बिंदिया और बबलू अध्याय 7 | डीएम साहब का दौरा | हिंदी ग्रामीण उपन्यास / bindiya-aur-bablu-cheptar-7-dm-sahab-ka-daura








            👩‍❤️‍👩  बिंदिया और बबलू   👩‍❤️‍👩



        📖   अभी तक आपने पढ़ा...

    
                 दरधा नदी के किनारे बसे शांत गांव मंझार में रहने वाले लोग बबलू को गांव का सबसे पढ़ा-लिखा, होनहार और समझदार युवक मानते हैं। लेकिन यह सम्मान एक ऐसे राज पर टिका है, जिसे केवल बबलू और उसकी पत्नी बिंदिया ही जानते हैं—बबलू वास्तव में पढ़ा-लिखा नहीं है। वह अपनी हाजिरजवाबी, तेज दिमाग और बिंदिया की सूझबूझ के सहारे अब तक अपनी सच्चाई दुनिया से छिपाए हुए है।

शहर की पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की बिंदिया ने प्रेम विवाह कर बबलू का साथ चुना। शादी के बाद जब उसे अपने पति की असलियत का पता चला, तब भी उसने उसका साथ छोड़ने के बजाय उसकी ताकत बनने का फैसला किया। दोनों हमेशा के लिए मंझार गांव आकर बस जाते हैं।

गांव में बिंदिया का भव्य स्वागत होता है। उसकी सादगी, व्यवहार और शिक्षा से पूरा गांव प्रभावित हो जाता है। बबलू गांव के विकास का सपना लेकर रात्रि पाठशाला शुरू करता है, जहां बिंदिया बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को पढ़ाने का जिम्मा संभाल लेती है। देखते ही देखते गांव में शिक्षा की नई अलख जगने लगती है।

लेकिन इस सुखद माहौल के बीच एक तूफान भी पल रहा है। गांव का युवक रंजीत, जो कभी बिंदिया से प्रेम करता था, अब हर हाल में बबलू की सच्चाई उजागर करना चाहता है। वह कभी चिट्ठी पढ़वाकर, कभी अंग्रेज़ी के सरकारी पत्र से और कभी दूसरी चालें चलकर बबलू को सबके सामने बेनकाब करने की कोशिश करता है। मगर हर बार बबलू अपनी चतुराई और बिंदिया की समझदारी से उसकी साजिश नाकाम कर देता है।

दूसरी ओर महेश, योगेश और सुजीत की मासूम हरकतें और हास्यपूर्ण नोकझोंक कहानी को हल्का और मनोरंजक बनाए रखती हैं। महेश अपनी शहरी भाभी का सबसे बड़ा भक्त बन चुका है, जबकि योगेश सुंदर पत्नी पाने के सपने में रोज कोई नया कारनामा कर बैठता है।

अब पूरे गांव में एक नई हलचल मची है। खबर आई है कि जिला अधिकारी (डीएम) साहब स्वयं मंझार गांव आने वाले हैं। गांव उनकी अगवानी की तैयारियों में जुटा है, लेकिन रंजीत इसे बबलू की असलियत उजागर करने का सबसे सुनहरा मौका मान रहा है।

उधर बबलू के मन में भी पहली बार डर घर करने लगा है। उसे लगने लगा है कि शायद अब उसकी जिंदगी की सबसे कठिन परीक्षा सामने आने वाली है...







        👩‍❤️‍👩   डीएम साहब का दौरा   👩‍❤️‍👩

                    ( अध्याय – 7 )


                                            ✍️  किशोर 



        सुबह का सूरज अभी पूरी तरह निकला भी नहीं था कि मंझार गांव जाग उठा। ऐसा लग रहा था मानो गांव की मिट्टी को भी किसी बड़े मेहमान के आने की खबर मिल गई हो।

दरधा नदी के किनारे हल्की-हल्की धुंध पसरी थी। आम के बगीचों से कोयल की कूक सुनाई दे रही थी। कहीं बैलों की घंटियाँ बज रही थीं तो कहीं औरतें आँगन लीप रही थीं।

लेकिन आज गांव की सुबह रोज जैसी नहीं थी।

हर चौपाल, हर गली, हर दरवाजे पर बस एक ही चर्चा थी—

"आज डीएम साहब गांव आने वाले हैं..."


सरपंच साहब सुबह-सुबह ही पंचायत भवन पहुँच गए थे। उनके पीछे-पीछे गांव के लोग भी आने लगे।
आज महेश सरपंच साहब के बॉडीगार्ड जैसा साथ चल रहा था। 

"अरे महेश !"    उन्होंने आवाज लगाई।

"जी चाचा।"

"स्कूल के सामने वाली सड़क पर झाड़ू लगवा दी ? "

"हो गया।"

"मंदिर के पास की घास ?"

"वो भी साफ हो गई।"

"तालाब ?"

