बिंदिया और बबलू - अध्याय -12 | अंगूठे का निशान | रहस्य और रोमांच से भरी हिंदी उपन्यास / bindiya-aur-bablu-chapter-12
👩❤️👩 बिंदिया और बबलू 👩❤️👩
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रंजीत पटना जाकर बबलू के अतीत की परतें खंगाल आया, पर हर बार की तरह बबलू अपनी सूझ-बूझ और बिंदिया की समझदारी से बच निकला। गाँव में बिंदिया की रात्रि पाठशाला की धूम मची हुई है और लोग अब बबलू को गाँव का मसीहा मानने लगे हैं। लेकिन रंजीत हार मानने वालों में नहीं है। उसे अब भी विश्वास है कि एक न एक दिन बबलू का असली चेहरा पूरे गाँव के सामने आकर रहेगा।
अंगूठे का निशान
( अध्याय - 12 )
✍️ कुमार सरोज
सुबह की सुनहरी धूप मंझार गाँव की कच्ची गलियों पर ऐसे बिखरी थी, मानो धरती ने सोने की चादर ओढ़ ली हो।
रात्रि की वर्षा के कारण मिट्टी से उठती सोंधी महक पूरे वातावरण को मदहोश कर रही थी।
पुस्तकालय के बरामदे में बच्चे अपनी-अपनी तख्तियाँ लेकर बैठ चुके थे।
बिंदिया सबको वर्णमाला लिखवा रही थी।
महेश अपनी तख्ती पर "क" लिखते-लिखते फिर "ख" बना देता।
सारा बरामदा हँसी से गूँज उठा।
बिंदिया मुस्कुराकर बोली—
"देवर जी, 'क' और 'ख' में भी दुश्मनी करवा देंगे क्या?"
महेश सिर खुजलाते हुए बोला—
"भाभी, ई दोनों अक्षर खुदे झगड़ालू हैं। हम तो बीच-बचाव कर रहे थे।"
सारे बच्चे ठहाका मारकर हँस पड़े।
तभी योगेश हाथ में फूलों की माला लेकर वहां आता है।
"भाभी, कल हम टेकारी के अंग्रेजी फार्म में कब्बडी का मैच खेलने गए थे और जीत गए तो सोचे आपके लिए आज फूल लेकर चलते हैं।
" ये अंग्रेजी फार्म कहां है? "
" भाभी आप नहीं जानती हैं! टेकारी नरेश के किला के पास बहुत बड़ा अंग्रेजों का हवेली है उसे ही अंग्रेजी फार्म करते हैं।"
महेश तुरंत बीच में कूद पड़ा—
" भाभी इसको कम मालूम है। वहां डर से ये जाता नहीं है। झूठ बोल रहा है। अंग्रेजी फार्म में भूत रहता है। "
सुनकर पूरा बरामदा फिर ठहाकों से गूँज उठा।
उधर रंजीत अपने घर के बरामदे में चुपचाप बैठा था। उसके सामने पटना से लाया हुआ एक पुराना फाइल रखा था।
दिनेश धीरे से बोला—
"कुछ मिला?"
रंजीत ने जेब से एक पीला पड़ा कागज़ निकाला।
"मिला है बहुत बड़ा हथियार।"
दिनेश की आँखें फैल गईं।
"का है ई?"
रंजीत मुस्कुराया।
"पटना कॉलेज का पुराना दाख़िला रजिस्टर... इसमें बबलू के अंगूठे का निशान लगा है। हस्ताक्षर नहीं।"
दिनेश उछल पड़ा।
"अब बचकर कहाँ जाएगा!"
रंजीत ने धीमे स्वर में कहा—
"अभी नहीं पहले पूरा जाल बिछाना होगा।"
उसी समय सरपंच का नौकर दौड़ता हुआ वहां आया।
"रंजीत भईया... कल प्रखंड कार्यालय से बड़े साहब आने वाले हैं। गाँव की रात्रि पाठशाला देखने।"
रंजीत की आँखों में चमक दौड़ गई।
वह धीरे से बोला—
"बस भगवान ने खुद मौका भेज दिया।"
शाम को बबलू खेत की मेड़ पर बैठा डूबते सूरज को देख रहा था।
बिंदिया उसके पास आकर बैठ गई।
कुछ देर दोनों चुप रहे।
फिर बिंदिया बोली—
"एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"कब तक ऐसे डर-डरकर जीते रहेंगे?"
बबलू ने गहरी साँस ली।
"जिस दिन सच खुद मेरे मुँह से गाँव सुनेगा उस दिन मुझे किसी से डर नहीं रहेगा।"
बिंदिया ने पहली बार उसके चेहरे पर थकान देखी।
वह धीरे से बोली—
"अगर वह दिन आ गया... तब?"
