बिंदिया और बबलू - अध्याय 10 | अंग्रेज़ी फ़ॉर्म का जाल | प्रेम और हास्य से भरी हिंदी उपन्यास / bindiya-aur-babalu-chapter-10
👩❤️👩 बिंदिया और बबलू 👩❤️👩
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मंझार गाँव में बबलू और बिंदिया अब सबके प्रिय बन चुके हैं। बिंदिया की रात्रि पाठशाला से गाँव के बच्चे, महिलाएँ और बुज़ुर्ग पढ़ना शुरू कर चुके हैं। दूसरी ओर रंजीत लगातार बबलू के अनपढ़ होने का सच उजागर करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन हर बार उसे असफलता ही हाथ लगती है। अब वह अंग्रेज़ी के सरकारी फ़ॉर्म के बहाने बबलू को सबके सामने शर्मिंदा करने की योजना बनाता है।
सरकारी योजना का अंग्रेज़ी आवेदन-पत्र पूरे गाँव के लिए मुसीबत बन जाता है। सभी को विश्वास है कि सबसे पढ़ा-लिखा बबलू ही यह फ़ॉर्म भरेगा। रंजीत इसी मौके को बबलू की सच्चाई सामने लाने का सबसे बड़ा हथियार मानता है।
लेकिन बिंदिया अपनी बुद्धिमानी और सूझबूझ से स्थिति को संभाल लेती है।
पंचायत भवन में योगेश, महेश और सुजीत के मज़ेदार संवाद पाठकों को खूब हँसाते हैं, जबकि अंत में रंजीत एक बड़ा फैसला लेकर कहानी को नए मोड़ पर पहुँचा देता है।
अंग्रेज़ी फ़ॉर्म का जाल
( अध्याय- 10 )
✍️ किशोर
सावन का महीना था। रात भर हुई हल्की वर्षा के बाद मंझार गाँव की पगडंडियाँ धुली-धुली-सी लग रही थीं। आम के पेड़ों से टपकती बूँदें, दूर खेतों में हल चलाते बैल और मंदिर की घंटियों की मधुर ध्वनि पूरे वातावरण में एक अलौकिक शांति घोल रही थी।
लेकिन उस सुबह गाँव के लोगों के चेहरों पर शांति नहीं, उत्सुकता थी। कारण यह था कि ब्लॉक कार्यालय से एक नई सरकारी योजना आई थी। कहा जा रहा था कि जो किसान समय पर आवेदन कर देंगे, उन्हें खेती के लिए सरकारी सहायता मिलेगी। पर एक समस्या थी पूरा आवेदन-पत्र अंग्रेज़ी में था।
सुबह-सुबह पंचायत भवन के सामने गाँव वालों की भीड़ जुटने लगी। कोई गमछा कंधे पर डाले आया था, कोई हाथ में लाठी लिए, तो कोई बैलों को खेत में छोड़कर सीधे वहीं चला आया था।
सरपंच साहब बरामदे में खाट पर बैठे थे। उनके हाथ में वही मोटा-सा अंग्रेज़ी वाला फ़ॉर्म था। वे उसे बार-बार उलटते-पलटते और फिर माथा खुजला देते।
उसी समय तेतरी चाची भी वहाँ पहुँच गई।
" का हो सरपंच! आज पंचायत में मेला लगा है का?"
सरपंच मुस्कराए—
"मेला नहीं चाची सरकार का खेला है।"
"काहे?"
"ई देखो..."
उन्होंने फ़ॉर्म तेतरी चाची के हाथ में दे दिया।
तेतरी चाची ने उसे उल्टा पकड़ा, फिर सीधा किया, फिर आँखें सिकोड़कर बोली—
"अरे बाप रे! ई कागज पर चींटी दौड़ रही है कि लिखा हुआ है?"
पूरे बरामदे में ठहाका गूँज उठा।
इसी बीच योगेश और सुजीत भी आ पहुँचे।
योगेश ने फ़ॉर्म देखते ही पूछा—
"सरपंच चाचा, ई हिन्दी में काहे नहीं छपवाए?"
सरपंच ने लंबी साँस ली—
"बेटा, सरकार समझती है कि गाँव का हर आदमी अंग्रेज़ हो गया है।"
सुजीत तुरंत बोला—
"हम पढ़ लेते हैं।"
सबकी नज़र उसी पर टिक गई।
उसने फ़ॉर्म हाथ में लिया और पहला शब्द पढ़ने की कोशिश की—
"ए... एप्ली... एपली... अप्पल..."
