💖 दीवान-ए-किशोरवाणी
– एक एहसासों का सफर
कभी कुछ जज़्बात इतने गहरे होते हैं कि उन्हें कहने के लिए शब्द भी कम पड़ जाते हैं…
और कभी वही जज़्बात ग़ज़ल बनकर काग़ज़ पर उतर आते हैं।
"दीवान-ए-किशोरवाणी" सिर्फ 10 ग़ज़लों का संग्रह नहीं, बल्कि दिल के उन अनकहे हिस्सों की आवाज़ है—
जो खामोश रहकर भी बहुत कुछ कह जाते हैं।
इन ग़ज़लों में कहीं अधूरी मोहब्बत की टीस है,
तो कहीं बिछड़ने का दर्द…
कहीं उम्मीद की हल्की सी रोशनी है,
तो कहीं तन्हाई की गहरी रात।
ये लफ्ज़ सिर्फ पढ़े नहीं जाते…
महसूस किए जाते हैं।
और शायद… कहीं न कहीं, ये आपकी अपनी कहानी भी बन जाएं।
💘 10 ग़ज़लों का संग्रह 💘
✨ ग़ज़ल 1 – इकरार का दिन
मत पूछो हाल-ए-दिल मेरा,
ये इज़हार का दिन आया है।
खामोश लबों की बस्ती में,
धड़कनों ने शोर मचाया है।
आँखों में जो थे ख्वाब छुपे,
आज उन्हें सजने दो ज़रा।
तेरी यादों की महफ़िल में,
दिल को बहकने दो ज़रा।
लब खामोश सही लेकिन,
साँसों में तेरी सरगम है।
हर धड़कन ये कहती है,
तू ही मेरा मरहम है।
फूलों ने राहें थाम लीं,
हवाओं ने गीत सुनाए हैं।
तेरी बाँहों की छाँव तले,
आज सारे ग़म पराए हैं।
चाँद भी ठहरा सा लगता है,
सितारों की उस महफ़िल में।
तेरे हुस्न का नूर समाया,
मेरे हर इक हासिल में।
ज़िन्दगी की हर मुश्किल अब,
आसान सी हो जाती है।
जब तेरी मोहब्बत की खुशबू,
मेरे दिल को छू जाती है।
ये दिन है सिर्फ़ इश्क़ का,
ये दिन है दिल के करार का।
तेरी मोहब्बत में खो जाने,
तेरे संग हर इकरार का।
मत पूछो हाल-ए-दिल मेरा,
ये इकरार का दिन आया है।
आज तेरी आँखों में मैंने,
अपना जहाँ बसाया है।
✨ ग़ज़ल 2 – वजह तुम थी
सच कहूँ, पहले कभी मैं इतना ख़ुश न था,
आज मेरी हर मुस्कान की वजह तुम थी।
मैं तो जीना ही कहीं भूल-सा गया था,
अब जो जीने की तमन्ना है—वजह तुम थी।
लोग कहते थे, मैं पहले यूँ महका न था,
क्या बताऊँ, उस बदलाव की वजह तुम थी।
तेरे आने से बहारों ने घर कर लिया,
इस वीरान से दिल की हर सुबह तुम थी।
ख़्वाब में भी जिसे सोचने की हिम्मत न हुई,
आज मेरी हर हसरत की वजह तुम थी।
अब जो तन्हाई में अश्कों का सिलसिला है,
उस हर एक टूटे लम्हे की वजह तुम थी।
लोग पूछें जो मेरी उदासी का सबब,
कैसे कह दूँ कि मेरी हर सज़ा तुम थी।
तेरे संग बीते हुए पल भुलाए न गए,
अब मेरी इस तन्हाई की वजह तुम थी।
मैं आज भी रब से तेरी ख़ुशी माँगता हूँ,
मेरी हर दुआ, मेरी हर अदा—वजह तुम थी।
✨ ग़ज़ल 3 – चेहरा उसका
हर चेहरे में ढूँढा मैंने चेहरा उसका,
किस्मत ने मगर कब दिखाया चेहरा उसका।
हर हूर में देखा, हर इक नूर में ढूँढा,
फिर भी न कहीं मिल सका वो चेहरा उसका।
मैं कितना अजब हाल में रहता हूँ ये सोचकर,
देखा ही नहीं फिर भी बसाया चेहरा उसका।
हर ख़्वाब में आता है वो बनकर इक उजाला,
नींदों में चमक जाता है जैसे चेहरा उसका।
ऐ रब मेरी तन्हाई पे इतना तो करम कर,
बस ख़्वाब में इक बार दिखा दे चेहरा उसका।
जीना भी करूँगा मैं खुशी से इसी दम,
गर आँखों ने इक बार निहारा चेहरा उसका।
किशोर भी उसी आस में जीता ही रहेगा,
किस रोज़ मुकद्दर में हो आए चेहरा उसका।
देखा ही नहीं फिर भी बसाया है दिल में,
कैसी है मोहब्बत कि बस चेहरा उसका।
✨ ग़ज़ल 4 – हाले दिल तुमसे क्या कहूं
गुमसुम-सा उदास रहता हूँ मैं,
हाले-दिल तुमसे क्या कहूँ।
ज़िंदगी से जैसे थक गया हूँ मैं,
आख़िर और कितना ग़म सहूँ।
दिल में उसकी यादों का मेला है,
उन्हें भुलाकर भी कैसे रहूँ।
जी चाहता है मिट जाऊँ दुनिया से,
पर मौत को भी गले कैसे लगाऊँ।
दिल में उसकी तस्वीर बसी है अब तक,
शायद अगले जनम में उसे पा सकूँ।
भूलना भी चाहूँ तो भूल न पाऊँ,
और बिन उसके चैन से जी भी न सकूँ।