बबलू मुस्कुराया।
"तब फैसला गाँव करेगा। लेकिन उससे पहले मैं खुद को बदल देना चाहता हूँ।"
बिंदिया ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया।
"मैं तुम्हारे साथ हूँ, चाहे जो हो।"
दोनों चुपचाप डूबते सूरज को देखते रहे।
दूर मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं।
लेकिन उसी समय दूर खड़ा रंजीत उन दोनों को देख रहा था।
उसकी मुट्ठी में वही पुराना कागज़ था— बबलू के अंगूठे का निशान।
उसने मन ही मन कहा—
"अब खेल बराबरी का होगा, बबलू। इस बार बचना आसान नहीं।"
अगले दिन सुबह मंझार गाँव में किसी मेले जैसा माहौल था।
पुस्तकालय के सामने रंगोली बनी थी। स्कूल के बच्चे हाथों में फूल लिए खड़े थे। गाँव की औरतें साफ़-सुथरी साड़ी पहनकर आई थीं। सरपंच साहब बार-बार घड़ी देख रहे थे।
आज प्रखंड से बीडीओ साहब और प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी रात्रि पाठशाला का निरीक्षण करने आने वाले थे।
दूसरी ओर रंजीत के चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी।
उसने दिनेश से धीरे से कहा—
"आज नहीं बच पाएगा बबलू। सरकारी अफसरों के सामने सच्चाई छिपती नहीं।"
दिनेश भी मुस्कराया—
"आज तो मजा आएगा।"
थोड़ी देर बाद सफेद बोलेरो पुस्तकालय के सामने आकर रुकी।
सरपंच साहब ने आगे बढ़कर अधिकारियों का स्वागत किया।
बच्चों ने फूल भेंट किए।
बिंदिया ने विनम्रता से नमस्कार किया।
बबलू भी मुस्कुराते हुए सबसे हाथ जोड़कर मिला।
प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी चारों ओर देखकर बोले—
" गाँव में इतनी अच्छी पहल, सचमुच प्रशंसनीय है।"
सरपंच गर्व से बोले—
"सब बबलू और उसकी पत्नी की मेहनत है, साहब।"
गाँव वाले तालियाँ बजाने लगे।
इधर रंजीत के चेहरे पर बेचैनी बढ़ती जा रही थी।
निरीक्षण शुरू हुआ।
बच्चे पढ़ रहे थे।
बिंदिया महिलाओं को लिखना सिखा रही थी।
महेश बड़ी मेहनत से स्लेट पर अपना नाम लिख रहा था।
योगेश अब भी "योगेश" लिखते-लिखते "योगेस" लिख देता था।
सुजीत हँसकर बोला—
"अरे डेकोरेटर बाबू, अपना नाम भी आधा लिखोगे क्या?"
महेश तुरंत बोला—
"भाभी, ई आदमी शादी के पहले ही अपना नाम छोटा कर रहा है, शादी के बाद पता नहीं खुद कहाँ गायब हो जाएगा!"
पूरा पुस्तकालय हँसी से गूँज उठा।
तभी रंजीत आगे आया।
उसने बड़ी मासूमियत से कहा—
"साहब, एक सुझाव है।"
शिक्षा पदाधिकारी बोले—
"हाँ, बताइए।"
रंजीत बोला—
"हमारे गाँव के सबसे बड़े विद्वान तो बबलू भईया हैं। अगर ये ब्लैकबोर्ड पर दो-चार लाइन अंग्रेज़ी में लिख दें, तो बच्चों का उत्साह और बढ़ जाएगा।"
भीड़ एकदम शांत हो गई।
सभी की नज़र बबलू पर टिक गई।
सरपंच भी मुस्कुराकर बोले—
"हाँ बेटा, लिख दो।"
बिंदिया का चेहरा पल भर को फीका पड़ गया।
उसे समझ में आ गया कि यह सीधी चुनौती नहीं, सोची-समझी चाल है।
बबलू ने एक पल के लिए रंजीत की ओर देखा।
फिर मुस्कुराया।
"बहुत अच्छा सुझाव है।"
वह ब्लैकबोर्ड के पास पहुँचा।
सबकी साँसें थम गईं।
रंजीत की आँखों में जीत चमक रही थी।
लेकिन तभी बबलू ने चॉक नीचे रख दिया।
सब हैरान रह गए।
वह शिक्षा पदाधिकारी की ओर मुड़ा और बोला—
"सर, अगर अनुमति हो तो मैं एक बात कहूँ?"
