बिंदिया और बबलू - अध्याय 9 | पहला शक | हिन्दी उपन्यास / bindiya-aur-bablu-cheptar-9-pahala-shak
👩❤️👩 बिंदिया और बबलू 👩❤️👩
📖 अभी तक आपने पढ़ा...
बबलू और बिंदिया अब मंझार गांव में स्थायी रूप से रहने लगे हैं। गांव वाले बबलू को सबसे पढ़ा-लिखा और होनहार युवक मानते हैं, जबकि उसकी सच्चाई सिर्फ बिंदिया जानती है कि वह वास्तव में अनपढ़ है।
बिंदिया गांव की रात्रि पाठशाला शुरू कर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को पढ़ाने लगी है। उसकी सादगी और शिक्षा से गांव के लोग प्रभावित हैं।
दूसरी ओर, रंजीत लगातार बबलू की सच्चाई उजागर करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन हर बार बबलू अपनी चतुराई और बिंदिया की सूझबूझ से बच निकलता है।
❤️ पहला शक
(अध्याय – 9 )
✍️ किशोर
सुबह की पहली किरणें जैसे ही दरधा नदी के पानी पर पड़ीं, उसकी लहरों पर सोने-सी चमक तैरने लगी। आम के बगीचों से कोयल की कूक सुनाई दे रही थी। कहीं बैलों की घंटियाँ बज रही थीं, तो कहीं चूल्हे से उठता धुआँ आसमान से बातें कर रहा था। मंझार गांव हर दिन की तरह जाग चुका था, पर आज गांव की हवा में कुछ अलग ही उत्साह था।
अब गांव में एक नई परंपरा शुरू हो चुकी थी—रात्रि पाठशाला।
जिस पुस्तकालय में कभी मकड़ियाँ जाले बुनती थीं, वहीं अब शाम ढलते ही बच्चों, औरतों और बूढ़ों की भीड़ लगने लगी थी। और इसका सबसे बड़ा कारण थी—बिंदिया।
गांव की औरतें अब उसे केवल "बबलू की बहू" नहीं, बल्कि "मास्टरनी बहू" कहकर पुकारने लगी थीं।
इधर महेश अभी-अभी नींद से उठा था।
जैसे ही उसने आँगन में कदम रखा, देखा कि बिंदिया तुलसी चौरे पर दीपक जलाकर पूजा कर रही थी।
सुबह की हल्की धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी। माथे की सिंदूर की रेखा और साड़ी का पल्लू उसके चेहरे को ऐसा आभा दे रहे थे कि महेश कुछ पल के लिए बस उसे देखता ही रह गया।
इतने में जानकी की तेज आवाज गूँजी—
"का रे महेश! सुबह-सुबह भूत देख लिया है का? मुंह फाड़ के उधर का देख रहा है?"
महेश सकपका गया।
"अरे मां... हम तो सोच रहे थे कि हमारी भाभी शहर से नहीं, सीधे स्वर्ग से उतरी हैं।"
जानकी ने करछुल हाथ में उठाकर कहा—
"बहुत उड़ मत। जा, पहले गाय खोल दे। नहीं तो आज खाना मत मांगना।"
महेश हँसते हुए बोला—
" गाय बाद में खोलेंगे। पहले भाभी से पूछ लें कि आज पढ़ाई में हमारा नाम सबसे आगे रहेगा कि नहीं ? "
महेश झट बिंदिया से पूछ बैठता है।
बिंदिया मुस्कराकर बोली—
"नाम आगे तभी रहेगा जब पढ़ाई भी आगे रहेगी।"
महेश सिर खुजलाने लगा।
"भाभी, पढ़ाई तो हमसे होती नहीं... आप आशीर्वाद दे दीजिए, बाकी भगवान मालिक है।"
बिंदिया खिलखिलाकर हँस पड़ी।
उधर गांव के चौक पर योगेश अपनी गुमटी खोल चुका था। आज उसके माथे पर बड़ा-सा लाल टीका था। गले में फूलों की माला। जेब में इत्र की शीशी, और हाथ में पूजा की थाली।
तभी वहाँ सुजीत आ जाता है। वह दूर से ही उसे देखकर ठठाकर हँस पड़ा।
"का बात है डेकोरेटर बाबू! आज देवी माता से दुकान का ठेका लेने जा रहे हो कि दुल्हन ?"
