मुझे भी पढ़ाओ: एक गरीब बेटी की मार्मिक पुकार / mujhe-bhi-padhao-hindi-poem-education-equality








             क्या इस देश में सपने भी अमीरी-गरीबी देखकर दिए जाते हैं ?
क्या एक गरीब की बेटी का भविष्य सिर्फ इसलिए अंधेरे में रह जाए, क्योंकि उसके पास पैसे नहीं हैं ?

            यह कविता किसी एक लड़की की कहानी नहीं है—यह उन लाखों मासूम आंखों की पुकार है, जो किताबों के बजाय कूड़े के ढेर में अपना बचपन ढूंढती हैं।
           यह एक सवाल है समाज से, व्यवस्था से, और हम सब से—
कि जब अधिकार सबके लिए बराबर हैं, तो फिर शिक्षा क्यों नहीं ?

             “मुझे भी पढ़ाओ”  सिर्फ एक कविता नहीं, एक आवाज़ है—

         जो दिल को झकझोर देती है और सोचने पर मजबूर कर देती है।







             ✨ मुझे भी पढ़ाओ

                                  ✍️   किशोर 



मैं भी इस धरा की संतान हूं,
मेरा भी इस देश में अधिकार है,
फिर क्यों सीमित मेरे सपनों का आकाश,
जब सबके लिए खुला यह संसार है ?
मुझे भी पढ़ाओ…

हक मेरा भी उतना ही है,
जितना ऊँची दीवारों में पलने वालों का,
बस फर्क इतना सा है कि
मैं एक गरीब की बेटी हूं,
और वो अमीर की—
पर अधिकार तो समता का ही है,
फिर मुझे भी पढ़ाओ…

कब तक यूं कूड़े के ढेरों में
मैं अपनी किस्मत तलाशूंगी ?
कब तक भूखे पेट हर रात
अधूरे ख्वाबों संग सो जाऊंगी ?
इन अंधेरों से निकालो मुझे,
ज्ञान की एक लौ जलाओ,
मुझे भी पढ़ाओ…

देखो, मेरा भी मन करता है
नए कपड़ों में खुद को सजा लूं,
मुलायम बिस्तर पर सुकून से
मीठे सपनों में खो जाऊं,
पक्का घर, भरपेट भोजन—
बस यही छोटी-सी चाहत है,
इन ख्वाहिशों को पंख लगाओ,
मुझे भी पढ़ाओ…

मेरे भी अरमान हैं अनगिनत,
मैं भी खुले गगन में उड़ना चाहती हूं,
अपने पंखों से बादलों को छूकर
नई कहानी गढ़ना चाहती हूं,
मेरी उड़ान को राह दिखाओ,
मेरे सपनों को साकार बनाओ,
बस मुझे भी पढ़ाओ…




                  💔 दमदार संदेश 


                  किसी भी देश की असली तरक्की उसके ऊंचे भवनों से नहीं,
बल्कि उसके बच्चों के सपनों से मापी जाती है।

जब तक एक भी बच्चा शिक्षा से वंचित है,
तब तक हमारा विकास अधूरा है।

आज जरूरत है सिर्फ सहानुभूति की नहीं,
बल्कि एक छोटे से कदम की—
किसी एक बच्चे को पढ़ाने की,
किसी एक सपने को सच करने की।

क्योंकि शायद आपकी एक कोशिश…
किसी की पूरी जिंदगी बदल सकती है।

 आइए, हम सब मिलकर हर उस आवाज को ताकत दे जो कहती है - 

                 मुझे भी पढ़ाओ ...




  🫸 एक लाचार गरीब की दूसरी कविता 🫷



              बेचारा एक गरीब इंसान जैसे तैसे फेंका हुआ या किसी का दिया हुआ खाना खा कर किसी तरह अपना जीवन गुजरता है। वही दूसरी तरह पैसों वाले लोग अपनी दिखावे के लिए वेवजह खाना बर्बाद करते रहते हैं। आखिर ऐसा क्यों ? आप भी इस मार्मिक कविता को एक बार जरूर पढ़िए और महसूस कीजिए इस दर्द को। 

                  कविता पढ़ने के लिए नीचे लिखे कविता के टाईटल पर क्लिक कीजिए -  



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