महेश हँस पड़ा—
"का हुआ डॉक्टर बाबू ? सेब बेच रहे हो?"
सारी पंचायत हँसी से गूँज उठी।
सुजीत झेंप गया।
"हम तो बस गला साफ कर रहे थे।"
तभी दूर से सफेद कुर्ता-पायजामा पहने बबलू आता दिखाई दिया। उसके पीछे महेश ऐसे चल रहा था, मानो कोई मंत्री आ रहा हो।
महेश ऊँची आवाज़ में बोला—
"हटिए... हटिए... गाँव का सबसे पढ़ल-लिखल आदमी आ रहा है।"
सबकी निगाहें बबलू पर टिक गईं।
रंजीत भी भीड़ में बैठा था।
उसके होंठों पर हल्की मुस्कान तैर गई।
उसने मन ही मन कहा—
"आज देखता हूँ, बाबू साहब अंग्रेज़ी का खेल कैसे खेलते हैं।"
सरपंच उठकर बबलू के पास आए।
"आओ बेटा, तुम्हारा ही इंतज़ार था।"
"क्या बात है चाचा?"
"सरकार का नया फ़ॉर्म आया है। पूरा अंग्रेज़ी में है। गाँव में तुमसे ज़्यादा पढ़ा-लिखा कौन है? तुम ही भर दो।"
बबलू के चेहरे की मुस्कान एक पल को जम गई।
उसके पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गई।
अंग्रेज़ी! जिसे वह ए, बी, सी भी ठीक से नहीं पहचानता था। लेकिन अगले ही क्षण उसने चेहरे पर वही पुराना आत्मविश्वास ओढ़ लिया।
"बस इतनी-सी बात?"
"हाँ बेटा।"
"हो जाएगा चाचा।"
रंजीत ने बात को और हवा दी।
"सरपंच चाचा, खाली फ़ॉर्म भरना नहीं, सबके सामने भरवाइए। ताकि गाँव के लड़के भी सीखें कि सरकारी आवेदन कैसे भरा जाता है।"
कुछ लोगों ने ताली बजा दी।
सरपंच बोले—
"बिलकुल ठीक कहा।"
अब बबलू के माथे पर पसीने की महीन बूँदें उभर आईं।
लेकिन उसने मुस्कराते हुए कहा—
"ज्ञान बाँटने से बढ़ता है चाचा। सब लोग बैठिए। ."
उधर घर पर बिंदिया आँगन में तुलसी को जल दे रही थी।
इतने में महेश दौड़ता हुआ पहुँचा।
"भाभी... गजब हो गया!"
बिंदिया घबरा गई।
"क्या हुआ?"
"पंचायत में अंग्रेज़ी वाला फ़ॉर्म आया है। सब लोग बबलू भैया से भरवाना चाहते हैं।"
बिंदिया का चेहरा पल भर के लिए पीला पड़ गया। वह समझ गई कि यह संयोग नहीं रंजीत की नई चाल है। उसने तुरंत स्वयं को सँभाला।
"भैया कहाँ हैं?"
"पंचायत में।"
"और रंजीत?"
