भूख का मुकदमा – बच्चों के लिए बचे हुए बिस्कुट घर लाया, अगले दिन नौकरी से निकाल दिया गया / bhookh-ka-mukadma-true-emotional-hindi-story
क्या कानून भूख और मजबूरी के आँसू समझ पाता है ?
आज की कहानी एक ऐसे गरीब चपरासी की है, जिसने अपने बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश की, लेकिन बदले में उसे अपनी नौकरी, अपना सम्मान और अपने परिवार का भविष्य दाँव पर लगाना पड़ा।
यह कहानी सिर्फ़ एक इंसान की नहीं, बल्कि उस समाज का आईना है जहाँ कभी-कभी भूख कटघरे में खड़ी होती है और इंसानियत गवाही देने से डर जाती है।
भूख का मुकदमा
✍️ किशोर
भोपाल शहर की भीड़-भाड़ से दूर, एक तंग गली में किराए का एक छोटा-सा कमरा था। उसी कमरे में रहती थी सुरेश की पूरी दुनिया—पत्नी शीला, दस साल का बेटा रोहन और सात साल की बेटी शुभि।
सुरेश सरकारी कार्यालय में चपरासी था। तनख्वाह इतनी कम थी कि महीने की पहली तारीख को मिलने वाला वेतन बीस तारीख आते-आते हाँफने लगता था। लेकिन उसकी उम्मीदें कभी नहीं थकती थीं।
वह अक्सर अपनी पत्नी से कहा करता था—
" शीला, हमारे हिस्से में चाहे कितनी भी तकलीफ़ें आएँ, लेकिन रोहन और शुभि की पढ़ाई कभी नहीं रुकनी चाहिए। जिस दिन ये दोनों अपने पैरों पर खड़े हो जाएँगे, उसी दिन हमारी सारी गरीबी हार जाएगी।"
शीला मुस्कुराने की कोशिश करती, मगर उसकी आँखों में छिपी चिंता साफ़ दिखाई देती।
" मैं भी यही चाहती हूँ जी... लेकिन घर का खर्च कैसे चले ? कभी दूध नहीं होता, कभी दाल नहीं होती। "
सुरेश हल्की मुस्कान के साथ कहता—
" हम दोनों एक वक्त कम खा लेंगे... पर बच्चों के सपनों में कमी नहीं आने देंगे। "
यही उनका जीवन था।
रोहन और शुभि कभी-कभी स्कूल से लौटते समय दुकान पर सजे बिस्कुट, चॉकलेट और नमकीन को बड़ी लालसा से देखते।
एक दिन रोहन ने मासूमियत से पूछा—
" पापा... क्या हम भी कभी वो क्रीम वाला बिस्कुट खा सकते हैं ? "
सुरेश का दिल जैसे किसी ने मुठ्ठी में भींच लिया।
वह बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला—
" बेटा, बाहर की चीज़ें सेहत के लिए अच्छी नहीं होतीं। घर का खाना सबसे अच्छा होता है। "
रोहन चुप हो गया।
लेकिन सुरेश जानता था कि वह बच्चों को स्वास्थ्य का नहीं, अपनी मजबूरी का पाठ पढ़ा रहा है।
महीने के आख़िरी दिनों में हालात और भी खराब हो जाते। कई बार शीला और सुरेश सिर्फ़ सूखी रोटी या सादे चावल खाकर रात गुज़ार देते, ताकि बच्चों की थाली में सब्ज़ी की थोड़ी-सी मात्रा बनी रहे।
गरीबी उनके घर की स्थायी मेहमान थी, लेकिन बच्चों की मुस्कान उनकी सबसे बड़ी दौलत थी।
एक दिन कार्यालय में बड़े अधिकारियों की महत्वपूर्ण बैठक थी।
पूरे सम्मेलन कक्ष में तरह-तरह के महंगे नाश्ते सजाए गए थे—क्रीम बिस्कुट, काजू-कतली, समोसे, फल, नमकीन और मिठाइयाँ।
सुरेश पूरे मन से सबकी सेवा में लगा रहा।
बैठक समाप्त हुई।
अधिकारी एक-एक करके बाहर निकल गए।
सुरेश प्लेटें समेटने लगा।
उसने देखा—लगभग हर प्लेट में कई बिस्कुट, मिठाइयाँ और नमकीन बिना छुए या आधे खाए पड़े थे।
उसने एक पल उन प्लेटों को देखा...