योगेश गर्व से बोला—
"तुम क्या जानो डॉक्टर साहेब! पारस पंडित बोले हैं कि सात दिन पूजा करो, सुंदर कन्या अपने आप पीछे-पीछे आएगी।"
सुजीत ने आँखें मटकाईं।
"सुंदर कन्या आएगी... लेकिन तुम्हें देखकर वापस भी चली जाएगी।"
पास बैठे बूढ़े हरखू काका हँस पड़े।
"अरे योगेश! लड़की भगवान भेज देंगे, लेकिन पहले आईना भी भेजेंगे।"
सभी ठहाका मारकर हँस पड़े।
योगेश का चेहरा उतर गया।
"हँस लो... सब हँस लो। जब हमारी शादी होगी न... तब तुम लोग बरात में सबसे पीछे चलोगे।"
सुजीत बोला—
"पीछे इसलिए कि कहीं दुल्हन तुम्हें देखकर भागे, तो हम पकड़ लें।"
फिर एक और ठहाका गूँज उठा।
उसी समय महेश वहाँ पहुँच गया।
"का रे योगेश! अभी तक शादी का सपना ही देख रहा है? चल, शाम को पढ़ाई में भी आ जाना।"
योगेश ने सीना चौड़ा किया।
"हम तो सिर्फ़ बिंदिया भाभी से पढ़ेंगे। किसी और से नहीं।"
महेश की भौंहें तन गईं।
"अरे ओ! पढ़ने जाएगा कि भाभी को देखने?"
"दोनों..."
इतना सुनते ही महेश ने उसकी पीठ पर हल्की-सी धौल जमा दी।
"सुन ले... भाभी हमारी हैं। ज्यादा आँख मत लड़ाना।"
योगेश हँसते हुए बोला—
"भाभी तुम्हारी हैं, लेकिन गुरु तो हमारी भी हैं।"
सुजीत बीच में कूद पड़ा—
"गुरु नहीं रे... तेरे लिए तो देवी हैं। रोज पूजा करता है उनका।"
तीनों की नोकझोंक सुनकर चौक पर बैठे लोग खिलखिलाकर हँसने लगे।
शाम ढलते ही पुस्तकालय के बाहर फिर भीड़ जुटने लगी।
बच्चे अपनी तख्तियाँ लेकर आ रहे थे।
औरतें घूँघट संभालते हुए बैठ रही थीं।
बूढ़े भी आजकल बिना नागा पहुँचने लगे थे।
बिंदिया ने ब्लैकबोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा—
"शिक्षा सबसे बड़ा धन है।"
फिर उसने मुस्कुराकर पूछा—
"बताइए... ऐसा कौन-सा धन है जिसे कोई चुरा नहीं सकता?"
एक छोटा बच्चा बोला—
"धान!"
सभी हँस पड़े।
महेश खड़ा होकर बोला—
"भाभी... धान चोरी हो सकता है।"
योगेश तुरंत बोला—
"मगर मेरा दिल चोरी हो गया है।"
पूरा पुस्तकालय ठहाकों से गूँज उठा।
बिंदिया ने मुस्कराकर डाँटा—
"योगेश भैया, पहले किताब से दोस्ती कीजिए... फिर दुनिया से।"
सभी फिर हँस पड़े।
पुस्तकालय के बाहर बैठा बबलू यह सब देख रहा था। उसकी आँखों में संतोष था।
वह मन ही मन बोला—
"जिस गांव में हँसी लौट आए, तो समझो वहां उम्मीद भी लौट आई।"
उधर गांव के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे रंजीत अपने मोसेरे भाई किसन के साथ बैठा था। साथ में दिनेश और मदन भी था। सामने चिलम रखी थी, मगर आज रंजीत का मन गांजे में भी नहीं लग रहा था। उसकी आँखों में हार की जलन साफ दिखाई दे रही थी।
किसन ने पूछा—
"का सोच रहे हो?"