"वह भी वहीं बैठा मुस्कुरा रहा है।"
बिंदिया ने आसमान की ओर देखा।
धीरे से बोली—
"हे माँ दुर्गा, आज फिर हमारी परीक्षा है।"
पंचायत भवन में बबलू ने फ़ॉर्म हाथ में उठा लिया।
सैकड़ों आँखें उसी पर टिकी थीं।
रंजीत की आँखों में शिकार पकड़ने की चमक थी।
सरपंच आशा से उसे देख रहे थे।
और बबलू वह पहली बार अपने जीवन में सचमुच डर गया था। उसने फ़ॉर्म खोला। पहली ही पंक्ति पूरी अंग्रेज़ी में थी। उसकी उँगलियाँ काँप उठीं। लेकिन चेहरे पर मुस्कान अभी भी वैसी ही थी।
वह धीरे से बोला—
"सरपंच चाचा , पहले मैं इसे एक बार पूरा देख लूँ। सरकारी कागज़ में जल्दबाज़ी ठीक नहीं होती।"
सरपंच ने सिर हिलाया।
"ठीक कह रहे हो बेटा। आराम से देखो।"
रंजीत मुस्कराया।
"देख लो बबलू... जितना देखना है देख लो। आज बचकर दिखाओ। "
बबलू ने एक बार फिर फ़ॉर्म पर नज़र डाली और उसी क्षण उसकी निगाह पंचायत भवन के दरवाज़े पर पड़ी। दूर से बिंदिया तेज़ कदमों से इधर ही चली आ रही थी। उसकी आँखों में चिंता भी थी, और किसी नई योजना की चमक भी।
पंचायत भवन के बरामदे में बैठे लोगों की आँखें बार-बार बबलू पर टिक जाती थीं। कोई उसकी विद्वत्ता के किस्से सुना रहा था, तो कोई अपने बेटे से कह रहा था—
"देख रहे हो? पढ़ाई-लिखाई का यही फल होता है। एक दिन ऐसा आता है कि पूरा गाँव तुम्हारे भरोसे बैठ जाता है।"
तभी बिंदिया पास आ गई। उसने आते ही सबसे पहले सरपंच को प्रणाम किया।
"आओ बेटी, बड़ी अच्छी बात हुई। तुम्हारा ही इंतज़ार था।"
"काहे चाचा?"
"आज तुम्हारे बाबू साहब पूरे गाँव का सरकारी फ़ॉर्म भरेंगे।"
बिंदिया ने क्षणभर के लिए बबलू की ओर देखा। बस एक नज़र और वह सब समझ गई।
बबलू के चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों में हल्की घबराहट साफ दिखाई दे रही थी। पत्नी के लिए पति का चेहरा किसी खुले ग्रंथ से कम नहीं होता।
उसने मन ही मन कहा—
"आज फिर तुम्हारी लाज मुझे ही रखनी होगी।"
इतने में महेश दौड़ता हुआ बोला—
"भाभी! आप भी बैठ जाइए। आज देखिएगा, भईया कैसे अंग्रेज़ी को हिन्दी बना देंगे।"
बिंदिया मुस्करा दी।
"पहले देवी माँ का नाम लो, फिर काम शुरू होगा।"
रंजीत अब तक चुप बैठा था। उसे लगा कि जितनी देर होगी, बबलू उतना ही घबराएगा।
वह व्यंग्य से बोला—
"बबलू भैया, सरकारी काम में देर ठीक नहीं होती। कहीं योजना निकल गई तो गाँव का नुकसान हो जाएगा।"
बबलू ने उसी शांति से उत्तर दिया—
"रंजीत भाई, खेत में बीज भी सोच-समझकर बोया जाता है। जल्दबाज़ी में बोया गया बीज अक्सर अंकुर नहीं देता।"
बरामदे में बैठे बूढ़े किसान सिर हिलाने लगे।
"सही बात है। "
रंजीत होंठ भींचकर रह गया।
तभी योगेश ने फ़ॉर्म उठाकर उलट-पुलटकर देखा।
"ई देखो... ऊपर लिखा है... नेम..."
सुजीत बोला—
"अरे बुद्धू! 'नेम' नहीं, 'नाम' लिखा है।"
महेश हँस पड़ा—
"तो अंग्रेज़ी वाले भी आखिर नाम ही पूछते हैं!"
सब हँसने लगे।
योगेश फिर बोला—
"ई नीचे का लिखा है... फादर नेम..."
महेश मासूमियत से पूछ बैठा—
"अच्छा! अगर बाप का नाम याद न रहे तो?"
इस बार ऐसा ठहाका गूँजा कि पंचायत भवन की दीवारें तक मुस्करा उठीं।
बिंदिया ने इसी हँसी-मज़ाक के बीच धीरे से बबलू के पास जाकर कहा—
"सुनिए। "
"हाँ ?"
" फ़ॉर्म मुझे एक बार दिखाइए।"
बबलू ने बिना किसी को शक हुए कागज़ उसकी ओर बढ़ा दिया।
बिंदिया ने एक मिनट में ही पूरा फ़ॉर्म देख लिया। उसकी तेज़ निगाहों ने समझ लिया कि यह सामान्य आवेदन-पत्र है। वह मुस्कराई।
"बस... इतना ही ?"
बबलू ने धीरे से पूछा—
"कोई उपाय ?"
