अंतिम सहारा: बेटे के इंतजार में तड़पते रहे बुजुर्ग माता-पिता, फिर घर में मिली सड़ी-गली लाश / antim-sahara-buzurg-mata-pita-ki-dard-bhari-sachchi-kahani
कहा जाता है कि माता-पिता अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी खपा देते हैं। अपने सपनों का गला घोंटकर उनके सपनों को पंख देते हैं। अपनी जरूरतों को मारकर उनकी जरूरतें पूरी करते हैं। उन्हें इस उम्मीद से पढ़ाते-लिखाते हैं कि जब उम्र की सांझ आएगी, जब शरीर जवाब देने लगेगा और कदम लड़खड़ाने लगेंगे, तब वही बच्चे उनका सहारा बनेंगे।
लेकिन बदलते समय में कुछ ऐसे भी माता-पिता हैं, जिनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच उनका अकेलापन बन चुका है। जिनके घरों में कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, आज वहां सन्नाटा बोलता है। जिन हाथों ने बच्चों को चलना सिखाया, वही हाथ बुढ़ापे में सहारे के लिए तरस जाते हैं।
यह कहानी केवल श्रीधर सिंह और सुरभि देवी की नहीं है, बल्कि उन लाखों बुजुर्ग माता-पिताओं की है, जो अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव में अपनों के होते हुए भी अपनों से दूर हैं। यह कहानी पढ़ते समय शायद आपकी आंखें नम हो जाएं, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि यह कहानी आपके दिल में एक सवाल जरूर छोड़ जाएगी।
अंतिम सहारा
✍️ किशोर
पटना शहर की चकाचौंध, चौड़ी सड़कों और ऊँची इमारतों के बीच एक ऐसा घर भी था, जहाँ जिंदगी धीरे-धीरे बुझ रही थी।
उस घर में रहते थे श्रीधर सिंह और उनकी पत्नी सुरभि देवी।
श्रीधर सिंह पटना सचिवालय से रिटायर्ड अधिकारी थे। उम्र अस्सी वर्ष के आसपास पहुँच चुकी थी। सफेद बाल, झुकी हुई कमर और आँखों पर मोटा चश्मा उनकी बढ़ती उम्र की गवाही देते थे।
पत्नी सुरभि देवी की उम्र पचहत्तर साल थी। पिछले दो वर्षों से वह गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। उनका अधिकांश समय बिस्तर पर ही बीतता था।
दोनों का एक ही बेटा था — मोहित।
मोहित पढ़ने में बहुत तेज था। श्रीधर सिंह ने अपनी सारी जमा-पूँजी, अपनी इच्छाएँ और अपने सपने बेटे की पढ़ाई पर खर्च कर दिए थे।
कई बार सुरभि देवी कहती थीं—
"इतना खर्च मत कीजिए जी। बुढ़ापे के लिए भी कुछ बचाकर रखिए।"
श्रीधर मुस्कुरा देते।
"हमारा बुढ़ापा हमारा बेटा संभालेगा सुरभि। बच्चे ही तो माँ-बाप की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं।"
समय बीतता गया।
मोहित इंजीनियर बना, नौकरी मिली और फिर अमेरिका चला गया।
वहीं नौकरी करते-करते उसने शादी भी कर ली।
शुरू-शुरू में वह नियमित फोन करता था। फिर सप्ताह में एक बार। उसके बाद महीने में एक बार।
अब कभी-कभी दो महीने भी गुजर जाते थे।
एक दिन सुरभि देवी उदास स्वर में बोलीं—
"मोहित को कहिए न, एक बार आ जाए। उसे देखे हुए तीन साल हो गए।"
श्रीधर ने मोबाइल उठाकर बेटे को फोन लगाया।
कई बार घंटी बजने के बाद कॉल उठी।
"हाँ पापा, बोलिए। मैं अभी मीटिंग में हूँ।"
"बेटा, तुम्हारी माँ तुम्हें बहुत याद कर रही है।"
"पापा, अभी छुट्टी मिलना मुश्किल है। अगले साल आने की कोशिश करूँगा।"
"अगले साल...?"
"हाँ पापा। अभी रखता हूँ।"
कॉल कट गई।
श्रीधर कुछ देर मोबाइल को देखते रहे।
उधर सुरभि देवी उम्मीद भरी नजरों से पूछ बैठीं—
"क्या कहा उसने?"