रंजीत ने दाँत भींच लिए।
"सोच रहा हूँ... आखिर बबलू हर बार बच कैसे जाता है?"
मदन बोला—
"भईया, हमको तो अब लगने लगा है कि कहीं सच में पढ़ा-लिखा न हो।"
रंजीत ने गुस्से से उसकी तरफ देखा।
"चुप रह! अगर पढ़ा-लिखा होता तो पटना में कोई नौकरी करता?"
किसन ने धीरे से जेब से एक कागज़ निकाला।
"हम पटना से इस बार खाली हाथ नहीं लौटे हैं।"
रंजीत चौकन्ना हो गया।
"का मिला?"
किसन मुस्कुराया।
"जिस कॉलेज से बबलू ने बी.ए. करने का दावा किया है... वहाँ के बड़ा बाबू से मिलकर आया हूँ।"
रंजीत की आँखें चमक उठीं।
"फिर?"
"नाम तो दर्ज है... लेकिन रिकॉर्ड में बहुत गड़बड़ है। सर्टिफिकेट असली नहीं लग रहा। बड़ा बाबू बोले कि अगर लिखित आवेदन दो, तो पूरी जानकारी मिल जाएगी।"
रंजीत की मुट्ठियाँ अपने आप भींच गईं।
"मतलब... अब शिकार जाल में फँसने वाला है।"
किसन बोला—
"अभी नहीं। अभी सिर्फ शक है। सबूत चाहिए।"
रंजीत मुस्कराया।
"सबूत भी मिलेगा... और पूरे गांव के सामने मिलेगा।"
इधर पुस्तकालय में पढ़ाई समाप्त हो चुकी थी।
बिंदिया सबको विदा कर रही थी।
एक बूढ़ी दादी उसके पैरों के पास बैठ गईं।
"बिटिया... आज पहली बार अपना नाम खुद लिखे हैं। अब मर भी जाएँ तो दुख नहीं रहेगा।"
बिंदिया की आँखें भर आईं।
वह झट नीचे बैठ गई और दादी के पैर छू लिए।
"दादी, ऐसा मत कहिए। अभी तो आपको बहुत कुछ लिखना है।"
दादी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
"भगवान तोहार गोद सुखी रखे बिटिया। तू इस गांव की किस्मत बदल देहले।"
बाहर बैठा बबलू यह दृश्य देख रहा था। उसके चेहरे पर गर्व था।
उसने मन ही मन सोचा—
"जिस दिन बिंदिया को पाया था, उसी दिन मेरी सबसे बड़ी पूँजी मिल गई थी।"
ठीक उसी समय पुस्तकालय के पास एक मोटरसाइकिल आकर रुकती है। उसी समय सरपंच साहब भी वहां आते हैं।
मोटरसाइकिल पर सफेद कमीज़-पैंट पहने एक युवक बैठा था। उसके पास चमड़े का एक बैग था। वह अपने गले में पहचान-पत्र पहने हुए था।।
उसने सरपंच से पूछा—
" नमस्ते! क्या आप ही मंझार गांव के सरपंच साहब ? "
सरपंच साहब आगे बढ़े।
"जी हाँ। कहिए?"