"है... लेकिन धैर्य रखिए।"
इतने में पंचायत का चौकीदार हाँफता हुआ आया।
"सरपंच जी! ब्लॉक से बाबू जी भी आने वाले हैं। बोले हैं कि आवेदन ठीक से भरवाकर ही लौटेंगे।"
यह सुनते ही रंजीत के चेहरे पर मुस्कान लौट आई।
"अब कहाँ भागोगे बबलू ?"
बबलू ने मन ही मन भगवान को याद किया।
"हे प्रभु... आज तो सचमुच बड़ी परीक्षा है।"
बिंदिया ने तुरंत सरपंच से कहा—
"चाचा, एक बात कहूँ?"
"हाँ बेटी।"
"सरकारी कागज़ में गलती नहीं होनी चाहिए। अगर आप अनुमति दें तो मैं पहले सब लोगों को समझा दूँ कि कौन-कौन-सी जानकारी चाहिए। तब हमारे पति एक-एक का फ़ॉर्म जल्दी भर देंगे।"
सरपंच खुश हो उठे।
"वाह! यही तो पढ़े-लिखे लोगों की समझदारी होती है।"
रंजीत बीच में बोला—
"लेकिन फ़ॉर्म तो बबलू भैया ही भरेंगे न?"
बिंदिया मुस्कराई।
"क्यों नहीं ? हम तो सिर्फ़ लोगों को तैयार कर रहे हैं।"
रंजीत फिर चुप हो गया।
बिंदिया ने ऊँची आवाज़ में कहना शुरू किया—
" सब लोग ध्यान से सुनिए। जिसका फ़ॉर्म भरेगा, वह पहले अपना आधार कार्ड, जमीन का खाता नंबर और बैंक पासबुक तैयार रखे। जिसका कागज़ अधूरा होगा, उसका फ़ॉर्म बाद में भरेगा।"
सुनकर गाँव वाले तुरंत अपने-अपने घर भागने लगे। कोई पासबुक लेने दौड़ा...। कोई खतियान...। तो कोई आधार कार्ड।
कुछ ही मिनटों में पंचायत भवन आधा खाली हो गया।
बबलू ने राहत की साँस ली।
धीरे से बोला—
"तुमने तो आधी लड़ाई यहीं जीत ली।"
बिंदिया मुस्कराई—
"अभी आधी बाकी है।"
इसी बीच योगेश फिर बोल पड़ा—
"भाभी! अगर आधार कार्ड में फोटो अच्छा न हो तो नया फ़ॉर्म भरना पड़ेगा क्या?"
सुजीत हँसते हुए बोला—
"तुम्हारे फोटो में तो भगवान भी कुछ नहीं कर सकते।"
महेश भी कहाँ चुप रहने वाला था।
"अरे योगेश! पहले शादी कर लो, फिर फोटो की चिंता करना।"
योगेश मुँह फुलाकर बोला—
"सब लोग मिलकर गरीब आदमी का मज़ाक उड़ाते हैं।"
बिंदिया हँस पड़ी।
"चिंता मत करिए योगेश भैया... आपकी भी शादी होगी।"
बस इतना सुनना था कि योगेश खुशी से उछल पड़ा।
"सुना! भाभी बोले हैं। अब तो पक्का होगी!"
पूरी पंचायत एक बार फिर ठहाकों से गूँज उठी।
लेकिन उसी समय पंचायत भवन के बाहर एक मोटरसाइकिल आकर रुकी। खाकी रंग की फाइल हाथ में लिए वह ब्लॉक का कर्मचारी था।
रंजीत के चेहरे पर फिर मुस्कान फैल गई।
उसने मन ही मन कहा—
"अब असली खेल शुरू होगा...। "
और बबलू उसने पहली बार महसूस किया कि अब बचने का रास्ता पहले से कहीं कठिन होने वाला है।
ब्लॉक के कर्मचारी को देखकर सरपंच साहब आगे बढ़े।
"आइए बाबू साहब, आपका ही इंतज़ार था।"
कर्मचारी ने मुस्कराकर सबको नमस्कार किया।
"सभी किसान आ गए ?"
