बिंदिया और बबलू - अध्याय 11 | अतीत की परछाइयाँ | क्या खुल जाएगा बबलू का सबसे बड़ा राज / bindiya-aur-bablu-chapter-11






             👩‍❤️‍👩  बिंदिया और बबलू  👩‍❤️‍👩



                   📖   अभी तक आपने पढ़ा...



                 बबलू के अनपढ़ होने का शक रंजीत के मन में लगातार बढ़ता जा रहा है। वह कई बार गाँव में उसकी पोल खोलने की कोशिश कर चुका है, लेकिन हर बार बबलू अपनी हाजिरजवाबी और बिंदिया की समझदारी से बच निकलता है। अब रंजीत ने निश्चय कर लिया है कि वह पटना जाकर बबलू के अतीत की हर परत उधेड़ेगा।






         
           ❤️  अतीत की परछाइयाँ

                  ( अध्याय 11 ) 

                                           ✍️  किशोर 
  


                   सुबह की पहली किरण अभी धरती पर पूरी तरह नहीं उतरी थी। दरधा नदी के ऊपर हल्की धुंध तैर रही थी। चिड़ियों का कलरव खेतों में गूँज रहा था।

            लेकिन उस सुबह रंजीत के चेहरे पर किसी नई लड़ाई का जोश था। उसने जल्दी-जल्दी नहाकर सफेद कमीज़ पहनी, बालों में तेल लगाया और अपनी मोटरसाइकिल बाहर निकालने लगा।

उसे देखते ही उसकी माँ बोली—

"का हो बेटा, आज बड़ा बन-ठन के कहाँ जाताड़ ?"

रंजीत मुस्कुराया।

"अम्मा, आज एक जरूरी काम से पटना जा रहे हैं। शाम तक लौट आएँगे।"

बरामदे में बैठा दिनेश बीड़ी सुलगाते हुए हँसा—

"आज लौटेगा नहीं... आज किसी का भाग्य लौटेगा।"

मदन ने उत्सुकता से पूछा—

"मतलब ?"

दिनेश ने धीरे से कहा—

"आज बबलू के राज का पहला ताला टूटेगा।"

रंजीत की आँखों में चमक आ गई।

"आज पता लगाकर ही लौटूँगा कि बबलू सचमुच पढ़ा-लिखा है, या गाँव को बरसों से बेवकूफ बना रहा है।"

इतना कहकर वह मोटरसाइकिल स्टार्ट कर पटना की ओर निकल पड़ा।


      उधर मंझार गाँव में बिंदिया आँगन में तुलसी पर जल चढ़ा रही थी।

बबलू चारपाई पर बैठा चाय पी रहा था।

अचानक बिंदिया बोली—

"सुनिए, आज सुबह से न जाने क्यों मन घबरा रहा है।"

बबलू मुस्कुराया।

"घबराहट तब होती है जब सामने वाला चालाक हो। रंजीत चालाक नहीं सिर्फ ज़िद्दी है।"

"अगर वह सचमुच पटना चला गया तो ?"

बबलू ने चाय का कुल्हड़ नीचे रखा।

" जाएगा...। "

बिंदिया चौंक गई।

"आपको कैसे मालूम?"

बबलू हँस पड़ा।

"क्योंकि मैं भी कभी उसकी उम्र का था। जब आदमी हार जाता है, तो अतीत खोदना शुरू करता है।"

बिंदिया कुछ देर तक उसे देखती रही।

"आपको डर नहीं लगता?"

बबलू ने मुस्कुराकर कहा—

"डर उसे लगता है जिसके पास सोच खत्म हो जाए।"


            इधर दोपहर तक रंजीत पटना शहर पहुँच गया। ऊँची-ऊँची इमारतें... भागती गाड़ियाँ ... भीड़...। उसे पहली बार महसूस हुआ कि गाँव और शहर दो अलग दुनिया हैं।

          रंजीत ने सबसे पहले उस कॉलेज का पता लगाया जहाँ से बबलू ने पढ़ाई करने का दावा किया था।

               जब वह कॉलेज पहुंचा तो वहां देखा चौकीदार बरामदे में बैठा अख़बार पढ़ रहा है।

रंजीत ने विनम्रता से पूछा—

"काका, एक बात पूछनी थी। यहाँ बबलू सिंह नाम का लड़का पढ़ता था ? "

बूढ़ा कुछ देर सोचता रहा।

फिर बोला—

"बबलू सिंह...? अरे वही लंबा-सा लड़का... जो हर किसी से दोस्ती कर लेता था?"

रंजीत का दिल धड़क उठा।

"हाँ... वही!"