"वहाँ भी आदमी लगा दिए हैं।"

सरपंच ने संतोष की साँस ली।


"आज कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। पहली बार जिला अधिकारी हमारे गांव आ रहे हैं।"


उधर महेश तो खुशी से फूला नहीं समा रहा था। उसके लिए डीएम साहब से भी बड़ा आकर्षण एक ही था— बिंदिया भाभी। आज वह दिन भर बिंदिया के साथ रहने वाला था।

सरपंच साहब से फ़ुर्सत मिलते ही वह भागता हुआ बबलू के घर पहुँचा। 

"भाभी...!"

उस समय बिंदिया नहा धोकर आँगन में तुलसी को पानी दे रही थी।

"क्या हुआ देवर जी ? सुबह-सुबह ऐसे क्यों चिल्ला रहे हैं ?"

"आज डीएम साहब आ रहे हैं।"

" पता है। ' 

" तो आप अभी तक तैयार नहीं हुई भाभी। आप जा तैयार होकर जल्दी पुस्तकालय चलिए। वहाँ का सारा व्यवस्था आपको ही देखना है।"

बिंदिया बस मुस्कुरा दी।


इतने में पीछे से बबलू भी बाहर आ गया।

"क्या बात है ?"

महेश उत्साह से बोला—

"भैया ! आज पूरा गांव और मोहल्ला आपको और बिंदिया भाभी को ही देखने वाला है। "

कहते हुए महेश भी तैयार होने अपने घर की ओर चला जाता है। 

बबलू मुस्कुरा तो दिया लेकिन उसके भीतर जैसे किसी ने पत्थर डाल दिया हो।

बबलू का मन में कुछ और चल रहा था मगर चेहरे पर मुस्कान थी।

"अगर डीएम साहब ने अंग्रेज़ी में बात कर ली तो ?"

"अगर कोई फाइल पढ़ने को दे दी तो?"

"अगर मंच पर बुला लिया तो ?"

बबलू के मन में तूफान उमड़ रहा था। वह जितना बाहर से शांत दिखाई दे रहा था अंदर से उतना ही बेचैन था।

बिंदिया ने उसके चेहरे की घबराहट पढ़ ली।

धीरे से बोली—

"फिर डर रहे हैं ?"

बबलू मुस्कराया।

"डर नहीं रहा हूँ... बस सोच रहा हूँ...। पता नहीं आज किस्मत कौन-सा नया सवाल पूछने वाली है। "

बिंदिया ने उसकी ओर देखकर कहा—

" किस्मत सवाल पूछती है मगर जवाब इंसान देता है। और अब तक हर बार आपने जवाब दिया है।"

बबलू हँस पड़ा।

"जवाब मैंने नहीं... तुमने दिए हैं।"


उधर रंजीत आज रात भर सोया नहीं था। उसके दिमाग में बबलू के पोल खोलने के जुगाड में उछल कूद मचा हुआ था। 

दिनेश पसंद में ही चारपाई पर बैठा बीड़ी पी रहा था।

"आज का दिन आखिरी मौका है।"

रंजीत बोला—

"आज अगर बबलू बच गया तो फिर उसे गिराना आसान नहीं होगा।"

दिनेश मुस्कुराया।

" भईया इस बार जाल ऐसा बिछाया है... कि लोमड़ी भी नहीं बच सकती।"

"क्या किया है?"

दिनेश धीरे से बोला—

"डीएम साहब के साथ जो शिक्षा विभाग के अधिकारी आ रहे हैं... उनमें मेरा एक परिचित है।"

रंजीत की आँखें चमक उठीं।

"फिर ? "

" बस देखते जाइए ... आज बबलू खुद अपने पैरों से फंदे में जाएगा।"

दोनों की हँसी सुनकर मदन बोला—

"भैया... आज गांजा बाद में पीना... पहले तमाशा देखेंगे।"


उधर योगेश भी अपनी की दुकान पर अभी से ही सँवरने में लगा था । सुजीत भी वही बैठा था।

योगेश आईने में बार बार बाल सँवार रहा था।

"कितनी बार कंघी करेगा?"

"जब तक हीरो नहीं लगेंगे।"

"काहे?"

"आज डीएम आएँगे।"

"तो?"

"उनके साथ कोई महिला अफसर भी आएगी।"

सुजीत ठहाका मारकर हँसा।

"तू पहले गांव की लड़की से तो बच नहीं पाया...अब अफसरनी पटाएगा?"

योगेश सीना फुलाकर बोला—

"दिल बड़ा होना चाहिए डॉक्टर बाबू, चेहरा नहीं ।  चेहरा तो भगवान देता है। "

इतने में महेश भी बबलू के घर से वहाँ आ गया।

"योगेश!"

"हाँ भैया । " 

"आज दुकान बंद रखना।"

"क्यों ? "

"डीएम साहब आ रहे हैं।"

योगेश बोला—

"भैया...अगर डीएम साहब को पंखा चाहिए तो ?"