"कहिए।"
बबलू शांत स्वर में बोला—
"इस रात्रि पाठशाला का उद्देश्य किसी की विद्वता दिखाना नहीं, बल्कि गाँव से अशिक्षा मिटाना है। यहाँ शिक्षक बनने का श्रेय मेरी पत्नी बिंदिया को जाता है। मैं चाहता हूँ कि आज बच्चों के सामने वही लिखें, ताकि बेटियाँ और बहुएँ समझें कि शिक्षा ही उनका सबसे बड़ा सम्मान है।"
पूरा हाल तालियों से गूँज उठा।
अधिकारी प्रभावित हो गए।
शिक्षा पदाधिकारी बोले—
"बहुत सुंदर विचार ! सचमुच समाज को ऐसे सोच की ज़रूरत है।"
बिंदिया बोर्ड के सामने पहुँची।
उसने सुंदर अक्षरों में लिखा—
"Knowledge is the light that removes darkness."
फिर नीचे उसका हिन्दी अर्थ भी लिख दिया—
"ज्ञान वह प्रकाश है जो अज्ञान का अंधकार दूर करता है।"
बच्चे तालियाँ बजाने लगे।
अधिकारी भी मुस्कुरा उठे।
रंजीत की चाल एक बार फिर उलटी पड़ चुकी थी।
उसने मन ही मन दाँत पीसे।
"हर बार बच जाता है। "
कार्यक्रम समाप्त होने लगा।
तभी शिक्षा पदाधिकारी ने बबलू के कंधे पर हाथ रखकर कहा—
"अगले महीने पूरे प्रखंड के शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बैठक है। वहाँ आपको भी अपने विचार रखने होंगे।"
यह सुनते ही रंजीत के चेहरे पर फिर मुस्कान लौट आई।
वह मन ही मन बोला—
"अब देखता हूँ... वहाँ कैसे बचते हो बबलू। पूरे प्रखंड के सामने खेल होगा।"
दूर खड़ी बिंदिया ने रंजीत की आँखों की चमक पढ़ ली थी। उसे एहसास हो गया, तूफ़ान अभी टला नहीं है, बस अपनी दिशा बदल रहा है।
सूरज ढल चुका था। पुस्तकालय के बाहर की भीड़ धीरे-धीरे अपने-अपने घर लौट रही थी। लेकिन आज भी लोगों की जुबान पर सिर्फ़ एक ही नाम था—बबलू।
कोई उसकी दूरदर्शिता की तारीफ कर रहा था, तो कोई बिंदिया की पढ़ाई की।
लेकिन एक आदमी ऐसा भी था, जिसकी आँखों में तारीफ नहीं, आग जल रही थी।
वह था—रंजीत।
रंजीत अपने घर पहुँचते ही दरवाज़ा जोर से बंद कर देता है। दिनेश, मदन और उसके बाकी साथी पहले से ही उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
दिनेश धीरे से पूछता है—
"का हुआ? आज फिर बात बिगड़ गई?"
रंजीत कुर्सी पर बैठते हुए गहरी साँस लेता है।
"बिगड़ी नहीं... बिगाड़ी गई है। बबलू हर बार आख़िरी चाल चल देता है।"
मदन बोला—
"अब का करेंगे भईया?"
रंजीत अपनी जेब से वही पुराना कागज़ निकालता है।
"यही करेगा हमारा काम।"
दिनेश कागज़ देखते हुए बोला—
"लेकिन गाँव वाले इसको समझेंगे कैसे?"
रंजीत मुस्कुराया।
"गाँव वाले नहीं समझेंगे... कानून समझेगा।"
सब चौंक पड़े।
उधर बबलू अपने घर के बरामदे में चुपचाप बैठा था।
बिंदिया चाय लेकर आई।
आज पहली बार उसने देखा कि बबलू के चेहरे पर मुस्कान कम और चिंता ज्यादा थी।
वह धीरे से बोली—
"क्या सोच रहे हैं?"
बबलू दूर अँधेरे में देखते हुए बोला—
"झूठ जितना पुराना होता जाता है, उतना ही भारी होता जाता है।"
बिंदिया चुप रही।
कुछ क्षण बाद उसने धीमे स्वर में पूछा—
"अगर एक दिन सबको सच्चाई पता चल गई तो?"