चौकीदार हँसा।

"पढ़ाई कम... बात ज़्यादा करता था। मास्टर लोग भी उसका नाम जानते थे।"

रंजीत की आँखों में चमक आ गई।

"मतलब कुछ तो गड़बड़ है। "


     चौकीदार से मिलने के बाद रंजित ने कॉलेज के पुराने बाबू से मिलने की कोशिश की। वो मिल तो गए मगर बिना दान दक्षिणा के अपना मुँह नहीं खोले।रंजित को कुछ रुपये चाय-पानी के नाम पर देने पड़े।

     पैसा मिलते ही कॉलेज के बाबू धीरे से एक पुरानी रजिस्टर निकाल लाया।

रंजीत खुद ही रजिस्टर के पन्ने पलटने लगा।

अचानक उसकी नज़र एक नाम पर टिक गई—

"बबलू सिंह...। "

नाम दर्ज था। लेकिन मार्कशीट की प्रविष्टि अधूरी थी।

रंजीत के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।

"मिल गया...। "

       रंजित कॉलेज से निकलकर तुरंत पास के साइबर कैफ़े पहुँचा। वहाँ उसने प्रमाणपत्र की ऑनलाइन जानकारी निकलवाने की कोशिश की।

कंप्यूटर वाले लड़के ने कहा—

"भैया, यह रिकॉर्ड मैच नहीं कर रहा। कुछ गड़बड़ लग रही है।"

रंजीत खुशी से उछल पड़ा।

"यानी... सर्टिफिकेट नकली हो सकता है?"

लड़का बोला—

"हो सकता है... लेकिन पक्का बोलने के लिए बोर्ड से सत्यापन कराना पड़ेगा।"

रंजीत ने तुरंत आवेदन की रसीद निकलवा ली।

उसके चेहरे पर विजयी मुस्कान थी।

"अब बचकर कहाँ जाएगा बबलू...। "







          उधर मंझार गांव में उसी समय बबलू के मोबाइल पर एक संदेश आया।

वह पढ़कर मुस्कुराया।

बिंदिया ने पूछा—

"क्या हुआ?"

बबलू बोला—

"जाल फेंक दिया गया है।"

"किसने ?"

"रंजीत ने।"

बिंदिया घबरा गई—

"अब?"

बबलू ने जेब से दूसरा मोबाइल निकाला।

एक नंबर मिलाया।

"हैलो शर्मा जी... नमस्कार। एक छोटा-सा काम था...। "

कुछ देर तक उसकी धीमी आवाज़ सुनाई देती रही।

फोन रखते ही उसने गहरी साँस ली।

"अब खेल बराबरी का होगा।"


        रंजीत खुशी-खुशी गाँव लौट रहा था। उसे विश्वास था कि अब बबलू ज़्यादा दिन नहीं बचेगा।

       लेकिन उसी समय पटना के शिक्षा बोर्ड कार्यालय में एक कर्मचारी सत्यापन के लिए आई फाइल खोलता है। फाइल के ऊपर पहले से ही एक नया सत्यापन-पत्र रखा हुआ था। उस पर आधिकारिक मुहर लगी थी। कर्मचारी बिना कुछ सोचे वही कागज़ आगे बढ़ा देता है।

उसे क्या मालूम यह पूरा खेल किसी और ने उससे पहले ही बिछा दिया था।



       अब शाम हो चली थी। मंझार गाँव में बबलू आँगन में बैठा आसमान की ओर देख रहा था।

बिंदिया ने धीरे से पूछा—

"आप हर बार बच कैसे जाते हैं?"

बबलू मुस्कराया।

  "बिंदिया... लोग समझते हैं कि लड़ाई ताकत से जीती जाती है। लेकिन असली लड़ाई हमेशा दिमाग जीतता है।"

पास जल रहे दीये की लौ हवा में हल्की-सी काँपी और उसी काँपती रोशनी में बबलू के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान फैल गई।




                            क्रमशः आगे .........




       📖 अगले अध्याय में पढ़िए...


         क्या शिक्षा बोर्ड से आई रिपोर्ट रंजीत के हाथ लगेगी ?

    बबलू का "शर्मा जी" कौन है, जो हर बार उसे बचा लेता है ?

      क्या बिंदिया पहली बार बबलू के अतीत का सबसे बड़ा राज जानेगी ?

       या रंजीत की अगली चाल पूरे गाँव को हिला देगी ?


         📖💌📖    बिंदिया और बबलू  उपन्यास के यदि आपने अभी तक पीछे का अध्याय नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। ग्रामीण परिवेश की बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली कहानी है। कहानी पढ़ते समय आपको लगेगा कि यह मेरे ही आस पास की ही घटित घटना है। 

            पीछे के अध्याय को पढ़ने के लिए नीचे लिखे उपन्यास के शीर्षक पर क्लिक कीजिए - 





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