फिर उसे रोहन की मासूम आवाज़ याद आई—
" पापा... क्या हम भी कभी वो क्रीम वाला बिस्कुट खा सकते हैं ? "
उसकी आँखें भर आईं।
उसने चारों ओर देखा।
कमरा खाली था।
उसने धीरे-धीरे प्लेटों में पड़े साफ़-सुथरे बिस्कुट और पैकेट वाली नमकीन एक पॉलीथिन में रख ली।
उसके मन में चोरी का भाव नहीं था।
वह सोच रहा था—
" वैसे भी यह सब कूड़ेदान में ही जाएगा... अगर मेरे बच्चों के पेट में चला जाए, तो शायद भगवान भी इसे पाप नहीं कहेंगे। "
उस दिन महीनों बाद वह मुस्कुराते हुए घर पहुँचा।
जैसे ही उसने पॉलीथिन बच्चों के सामने रखी, रोहन और शुभि की आँखें चमक उठीं।
" मम्मी... देखो! इतने सारे बिस्कुट ! "
" पापा... आज तो सच में त्योहार है ! "
दोनों बच्चे खुशी से उछल पड़े।
शीला ने आश्चर्य से पूछा—
" ये सब कहाँ से लाए ? "
सुरेश मुस्कुराकर बोला—
" ऑफिस की मीटिंग में बच गया था... फेंक दिया जाता, इसलिए ले आया। "
उस रात उस छोटे-से कमरे में सचमुच दीपावली-सी खुशी थी।
बच्चे पहली बार महंगे क्रीम बिस्कुट खा रहे थे।
उन्हें देखकर सुरेश और शीला भी मुस्कुरा रहे थे।
लेकिन उन्हें क्या पता था...
जिस चीज़ ने आज उनके घर में खुशी लाई थी, वही अगले दिन उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुःख बनने वाली थी।
अगली सुबह जैसे ही सुरेश कार्यालय पहुँचा, बड़े बाबू ने कड़क आवाज़ में कहा—
" सुरेश! साहब ने तुरंत बुलाया है। "
सुरेश घबराते हुए अधिकारी के कमरे में पहुँचा।
अधिकारी की आँखों में गुस्सा था।
उन्होंने मेज़ पर रखी सीसीटीवी की तस्वीरें उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा—
" तुमने कल मीटिंग के बाद नाश्ता पॉलीथिन में भरकर घर ले गए थे ? "
सुरेश ने सिर झुकाकर धीरे से कहा—
" जी साहब... बचा हुआ था... सोचा बच्चों को खिला दूँ ..."
अधिकारी की आवाज़ और कठोर हो गई—
" तुम्हें पता है यह सरकारी सामान था।? बिना अनुमति उसे बाहर ले जाना चोरी की श्रेणी में आता है। "
सुरेश के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वह हाथ जोड़कर बोला—
" साहब... मैंने चोरी नहीं की। जो फेंक दिया जाता, वही ले गया था। मेरे बच्चे पहली बार ऐसे बिस्कुट खाए थे... मुझसे गलती हो गई साहब... माफ़ कर दीजिए। "
लेकिन नियमों की किताब में उसकी गरीबी के लिए कोई पन्ना नहीं था।
उसी दिन आदेश जारी हुआ—
" कार्यालय की सामग्री बिना अनुमति ले जाने के आरोप में कर्मचारी सुरेश को तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त किया जाता है। "
कागज़ का वह एक टुकड़ा सुरेश के हाथ में था...
और उसकी आँखों के सामने अपने बच्चों का भविष्य बिखरता हुआ दिखाई दे रहा था।
💔 मासूम संदेश
इस कहानी का उद्देश्य चोरी को सही ठहराना नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाना है कि क्या हर गलती के पीछे छिपी मजबूरी को नज़रअंदाज़ कर देना ही न्याय है ?
भूख इंसान से ऐसे फैसले करवा देती है, जिनकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होती। इसलिए किसी के कर्म का निर्णय करने से पहले उसकी परिस्थितियों को समझने की कोशिश ज़रूर करें।
याद रखिए— कानून व्यवस्था बनाए रखता है, लेकिन इंसानियत समाज को ज़िंदा रखती है। जब इन दोनों के बीच संतुलन बना रहता है, तभी सच्चा न्याय जन्म लेता है।
🫸 अपराध की एक और मासूम कहानी 🫷
वह 10 साल का एक अनाथ लड़का था। फुटपाथ ही उसकी दुनिया थी। किसी से जो मिल जाता उसी को खाकर अपनी भूख मिटा लेता था। एक दिन उसने दुकान के पास गिरा हुआ पूड़ी खाने के लिए उठा लिया। फिर क्या था ! आस पास खड़े लोगों ने उसे डाकू समझकर मारना शुरू कर दिया।
यह दिल को छू लेने वाली बहुत ही मार्मिक कहानी है। आप एक बार इसे जरूर पढ़िए।
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सिस्टम के बदहाली की पोल खोलती कहानी
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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