श्रीधर ने चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश की।
"बस... काम बहुत है। अगले साल आएगा।"
सुरभि देवी समझ गई थीं कि यह मुस्कान झूठी है।
लेकिन उन्होंने भी कुछ नहीं कहा।
पत्नी की देखभाल के लिए श्रीधर ने कई बार नौकरानियाँ रखीं।
मगर हर बार कोई न कोई सामान गायब होने लगता।
कभी पैसे, कभी गहने, कभी जरूरी दस्तावेज।
आखिरकार उन्होंने नौकरानी रखना छोड़ दिया।
अब अस्सी वर्ष का बूढ़ा आदमी खुद खाना बनाता, दवा देता, कपड़े धोता और पत्नी की सेवा करता।
कई बार रात में सुरभि देवी की तबीयत बिगड़ जाती।
श्रीधर पूरी रात जागकर उनके सिरहाने बैठे रहते।
एक रात सुरभि की आँखों में आँसू आ गए।
"जी, मैं आपके लिए बोझ बन गई हूँ।"
श्रीधर ने तुरंत उनका हाथ पकड़ लिया।
"ऐसा मत कहो सुरभि। पूरी जिंदगी तुमने मेरा साथ दिया है। अब मेरी बारी है।"
"अगर मैं पहले चली गई तो?"
"तो मैं भी ज्यादा दिन नहीं रहूँगा।"
"और अगर आप पहले चले गए तो?"
यह सुनकर श्रीधर कुछ क्षण चुप रहे।
फिर बोले—
"तब भगवान तुम्हारी रक्षा करेगा।"
लेकिन शायद भगवान भी उस दिन चुप रहने वाला था।
एक सुबह श्रीधर सिंह बाथरूम में गए।
सर्दियों का मौसम था।
फर्श पर हल्की नमी थी।
अचानक उनका पैर फिसल गया।
"धड़ाम...!"
उनका सिर दीवार से टकराया और फिर फर्श पर जा लगा।
सिर से खून बहने लगा।
उन्होंने उठने की कोशिश की।
"स... सुरभि..."
लेकिन आवाज कमजोर थी।
बिस्तर पर पड़ी सुरभि देवी ने आवाज सुनी।
"जी... क्या हुआ...?"
कोई उत्तर नहीं मिला।
उन्होंने फिर पुकारा—
"श्रीधर जी...!"
सन्नाटा।
घर में सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।
श्रीधर सिंह बाथरूम के फर्श पर पड़े-पड़े तड़पते रहे।
मदद के लिए कोई नहीं आया।
न बेटा।
न पड़ोसी।
न कोई रिश्तेदार।
कुछ घंटों बाद उनकी साँसें हमेशा के लिए थम गईं।
बिस्तर पर पड़ी सुरभि देवी को धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि कुछ अनर्थ हो गया है।
उन्होंने कई बार आवाज लगाई।
"श्रीधर जी..."
"सुन रहे हैं न..."
"मुझे पानी दे दीजिए..."
लेकिन अब जवाब देने वाला कोई नहीं था।
उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
कमरे की दीवारें उनकी पुकार सुन रही थीं।
लेकिन इंसान कोई नहीं था।
पहला दिन गुजर गया।
दूसरा दिन भी।
भूख और प्यास से उनका शरीर टूटने लगा।
वह बिस्तर से उठ भी नहीं सकती थीं।
तीसरे दिन उन्होंने भगवान की ओर देखते हुए कहा—
"हे प्रभु... अब मुझे भी अपने पास बुला लो।"
कुछ दिनों बाद उनकी साँसें भी थम गईं।
घर के अंदर अब मौत का सन्नाटा था।
दिन बीतते गए।
एक सप्ताह गुजर गया।
फिर घर के बाहर से दुर्गंध आने लगी।
पड़ोसियों ने पहले ध्यान नहीं दिया।
जब बदबू असहनीय हो गई तो पुलिस को सूचना दी गई।
पुलिस पहुँची।
दरवाजा अंदर से बंद था।
दरवाजा तोड़ा गया।
जैसे ही पुलिस अंदर दाखिल हुई, सभी के कदम ठिठक गए।
कमरे में सुरभि देवी की सड़ी-गली लाश बिस्तर पर पड़ी थी।
और बाथरूम में श्रीधर सिंह का शव पड़ा था।
पूरा घर मौत और अकेलेपन की गवाही दे रहा था।
एक पुलिसकर्मी की आँखें नम हो गईं।
वह धीमे स्वर में बोला—
"काश... किसी ने एक बार इनकी खबर ले ली होती।"
अमेरिका में बैठे मोहित को जब यह खबर मिली, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
वह दौड़ा-दौड़ा भारत आया।
माँ-बाप की तस्वीरों के सामने बैठकर फूट-फूटकर रोने लगा।
लेकिन अब उसके आँसू किसी काम के नहीं थे।
जिन हाथों ने उसे चलना सिखाया था, वे मिट्टी में मिल चुके थे।
जिन आँखों ने उसके लिए सपने देखे थे, वे हमेशा के लिए बंद हो चुकी थीं।
श्मशान घाट में दोनों की चिताएँ एक साथ जल रही थीं।
लपटें आसमान की ओर उठ रही थीं।
ऐसा लग रहा था जैसे वे समाज से एक सवाल पूछ रही हों—
"क्या माँ-बाप सिर्फ बच्चों को सफल बनाने के लिए पैदा होते हैं ?"