महेश झल्ला गया—

"डीएम साहब तुम्हारे यहाँ बल्ब खरीदने नहीं आ रहे।"

सुजीत हँसते-हँसते चारपाई से गिर पड़ा।


इधर गांव में कुछ लड़के सड़क पर चूना डाल रहे थे।

कुछ बच्चे अभी से ही हाथों में झंडियाँ लिए घूम रहे थे।

कुछ औरतें रंगोली बना रही थीं।

रात्रि पाठशाला के बच्चे बार-बार अपना स्वागत गीत दोहरा रहे थे।

सारे गांव का केंद्र अब एक ही था— पुस्तकालय।

यहीं डीएम साहब आने वाले थे।


अपने घर में बबलू और बिंदिया अभी बातें ही कर रहे थे कि सरपंच साहब की आवाज घर के बाहर से आती है। 

"बबलू बेटा...  । " 

"जी चाचा।" 
आवाज सुनते ही बबलू घर से बाहर निकलता है।

"आज अगर डीएम साहब खुश हो गए... तो गांव की किस्मत बदल जाएगी।"

" मैं पूरी कोशिश करूँगा चाचा। "

सरपंच साहब ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

"कोशिश नहीं... मुझे तुम पर भरोसा है। "

कहते हुए सरपंच साहब वहां से चले जाते हैं। 

इधर सरपंच साहब की बात को सुनकर बबलू के भीतर अपराधबोध की एक लहर उठने लगी। 

" जिस भरोसे पर पूरा गांव खड़ा है... अगर वही एक दिन टूट गया तो ?"

उसने पहली बार महसूस किया— झूठ से मिली इज्जत का बोझ... सच से भी ज्यादा भारी होता है।
बबलू इसी उधेड़ बुन में मंदिर की ओर चल देता है। 


     इधर घर के काम से फ़ुर्सत मिलते ही बिंदिया भी पुस्तकालय आ जाती है। उसे वहां का व्यवस्था देखना था और बच्चों का स्वागत गान की तैयारी भी करवानी थी।





            बबलू मंदिर के पीछे वाले पुराने पीपल के नीचे आकर बैठा जाता है। 

इस समय गांव में बहुत शोर था... लेकिन उसके भीतर सन्नाटा।

उसे पहली बार अपने झूठ का बोझ महसूस हो रहा था।

"अगर आज सच सामने आ गया तो ?"

"क्या गांव वाले मुझे धोखेबाज़ कहेंगे ?"

तभी पीछे से बबलू की परछाई बिंदिया  भी वहां आ जाती है। 

"यहाँ अकेले क्या सोच रहे हैं?"

बबलू मुस्कुरा भी न सका।

"सोच रहा हूँ... इंसान अपनी किस्मत से कब तक भाग सकता है?"

बिंदिया उसके पास बैठ गई।

"भागना नहीं, सामना करना सीखिए।"

"अगर सच सामने आ गया तो ?"

"तो हम दोनों मिलकर उसका भी सामना करेंगे।"

बबलू ने पहली बार राहत की साँस ली।



दोपहर ढलने लगी थी। डीएम साहब के गांव में आने का समय हो गया था। गांव के सड़क के दोनों ओर गांव वाले कतार बनाकर अभी से ही खड़े हो गए थे। 

बच्चों के हाथों में छोटे-छोटे झंडे थे।

महिलाएँ मंगल गीत गाने की तैयारी कर रही थीं।

बैंड वाले अपने वाद्य ठीक कर रहे थे।

सरपंच साहब बार-बार घड़ी देख रहे थे।

अचानक... दूर सड़क पर धूल का एक बड़ा गुबार उठा।

एक बच्चा चिल्लाया—

"आ गए...! गाड़ी आ गई...!"

सारी निगाहें उसी दिशा में उठ गईं।

पहले पुलिस की जीप दिखाई दी।

उसके पीछे सफेद रंग की सरकारी गाड़ियाँ।

सायरन की हल्की आवाज़ हवा में तैरने लगी।

सरपंच साहब ने अपनी धोती संभाली।

महेश उत्साह से उछल पड़ा।

योगेश ने जल्दी से अपने बालों पर हाथ फेरा।

रंजीत की आँखों में नई चमक आ गई।

और... बबलू का दिल पहले से भी तेज़ धड़कने लगा। बिंदिया भी बबलू के पास ही खड़ी हुई।

         डीएम साहब का काफिला अब मंझार गांव की सीमा में प्रवेश कर चुका था। 




                                       क्रमशः आगे ...




    👩‍❤️‍👩  अगले अध्याय की झलक ........ 


       क्या डीएम साहब के सामने बबलू की परीक्षा होगी ?

क्या रंजीत इस बार अपनी साजिश में सफल होगा ?

क्या बिंदिया एक बार फिर अपनी सूझबूझ से बबलू की इज्जत बचा पाएगी ?

  
   👉 जानिए अगले रोमांचक अध्याय 8 में।



       यदि आपने यदि तक बिंदिया और बबलू उपन्यास के पीछे का अध्याय नहीं पढ़ा है तो उसे आप एक बार जरूर पढ़िए। 

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