अनसुनी चीख: एक मासूम की खामोशी की दर्दनाक कहानी / ansuni-cheekh-hindi-emotional-story







कहते हैं, चीखें हमेशा सुनाई देती हैं…
लेकिन कुछ चीखें ऐसी होती हैं, जो आवाज़ नहीं करतीं —
फिर भी इंसान को अंदर से तोड़ देती हैं।

यह कहानी है एक ऐसी मासूम बच्ची की…
जिसने कुछ ऐसा देख लिया, जिसे कोई भी बच्चा कभी नहीं देखना चाहिए।

उस दिन वो स्कूल से लौटी तो थी…
लेकिन उसका बचपन वहीं कहीं पीछे छूट गया था।

उसकी आंखें खुली थीं,
पर वो कुछ बोल नहीं पा रही थी…

क्योंकि उसकी चीख —
अब आवाज़ नहीं,
खामोशी बन चुकी थी…







                  🌑 अनसुनी चीख

                                        ✍️  किशोर 



                     घर के मुख्य द्वार पर खड़ी शोभा बार-बार भीतर झांकती और फिर अपने मोबाइल की स्क्रीन पर समय देख लेती। उसके चेहरे पर एक हल्की सी बेचैनी थी। वह मां बनने वाली थी और आज उसे अपने नियमित जांच के लिए डॉक्टर शीतल प्रसाद के पास जाना था। समय सुबह के ग्यारह बजे का था, और वह अपने पति पवन का इंतजार कर रही थी।

पवन अभी तक कमरे में तैयार होने में लगे थे, जबकि शोभा कब से सजी-धजी दरवाजे पर खड़ी थी।

“जल्दी चलिए न… दस बज गए। एक बजे से पहले लौटना भी है, कृति स्कूल से आ जाएगी,”
शोभा ने झुंझलाहट भरे स्वर में कहा।

पवन ने मुस्कराते हुए शर्ट के बटन लगाते हुए जवाब दिया,
“आ रहा हूं मैडम जी… बस दो मिनट। वैसे डॉक्टर से मिलने की इतनी जल्दी नहीं है, जितनी यह जानने की कि इस बार बेटा होगा या नहीं।”

शोभा ने हल्की नाराजगी से कहा,
“ऐसी कोई बात नहीं है। मेरे लिए बेटी और बेटा एक समान हैं… मेरी कृति क्या किसी बेटे से कम है?”

पवन ने हंसते हुए कहा,
“अरे, मजाक कर रहा था। काश हर मां की सोच तुम्हारी जैसी हो जाए…”

कुछ ही देर में दोनों घर में ताला लगाकर बाइक से डॉक्टर के पास निकल पड़े।

पवन और शोभा की आठ साल की बेटी थी — कृति। चंचल, बातूनी और मासूम कृति उस समय स्कूल में थी।

डॉक्टर से मिलकर जब वे समय पर घर लौटे, तो शोभा के चेहरे पर संतोष और खुशी साफ झलक रही थी। वह रसोई में जाकर जल्दी-जल्दी दोपहर का भोजन बनाने लगी।

ठीक एक बजे, जैसे रोज होता था, कृति स्कूल से घर लौटी…
लेकिन आज कुछ अलग था।

आज वह न तो चहकी, न दौड़ी, न मुस्कराई।

उसके चेहरे पर एक अजीब सी खामोशी थी — जैसे भीतर कोई तूफान उमड़ रहा हो।

वह बिना किसी से कुछ कहे अपना बैग सोफे पर रखकर चुपचाप अपने कमरे में चली गई।

कमरे में जाकर वह धीरे से बिस्तर पर लेट गई और छत को अपलक निहारने लगी।
उसकी आंखें खुली थीं, पर जैसे वह कुछ देख ही नहीं रही थी… या शायद बहुत कुछ देख रही थी।

उसके भीतर कोई ऐसा दृश्य बार-बार कौंध रहा था, जिसने उसके बचपन की मासूमियत को झकझोर दिया था।