"क्या बुजुर्गों की जरूरत केवल तब तक है, जब तक वे कमाने की उम्र में हैं ?"
"और क्या एक सभ्य समाज की जिम्मेदारी सिर्फ सड़कें और इमारतें बनाना है, अपने बुजुर्गों की सुरक्षा नहीं ?"
आज हमारे देश में हजारों नहीं, लाखों श्रीधर और सुरभि जी रहे हैं।
कुछ बेटे विदेश में हैं।
कुछ अपने ही शहर में रहते हुए भी दूर हैं।
कुछ माता-पिता फोन की घंटी का इंतजार करते-करते बूढ़े हो जाते हैं।
यह कहानी केवल एक दंपति की मौत की कहानी नहीं है।
यह उस अकेलेपन की कहानी है जो धीरे-धीरे हमारे समाज को निगल रहा है।
यह उन बुजुर्ग आँखों की कहानी है जो अंतिम साँस तक अपने बच्चों के लौट आने की राह देखती रहती हैं।
और यह हम सबके लिए एक प्रश्न छोड़ जाती है—
यदि जीवन की सांझ में माता-पिता को अपने ही घर में अकेले मर जाना पड़े, तो आखिर विकास, सफलता और आधुनिकता का अर्थ क्या रह जाता है ?
💔 करुण संदेश
श्रीधर सिंह और सुरभि देवी की मौत सिर्फ दो इंसानों की मौत नहीं थी। यह उस भरोसे की मौत थी, जो हर माता-पिता अपने बच्चों पर करते हैं। यह उस उम्मीद की मौत थी, जो बुढ़ापे के सहारे के रूप में उनके दिल में जिंदा रहती है।
आज हम विकास, आधुनिकता और सफलता की बातें करते हैं, लेकिन अगर हमारे माता-पिता अपने ही घर में अकेलेपन और लाचारी से मर जाएं, तो हमारी सारी उपलब्धियां बेमानी हो जाती हैं।
बच्चों का फर्ज सिर्फ पैसे भेज देना नहीं होता, बल्कि समय देना, हालचाल पूछना और अपने माता-पिता को यह एहसास कराना भी होता है कि वे अकेले नहीं हैं। क्योंकि जिस दिन माता-पिता इस दुनिया से चले जाते हैं, उस दिन पछतावे के आंसू तो बहते हैं, लेकिन उन्हें पोंछने के लिए वे हाथ कभी वापस नहीं आते।
याद रखिए-
"माता-पिता की जरूरत हमें बचपन में होती है, लेकिन बुढ़ापे में उन्हें हमारी जरूरत उससे कहीं ज्यादा होती है।"
अगर आपके माता-पिता जीवित हैं, तो आज ही उन्हें फोन कीजिए, उनसे बात कीजिए। क्योंकि कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनकी कीमत उनके चले जाने के बाद समझ आती है, और तब बहुत देर हो चुकी होती है। ❤️🙏
🫸बुजुर्ग मां की एक और मार्मिक कहानी🫷
एक विधवा मां का इकलौता बेटा नौकरी लगते ही शहर चला जाता है और शहर का ही बनकर रह जाता है। बस कभी कभार मोबाइल पर बात कर लेता था। मगर कुछ ही दिनोंके बाद धीरे धीरे वह भी बंद के देता है। आख़िरकार बेचारी बुढ़ी मां बेटे के वियोग में मर जाती है। आप इस मार्मिक कहानी को एक बार जरूर पढ़िए।
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बहुत ही मार्मिक कहानी। हमें अपने माता पिता का सम्मान करना चाहिए।
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद
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