"मैं प्रखंड कार्यालय से आया हूँ। मेरा नाम सुभाष है।कल गांव में युवा स्वरोज़गार योजना के संबंध में शिविर लगेगा। शिविर में आवेदन भरने के लिए एक पढ़े लिखे आदमी की जरूरत होगी। आप उसका नाम हमें बता दीजिए। "
इतना सुनते ही सरपंच साहब गर्व से मुस्कराए।
" सुभाष जी मेरे गांव में बबलू से ज्यादा पढ़ा लिखा कोई नहीं है। आपका सारा काम यही कर देगा।"
सरपंच ने बबलू की ओर इशारा किया।
बबलू के चेहरे की मुस्कान क्षण भर को थम गई। फिर उसने अपने स्वभाव के अनुसार मुस्कुराकर हाथ जोड़ दिए।
"नमस्कार।"
अधिकारी ने हाथ मिलाया।
"कल सुबह नौ बजे पंचायत भवन आइएगा। कुछ अंग्रेज़ी के आवेदन और ऑनलाइन प्रक्रिया है। आपकी मदद चाहिए।"
बबलू का दिल एक पल को धक् से रह गया। मगर चेहरे पर मुस्कान वैसी ही रही।
"ज़रूर... अवश्य आएँगे।"
अधिकारी सुभाष चला गया।
रंजीत को जैसे ही बबलू द्वारा आवेदन भरने वाली बात की जानकारी मिलती है। वह सुनकर खुशी से पागल हो उठता है।
वह मन ही मन बड़बड़ाने लगता है -
"अब देखता हूँ बबलू कल आवेदन भरने वाला खेल कैसे खेलते हो।"
उसकी आँखों में एक शिकारी की चमक थी।
और उधर बबलू चुपचाप पुस्तकालय के पास से अपने घर की ओर जा रहा था। आज पहली बार उसे उसका भेद खुलने का डर सता रहा था। उसे ऐसा लग रहा था मानो कल का सूरज उसके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा लेकर उगेगा।
रात बीत गई, पर बबलू की आँखों में नींद नहीं उतरी। वह कमरे से घर के आंगन में आ गया।
आँगन में चाँदनी बिछी थी। दूर कहीं सियारों के रोने की आवाज़ आ रही थी। बबलू एक खाट पर बैठा आकाश की ओर देखने लगा।
तभी कमरे में से बिंदिया भी निकल कर आंगन में आ गई। वह धीरे से बबलू के पास आकर बैठ गई।
"आज नींद नहीं आई?"
बबलू मुस्करा तो दिया, मगर उस मुस्कान में पहले वाली बेफ़िक्री नहीं थी।
"नींद तो आ जाती है बिंदिया... लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो आँखों में जागते रहते हैं।"
बिंदिया ने उसका चेहरा गौर से देखा।
"बात क्या है?"
कुछ पल तक बबलू चुप रहा। फिर धीमे स्वर में बोला—
"कल पंचायत भवन में सरकारी अधिकारी बुलाए हैं। अंग्रेज़ी का फॉर्म भरना है, ऑनलाइन आवेदन करना है।"
बिंदिया सब समझ गई।
वह कुछ क्षण चुप रही, फिर मुस्कराकर बोली—
"बस इतनी-सी बात?"
बबलू हँस पड़ा।
"तुम्हारे लिए छोटी होगी, मेरे लिए तो पहाड़ है।"
बिंदिया ने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया।
"सुनिए... डर इंसान को वहीं हराता है, जहाँ उसका विश्वास कमजोर पड़ जाता है। आपने अब तक अपनी बुद्धि से हर मुश्किल पार की है। इस बार भी रास्ता निकलेगा।"
बबलू ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में पहली बार सुकून उतरने लगा।
"सच कहूँ बिंदिया, अगर तुम साथ न होतीं, तो मैं कब का टूट गया होता।"
बिंदिया मुस्कराई।
"और अगर आप हार मान लेते, तो मैं आपको कभी अपना पति मान ही नहीं पाती।"
दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। अभी ऐसा लग रहा था जैसे चाँद उनकी चुप्पी पर मुस्करा रहा था।
सुबह होते ही पूरे गांव में हलचल मच गई। पंचायत भवन के सामने कुर्सियाँ लग गई थीं।
बैंक मैनेजर, प्रखंड विकास पदाधिकारी का प्रतिनिधि और कल वाला कर्मचारी सुभाष पहुँच चुके थे।
गांव के युवक नए कपड़े पहनकर आए थे।