वह चीखना चाहती थी…
रोना चाहती थी…
लेकिन आवाज जैसे उसके भीतर कहीं कैद हो गई थी।

जब काफी देर तक उसकी कोई आवाज नहीं आई, तो शोभा बेचैन हो उठी।
वह उसके कमरे में पहुंची… और उसे इस तरह जड़वत लेटा देख घबरा गई।

“कृति… क्या हुआ बेटा?”
उसने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा।

कोई जवाब नहीं।

जब शोभा ने उसे उठाने की कोशिश की, तभी अचानक कृति जोर से चीख पड़ी—

“नहीं…!!!”

उसकी चीख ने पूरे घर की खामोशी को चीर दिया।

रात भर यही सिलसिला चलता रहा।

कभी कृति शांत…
तो कभी अचानक डर से कांपती हुई चीख पड़ती।

मां-बाप उसकी एक आवाज सुनने के लिए तरस रहे थे,
लेकिन उसकी खामोशी किसी गहरी खाई की तरह थी — जिसमें हर शब्द गिरकर खो जा रहा था।

सुबह जब अखबार आया, तो पवन की नजर एक खबर पर टिक गई—

पांचवीं कक्षा की छात्रा की लाश स्कूल के बाथरूम में मिली… दुष्कर्म की आशंका।”

वह छात्रा कोई और नहीं, कृति की सबसे प्यारी दोस्त — तनु थी।

यह पढ़ते ही जैसे सब कुछ साफ हो गया।

कृति ने…
शायद सब कुछ अपनी आंखों से देखा था।

वह दृश्य, वह भय, वह दरिंदगी —
उसके मासूम मन पर ऐसे अंकित हो गया था कि उसकी आत्मा तक कांप उठी थी।

उस दिन पवन और शोभा को पहली बार समझ आया—

कभी-कभी चीखें सुनाई नहीं देतीं…
वे खामोशी बनकर भीतर ही भीतर इंसान को तोड़ देती हैं।


कृति की खामोशी…
उसकी “अनसुनी चीख”
सिर्फ उसकी नहीं थी।

वह उन तमाम मासूम बच्चियों की आवाज थी,
जो डर, समाज और दरिंदगी के साए में
जीते जी मरने को मजबूर हैं।





              🙏  ममतामई संदेश 


  आज कृति की खामोशी सिर्फ एक बच्ची की कहानी नहीं है…
यह उस समाज का सच है,
जहां बेटियां अब घर में ही नहीं, स्कूल में भी सुरक्षित नहीं रहीं।

हम हर बार मोमबत्तियां जलाते हैं,
न्याय की बातें करते हैं…
लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है —
कि उस मासूम के मन में जो डर बैठ गया,
उसका न्याय कौन करेगा?

कितनी “कृतियां” आज भी हमारे आसपास हैं,
जो बोलना चाहती हैं…
पर डर के कारण चुप हैं।

जरूरत सिर्फ कानून की नहीं,
जरूरत है हमारी सोच बदलने की…
हमारी जिम्मेदारी समझने की…

क्योंकि जब तक हर चीख सुनी नहीं जाएगी,
तब तक हर खामोशी
एक नई त्रासदी को जन्म देती रहेगी।

अब फैसला हमें करना है —
हम बहरे बनकर जीना चाहते हैं…
या किसी कृति की आवाज बनना चाहते हैं।






   🫸  डर की एक और दूसरी कहानी 🫷



 

  डर की यह दूसरी कहानी भी बहुत ही मार्मिक है। यह किसी एक परिवार की कहानी नहीं आज भारत के लगभग हरेक शहर में कमोबेश यही स्थिति है। औरतें और लड़कियां डर के साए में जीने को विवश हैं। आप इस मार्मिक कहानी को एक बार जरूर पढ़िए। 

            कहानी पढ़ने के लिए नीचे लिखे कहानी के टाईटल पर क्लिक कीजिए -

      💅 डर का शहर    




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