तो?”
बबलू मुस्कुराया।
“तो इस बार दरवाजा मैं खुद खोलूंगा।”
बिंदिया ने उसका हाथ थाम लिया।
“और अगर सच बहुत बड़ा हुआ?”
बबलू ने उसकी ओर देखा।
“तो उसे भी उतना ही बड़ा बनाकर स्वीकार करेंगे।”
दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज सुनाई दी।
उसी समय गांव की पगडंडी पर एक आदमी तेजी से बबलू के घर की ओर आता दिखाई दिया।
उसके हाथ में एक पुराना लिफाफा था।
वह दरवाजे तक पहुंचा और रुक गया।
कुछ पल तक बबलू को देखता रहा।
फिर बोला—
“बबलू... क्या तुमने मुझे पहचान लिया?”
बबलू के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
वह उठकर खड़ा हो गया।
“तुम?”
बिंदिया भी खड़ी हो गई।
आने वाले व्यक्ति ने धीरे से कहा—
“बारह साल बाद आया हूं... तुम्हारा पुराना राज लेकर।”
बबलू की आंखें कुछ पल के लिए स्थिर हो गईं।
उसने बिंदिया की ओर देखा।
और पहली बार उसके चेहरे पर ऐसा भय दिखाई दिया, जिसे देखकर बिंदिया भी घबरा उठी।
“तुम यहां क्यों आए हो?”
वह आदमी बोला—
“क्योंकि अब तुम्हारे पास सच बताने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।”
और उसने वह पुराना लिफाफा बबलू की ओर बढ़ा दिया।
बबलू ने लिफाफा हाथ में लिया।
लिफाफे पर सिर्फ एक नाम लिखा था—
“अमित”
बबलू की उंगलियां कांप उठीं।
बिंदिया ने उसकी ओर देखा।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि जिस अतीत को बबलू अब तक अपनी मुस्कान के पीछे छिपाए हुए था, वह अतीत अब उनके दरवाजे पर आ चुका था।
क्रमशः आगे...
❤️ अगले अध्याय में पढ़िए—
अमित कौन है और उसका बबलू के अतीत से क्या संबंध है?
पुराने लिफाफे में ऐसा क्या है, जिसे देखकर बबलू के पैरों तले जमीन खिसक जाती है?
क्या रंजीत को आखिर वह सबूत मिल जाएगा, जिसकी उसे वर्षों से तलाश है?
और क्या बिंदिया पहली बार बबलू के उस सच को जान पाएगी, जिसे उसने अपनी पत्नी से भी छिपाकर रखा है?
अगला अध्याय बबलू के अतीत का सबसे बड़ा दरवाजा खोलने वाला है।
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