बबलू मुस्कुरा दिया।
"जिस दिन गाँव मेरे झूठ से ज़्यादा मेरे काम को याद रखेगा। उसी दिन सच बताने से डर नहीं लगेगा।"
बिंदिया की आँखें भर आईं।
वह बोली—
"मुझे तुम पर गर्व है... क्योंकि तुम बदल चुके हो।"
कुछ सोचती हुई बिंदिया फिर बोली -
" टेकारी किला के पास कोई अंग्रेजी फार्म भी है क्या? "
" हां है। क्यों? "
" तूने कभी बताया नहीं। टेकारी किला का नाम तो मैं सुनी थी । "
" अंग्रेजों ने बहुत सारे किसानों की जमीन लेकर अपने ऐशो आराम के लिए एक बहुत बड़ा फार्म हाऊस टेकारी किला के बगल में ही बनाया था। लोग कहते हैं कि अपने गांव के बहुत सारे किसानों का भी जमीन उसमें है। पहले वहां पूरा एक गांव ही बसा हुआ था। मगर सबको अंग्रेज भगा कर वहां अपना फार्म हाऊस बना लिया । अब अंग्रेज तो चले गये मगर उनका फार्म हाऊस आज भी डरावनी खंडहर बनकर टिका हुआ है। उसे ही अब लोग अंग्रेजी फार्म कहते हैं। "
" मुझे भी अंग्रेजी फार्म अब देखने का मन करने लगा ....... । "
ठीक तभी बाहर से चिल्लाता हुआ महेश वहां आ गया —
"बबलू भईया... बबलू भईया...। "
महेश हाँफता हुआ अंदर घुसा।
"भईया... बड़ी खबर है!"
बबलू उठ खड़ा हुआ।
"क्या हुआ?"
महेश एक साँस में बोला—
"रंजीत कल सुबह जिला मुख्यालय जाने वाला है। सुन रहे हैं। डीएम साहब को आपके बारे में शिकायत करेगा।"
बिंदिया के हाथ से चाय का गिलास छूटते-छूटते बचा।
कुछ देर के लिए पूरा घर शांत हो गया।
बाहर सिर्फ़ झींगुरों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
महेश घबराकर बोला—
"भईया... अब का होगा ?"
बबलू ने मुस्कुराकर उसके कंधे पर हाथ रखा।
"जिसने कोई काम नहीं किया, वही शिकायत से डरता है। हम गाँव के लिए जो कर रहे हैं, वही हमारा सबसे बड़ा जवाब है।"
दूसरी ओर रंजीत रात के अँधेरे में अपने कमरे में बैठा था।
उसने पटना से लाया हुआ फाइल खोला।
अचानक उसके हाथ एक और पुराना कागज़ लगा।
वह ध्यान से पढ़ने लगा।
कुछ ही क्षण बाद उसकी आँखें फैल गईं।
"अरे...!"
उसके होंठ काँप उठे।
दिनेश दौड़कर आया।
"का हुआ?"
रंजीत ने काँपती आवाज़ में कहा—
"हम तो अब तक गलत आदमी के पीछे पड़े थे। "
दिनेश घबरा गया।
"मतलब?"
रंजीत ने फाइल उसकी ओर बढ़ा दी।
"बबलू के नकली सर्टिफिकेट बनाने वाला कोई और था और वह आदमी अभी भी जिंदा है।"
दिनेश सुनकर अवाक् रह गया।
" हमें कल फिर पटना जाना होगा। "
कुछ सोचते हुए रंजित धीरे से बोला।
और अगले दिन रंजित पटना पहुंच जाता है।
पटना शहर। एक पुरानी गली। एक जर्जर मकान। मकान के एक कमरे में एक अधेड़ उम्र का आदमी पुराने टाइपराइटर पर कुछ टाइप कर रहा था। दीवार पर दर्जनों नकली प्रमाणपत्रों के नमूने टंगे थे।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
उस आदमी ने दरवाज़ा खोला।
सामने रंजीत खड़ा था।
रंजीत ने धीरे से पूछा—
"आप ही... शर्मा बाबू हैं?"
वह आदमी मुस्कुराया।
"हाँ... लेकिन तुम कौन हो ?"
रंजीत ने जेब से बबलू की पुरानी फोटो निकाली।
फोटो देखते ही उस आदमी के चेहरे का रंग उड़ गया।
उसने घबराकर कहा—
"इस लड़के का नाम ! फिर से किसने लिया?"
शर्मा जी की बातें सुनकर रंजित के आँखों में विजय की चमक दौड़ गई। उसे पहली बार लगा, अब वह बबलू के सबसे बड़े रहस्य के दरवाज़े तक पहुँच चुका है।
क्रमशः आगे ...
अगले अध्याय में...
आखिर शर्मा बाबू कौन हैं?
बबलू के नकली प्रमाणपत्रों के पीछे का असली मास्टरमाइंड कौन निकलेगा?
क्या रंजीत पहली बार ऐसा सबूत हासिल कर लेगा, जिससे बबलू सचमुच फँस जाएगा?
या फिर बबलू की ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच कहानी को बिल्कुल नई दिशा दे देगा ?
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