साहब, सिर्फ बेरोजगार हूं मैं | एक बेरोजगार की दर्द भरी सच्ची कविता | sahab-sirf -berojgar -hoon -mai -hindi -poem
कहते हैं मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती…
लेकिन क्या हर मेहनती इंसान को सच में उसका हक मिलता है?
यह कविता सिर्फ एक इंसान की नहीं,
बल्कि उन लाखों युवाओं की है,
जो डिग्री हाथ में लिए, उम्मीद आंखों में लिए,
दर-दर भटक रहे हैं…
जिन्होंने कभी बेईमानी का रास्ता नहीं चुना,
पर आज वही सबसे पीछे खड़े हैं।
ताने, जिल्लत, और अपनों की बदलती नजरों के बीच,
एक सवाल हर दिन दिल को चीरता है —
क्या ईमानदार होना ही सबसे बड़ी गलती है ?
ये सिर्फ शब्द नहीं हैं…
ये एक बेरोजगार के टूटते आत्मसम्मान की आवाज़ है।
🔥 साहब, सिर्फ बेरोजगार हूं मैं
✍️ किशोर
दुनिया की नज़र में सबसे निकम्मा,
सड़कछाप सा एक किरदार हूं मैं,
घर की चौखट भी ताने देती है,
साहब… सिर्फ बेरोजगार हूं मैं।
पहले मां-बाप की आंखों में सवाल था,
अब बीवी की बातों में तिरस्कार हूं मैं,
किसे समझाऊं अपने हालात की दास्तां,
हर जुबां पर बस — बेकार हूं मैं।
कोई छल से, कोई लूट से अमीर हो गया,
हर ओर फैला ये व्यापार हूं मैं,
ना बेईमानी सीखी, ना झूठ का सहारा लिया,
शायद इसी का हकदार हूं मैं।
स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी में नाम रहा,
हर जगह अव्वल, होशियार हूं मैं,
फिर भी हाथों में खालीपन ही आया,
किस किस्मत का शिकार हूं मैं।
किसे दोष दूं — नसीब को, या इस व्यवस्था को,
हर ओर बिखरा भ्रष्टाचार हूं मैं,
मेरी आवाज़ सुनता है यहां कौन,
भीड़ में दबा एक पुकार हूं मैं।
मेहनत की रोटी कमाने का सपना था,
ईमानदारी ही मेरा श्रृंगार हूं मैं,
मगर इस दुनिया को रास नहीं आई सच्चाई,
इसलिए आज लाचार हूं मैं।
घूस देकर मुझसे कम काबिल लोग,
आज बन बैठे अधिकारी हैं,
मैंने अपने ज़मीर को बेचा नहीं,
बस इसलिए गुनहगार हूं मैं।
मेरा दर्द किसी को दिखता ही नहीं,
हर चेहरे के पीछे दीवार हूं मैं,
ना चोर हूं, ना चौकीदार कोई,
साहब… सिर्फ बेरोजगार हूं मैं।
💔 निकम्मा संदेश
इस दुनिया में लोग अक्सर कामयाबी को ही इंसान की कीमत मान लेते हैं,
लेकिन कोई यह नहीं समझता कि
हर बेरोजगार इंसान निकम्मा नहीं होता…
कई बार वो हालात का मारा होता है,
कभी सिस्टम का शिकार,
तो कभी अपनी ही ईमानदारी का क़ैदी।
याद रखना —
बेरोजगार होना गुनाह नहीं है,
लेकिन किसी के संघर्ष का मज़ाक उड़ाना जरूर गुनाह है।
अगर आप भी ऐसे किसी इंसान को जानते हैं,
तो उसे ताने मत दीजिए…
बल्कि उसका हौसला बनिए।
क्योंकि टूटता हुआ इंसान अगर एक बार संभल गया,
तो वही सबसे मजबूत बनकर उभरता है।
🫸 बेरोजगारी पर एक और कविता 🫷
यह कविता भी एक ईमानदार बेरोजगार इंसान के तड़पते हुई घायल दिल की एक कराहती हुई टीस है। वह नेता बनना चाहता था, मग़र राजनीति आज जाति, पैसा और पॉवर के जेब की रखैल बन गई है जिसके कारण वह लाचार था। पढ़िए एक बेरोजगार इंसान के तड़पते हुए हृदय की करुण पुकार की कविता।
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