उधर रंजीत भी आज सुबह से ही तैयार था।
उसने दिनेश से कहा—
"आज तमाशा देखना, जितना ऊँचा चढ़ा है, उतना ही ज़ोर से गिरेगा।"
दिनेश मुस्कराया।
"बस धैर्य रखो।"
थोड़ी देर बाद बबलू भी पंचायत भवन पहुँचा। उसके साथ बिंदिया भी थी।
उसे देखते ही गांव के लोग खड़े हो गए।
सरपंच गर्व से बोले—
"लो... हमारा बबलू आ गया।"
तालियाँ गूँज उठीं।
रंजीत भी ताली बजा रहा था। लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं, इंतज़ार था।
सुभाष ने फाइल खोलते हुए कहा—
" सरकार की नई स्वरोज़गार योजना के लिए आवेदन यहीं भरे जाएँगे। बबलू जी आप बारी बारी से अपने गांव के लोगों का फार्म भरते जाइएगा।"
इतना कहकर उसने एक मोटा अंग्रेज़ी आवेदन-पत्र बबलू के हाथ में रख दिया।
बबलू ने कागज़ हाथ में लिया। उसकी दिल की धड़कन तेज हो गई। उसे अक्षर तो दिखाई दे रहे थे, मगर शब्द नहीं।
उसी क्षण रंजीत की आँखों में चमक आ गई।
"अब बचकर दिखाओ...। "
रंजीत ने मन ही मन कहा।
लेकिन बबलू ने अगले ही पल मुस्कराकर फॉर्म बंद कर दिया। सब लोग उसकी ओर देखने लगे।
वह खड़ा हुआ और बड़े आत्मविश्वास से बोला—
"सर, यदि अनुमति हो तो पहले दो मिनट गांव वालों से एक बात कहूँ?"
अधिकारी ने सिर हिलाया।
"कहिए।"
बबलू आगे बढ़ा।
"भाइयों और बहनों... कागज़ भरना आसान है, लेकिन उसका उद्देश्य समझना ज़्यादा ज़रूरी है। यदि बिना समझे फॉर्म भर दिया जाए, तो योजना का लाभ भी अधूरा रह जाता है। पहले मैं आप सबको योजना समझा दूँ, फिर हम सब मिलकर आवेदन भरेंगे।"
भीड़ से आवाज़ आई—
"ठीक बात है!"
"पहले समझाइए!"
सरपंच बोले—
"हाँ बेटा, पहले समझा दो।"
बबलू ने इतनी सहज भाषा में योजना के लाभ समझाने शुरू किए कि लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे।
वह उदाहरण देता—
"मान लीजिए महेश मुर्गी पालन करना चाहता है..."
भीड़ हँस पड़ी।
महेश खड़ा होकर बोला—
"भईया, मुर्गी नहीं... हम तो पहले शादी करेंगे!"
पूरा पंचायत भवन ठहाकों से गूँज उठा।
बबलू भी हँस दिया।
"अच्छा, शादी के बाद मुर्गी पालन कर लेना।"
तालियाँ बज उठीं।
रंजीत झुँझला गया।
"ये आदमी हर बात को मज़ाक में कैसे बदल देता है?"
अधिकारी भी प्रभावित हो चुका था।
उसने कहा—
"बबलू जी, आपकी समझाने की शैली बहुत अच्छी है। अब आप पहले अपना आवेदन भर दीजिए, फिर बाकी लोगों का शुरू करेंगे।"
यह सुनते ही बबलू के पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गई। अब बचने का कोई बहाना नहीं था।सामने अंग्रेज़ी का फॉर्म और चारों ओर सैकड़ों निगाहें।
बबलू के पीछे खड़ा रंजीत मुस्करा रहा था।
और भीड़ के बीच खड़ी बिंदिया की आँखें सीधे बबलू पर टिकी थीं। उसने बिना कुछ कहे सिर्फ़ अपनी आँखों से बबलू को भरोसा दिया।
बबलू ने गहरी साँस ली, फॉर्म हाथ में उठाया और कलम खोल दी।
क्रमश आगे ...
अगले अध्याय में पढ़िए—
क्या बबलू अंग्रेज़ी का फॉर्म भर पाएगा?
क्या रंजीत पहली बार बबलू की सच्चाई सबके सामने ला देगा?
या फिर बिंदिया अपनी बुद्धिमानी से एक बार फिर अपने पति की इज़्ज़त बचा लेगी?
अगर अपने अभी तक " बिंदिया और बबलू " उपन्यास के पीछे का अध्याय नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली ग्रामीण परिवेश की लाजवाब कहानी है।
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