"जी, बस तैयारी चल रही है। हमारे गाँव का सबसे पढ़ा-लिखा लड़का बबलू सबका फ़ॉर्म भर रहा है।"
यह सुनकर कर्मचारी की निगाह बबलू पर पड़ी।
रंजीत की आँखों में फिर उम्मीद चमक उठी।
"अब बचो तो जानें । "
कर्मचारी ने फाइल खोलते हुए कहा—
"देखिए, सरकार का नया नियम है। किसी का भी आवेदन बिना सही जानकारी के स्वीकार नहीं होगा। नाम, खाता नंबर, बैंक विवरण—सब बिल्कुल सही होना चाहिए।"
बबलू मुस्कराया।
"यही तो हम भी गाँव वालों को समझा रहे हैं, बाबू साहब।"
कर्मचारी ने प्रभावित होकर सिर हिलाया।
तभी बिंदिया आगे बढ़ी।
"अगर अनुमति हो तो एक सुझाव दूँ ?"
"कहिए।"
" एक आदमी सबका फ़ॉर्म भरेगा तो शाम हो जाएगी। गाँव के जो लड़के पढ़े-लिखे हैं, उन्हें अलग-अलग मेज पर बैठा दिया जाए। सब अपना-अपना फ़ॉर्म भरवाएँगे। अंत में हमारे पति जी और आप मिलकर जाँच कर लीजिएगा। इससे काम जल्दी भी होगा और गलती भी नहीं होगी।"
कर्मचारी कुछ क्षण सोचता रहा।
फिर बोला—
"बहुत अच्छा सुझाव है।"
सरपंच तुरंत बोले—
"सुनो सब लोग! चार मेज लगाओ।"
कुछ ही देर में पंचायत भवन छोटे-से कार्यालय में बदल गया।
सुजीत एक मेज पर बैठ गया। योगेश दूसरी मेज पर। एक और पढ़ा लड़का तीसरी पर । और बिंदिया चौथी मेज संभालकर बैठ गई।
बबलू पूरे हाल में घूम-घूमकर व्यवस्था देखने लगा।
रंजीत का चेहरा उतरने लगा। जिस जाल में वह बबलू को फँसाना चाहता था, उसी जाल का रास्ता बिंदिया ने बदल दिया था। फिर भी उसने आख़िरी वार किया।
" बाबू साहब, आख़िरी जाँच तो बबलू भैया ही करेंगे न ?"
बबलू मुस्कराया।
"जाँच तो नियम के अनुसार अधिकारी ही करेंगे। हम तो बस गाँव वालों की मदद कर रहे हैं।"
ब्लॉक कर्मचारी ने तुरंत कहा—
"बिल्कुल सही। अंतिम सत्यापन हमारा काम है।"
रंजीत के होंठ सूख गए।
इधर हास्य का रंग भी कम न था।
योगेश एक बूढ़े किसान से पूछ रहा था—
"काका, मोबाइल नंबर ?"
काका बोले—
"मोबाइल तो पोता लेकर पंजाब चला गया है, उसका नंबर लिख दें?"
पूरा बरामदा हँसी से भर उठा।
उधर सुजीत एक किसान से बोला—
"Occupation?"
किसान घबरा गया।
"ई कौन बीमारी है डॉक्टर बाबू?"
महेश ठठाकर हँस पड़ा।
"अरे काका! काम-धंधा पूछ रहा है। बीमारी नहीं।"
एक और बूढ़ी अम्मा आई।
बिंदिया ने पूछा—
"अम्मा, हस्ताक्षर करेंगी या अंगूठा लगाएंगी?"
अम्मा बोली—
"बेटी, पढ़ना तो अब तुम सिखा रही हो। आज अंगूठा लगा देते हैं, अगले साल दस्तखत करेंगे।"
यह सुनकर बिंदिया की आँखें चमक उठीं। उसे लगा, उसकी रात्रि पाठशाला सचमुच रंग ला रही है।
करीब दो घंटे बाद सारे आवेदन तैयार हो चुके थे।
ब्लॉक कर्मचारी एक-एक फ़ॉर्म देखने लगा। सब सही था। कहीं कोई गलती नहीं थी।
उसने फाइल बंद की और सरपंच की ओर देखकर बोला—
"आपका गाँव भाग्यशाली है। यहाँ लोग मिल-जुलकर काम करते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि पढ़े-लिखे लोग केवल अपनी नौकरी नहीं देखते, पूरे गाँव का हाथ पकड़ते हैं।"
सरपंच साहब गर्व से बबलू और बिंदिया की ओर देखने लगे।
"बबलू बेटा...। "
सरपंच की आवाज़ भर्रा गई।
"आज तुम्हारे पिता जी होते तो कितना गर्व करते।"
बबलू कुछ क्षण चुप रहा।
उसने झुककर सरपंच के पैर छुए।
"चाचा, गाँव ने मुझे जितना सम्मान दिया है, उसका थोड़ा-सा कर्ज़ उतारने की कोशिश कर रहा हूँ।"
गाँव वाले तालियाँ बजाने लगे।
रंजीत अब एक शब्द भी नहीं बोल पा रहा था। उसकी सारी योजनाएँ एक-एक करके मिट्टी में मिल रही थीं।
दिनेश धीरे से उसके पास आया।
"भईया चलिए यहाँ से। "
रंजीत ने दाँत भींच लिए। फिर उसने दूर खड़े बबलू को घूरते हुए कहा—
"आज फिर बच गया। लेकिन हर बाज़ी हमेशा किस्मत नहीं जिताती।"
कहते हुए रंजीत एक तरफ अपने दोस्तों के साथ चला जाता है।
शाम ढल चुकी थी। अब पंचायत भवन खाली होने लगा था। सभी लोग अपने अपने घर को जा रहे थे।
बिंदिया और बबलू भी साथ-साथ घर लौट रहे थे।
रास्ते में बिंदिया मुस्कराकर बोली—
"आज तो आपकी साँस अटक गई थी।"
बबलू हँस पड़ा।
"साँस मेरी अटकी थी, मगर धड़कन तुम संभाल रही थीं।"
बिंदिया भी हँस दी।
"एक बात कहूँ ?"
"कहो।"
"आप झूठ बोलने में नहीं, लोगों का मन जीतने में माहिर हैं। इसलिए हर बार बच जाते हैं।"
बबलू कुछ पल चुप रहा। फिर धीमे स्वर में बोला—
" जिस दिन लोगों का भरोसा टूट गया, उसी दिन बबलू भी खत्म हो जाएगा। "
पहली बार उसके स्वर में हल्का-सा दर्द था।
बिंदिया ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में एक डर छिपा था। वह जानती थी हर दिन किस्मत साथ नहीं देती।
अब रात हो चुकी थी। अभी रंजीत अपने आँगन में चारपाई पर बैठा था। सामने लालटेन जल रही थी। दिनेश, मदन और किशन भी वहीं बैठे थे। आज सभी शांत थे। गांजा का कश भी नहीं लग रहा था।
अचानक रंजीत उठ खड़ा हुआ। उसकी आँखों में इस बार गुस्से से ज़्यादा ज़िद थी।
"अब गाँव में खेल नहीं होगा। ."
"मतलब ?" दिनेश ने पूछा।
"कल सुबह मैं पटना जा रहा हूँ।"
"क्यों ?"
" बबलू की पूरी ज़िंदगी खंगालने। कॉलेज... मोहल्ला... दोस्त... नौकरी... सब पता करूँगा।"
वह मुट्ठी भींचकर बोला—
" जिस अनपढ़ आदमी को पूरा गाँव विद्वान समझता है, उसका सच भी कहीं न कहीं ज़िंदा होगा। और जिस दिन वह सच मेरे हाथ लग गया ...... । "
वह क्षण भर रुका। फिर धीमे लेकिन कठोर स्वर में बोला—
" उस दिन मंझार गाँव की सबसे ऊँची चौपाल पर बबलू का नक़ाब मैं अपने हाथों से उतारूँगा।"
लालटेन की लौ हवा से अचानक तेज हो गई और उस तेज रोशनी में रंजीत के चेहरे पर उभरी प्रतिशोध की लकीरें साफ़ दिखाई देने लगीं।
क्रमशः आगे ......
📖 अगले अध्याय में पढ़िए...
रंजीत पटना पहुँचकर बबलू के अतीत की परतें खोलना शुरू करेगा।
क्या उसे बबलू के नकली प्रमाणपत्रों का सुराग मिलेगा ?
क्या बिंदिया का विश्वास पहली बार डगमगाएगा ?
या बबलू फिर अपनी बुद्धिमानी से नई बाज़ी पलट देगा ?
जानिए "बिंदिया और बबलू" के अध्याय 11 में।
यदि आपने अभी तक पीछे का बाकी अध्याय नहीं पढ़ा है तो उसे एक बार जरूर पढ़िए। बहुत ही प्यारी और मार्मिक कहानी है।
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