ये “किशोर” कैसा मुकद्दर पाया है,
हाले-दिल तुमसे क्या कहूँ।
✨ ग़ज़ल 5 - तेरी सूरत का नशा
तेरी सूरत को जो देखूँ, नशा छा जाता है,
बिन पिए ही दिल-ओ-जां पर नशा छा जाता है।
कजरारे नयन तेरे जैसे कोई तीखी कटार,
देखते ही मेरे दिल पर नशा छा जाता है।
मिसरी सी मधुर तेरी वाणी की जब धुन सुनूँ,
रोम-रोम मेरे तन पर नशा छा जाता है।
रेशमी जुल्फें जो चेहरे पे बिखर जाती हैं,
उस हसीं मंजर के संग ही नशा छा जाता है।
पायलें रुनझुन करें जब तू करीब आ जाए,
तेरे हर कोमल स्पर्श से नशा छा जाता है।
तेरे तेवर भी निराले, कभी रूठे कभी हँसे,
तेरी हर अदा को देखूँ नशा छा जाता है।
मेरे जीवन के सभी दुख भी सिमट जाते हैं,
तेरी बाहों में जो आऊँ नशा छा जाता है।
✨ ग़ज़ल 6 - अंजान शहर का अकेला मुसाफिर
अंजान शहर की गलियों में भटकता एक मुसाफ़िर था मैं,
हर मोड़ पर अपनी ही परछाइयों से मुख़ातिब था मैं।
न मंज़िल का पता, न रास्तों का कोई यक़ीं,
भीड़ के समंदर में डूबता हुआ साहिल था मैं।
फिर यूँ हुआ कि एक नज़र ने दस्तक दी दिल पर,
सूनी सी दुनिया में जैसे उतर आया काफ़िल था मैं।
आँखों की ख़ामोशी ने जो दास्ताँ लिखी उस पल,
लब ख़ामोश रहे मगर भीतर से क़ाबिल था मैं।
ख़्वाबों ने रंग भरे थे आने वाली सुबहों में,
सोचा था अब मुकम्मल अपनी हर महफ़िल था मैं।
पर नसीब की तहों में कुछ और ही लिखा था,
उसकी राहों से जुदा होकर फिर मायूस दिल था मैं।
वो चली गई तो शहर फिर अजनबी सा लगने लगा,
कल भी तन्हा था, आज भी वही साहिल था मैं।
✨ ग़ज़ल 7 - साजन की राह में विरहन
साजन बिन अब रात मुझे नींद न आए,
यादों का कोई ज़ख़्म मुझे यूँ सताए न आए।
हफ़्ते भी गुज़र गए, महीने भी गुज़र गए,
फिर भी मेरी राह में साजन नज़र न आए।
कहते थे कि दो-चार महीनों में आऊँगा,
ऐसा भी कोई वादा कोई निभाए न आए।
चौखट पे नज़र टिकाए बैठी हूँ मैं कब से,
दिल को कोई उम्मीद नई दिखाए न आए।
ऐ रब! मेरे साजन को हर बुरी नज़र से बचाना,
कहीं और कोई दिल में घर बनाए न आए।
दिन-रात तेरी याद मुझे चैन कहाँ लेने दे,
विरह की ये अग्नि मुझे यूँ रुलाए न आए।
सपनों में कभी आकर मेरा हाल तो पूछो,
क्या जाने कि फिर ऐसा अवसर बुलाए न आए।
सूनी पड़ी है सेज, उदास पड़ा है आँगन,
तेरे बिना कोई भी मौसम सजाए न आए।
जल्दी से लौट आओ अब मेरे प्रिय साजन,
तेरे बिन ये जीवन कहीं टूट न जाए।
किशोर तेरी राह में बैठी है विरहन बनकर,
क्या जाने वो लौटें भी या फिर न आए।
✨ ग़ज़ल 8 - चलो चांद के पार चलें
इस ज़ालिम दुनिया की हलचल से दूर,
चलो कहीं सुकून की छाँव तले चलें—
जहाँ दर्द की कोई परछाईं न हो,
आओ, चाँद के पार चलें।
विशाल नीले गगन की बाहों में,
स्वच्छंद सपनों के आसमाँ तले,
प्यार के कुछ निर्मल, अनमोल पल जी लें—
आओ, चाँद के पार चलें।
जहाँ न हो किसी के मन में जलन,
न हो भय का कोई अँधेरा,
उन्मुक्त पंछी बन, खुले गगन में उड़ें—
आओ, चाँद के पार चलें।
यहाँ किस पर अब यक़ीन करें,
जब अपने ही चेहरे बेगाने लगें,
टूटे दिल और कुंठित मन को लेकर—
आओ, चाँद के पार चलें।
एक नई दुनिया फिर से बसाएँ,
प्रेम के अंकुर दिलों में उगाएँ,
मिलकर एक नई सृष्टि रचें—
आओ, चाँद के पार चलें।
जहाँ प्रेम हर कण में रचा-बसा हो,
जहाँ द्वेष का कोई नामोनिशान न हो,
जहाँ इंसानियत हर रूह में बसती हो—
आओ, चाँद के पार चलें।
✨ ग़ज़ल 9 - विरहन की पुकार
साजन साजन रटते रटते, मैं बन गई ऐसी विरहन,
बिन साजन अब नींद न आए, क्या करूं मैं भगवन।
हफ्ते गुजरे, महीने गुजरे, अब बीत गया पूरा साल,
फिर भी साजन आए नहीं, मैं देखती रह गई राह।
कह गए थे दो चार महीने, बाद ही मैं घर आऊंगा,
पर इतने निर्दय निष्ठुर होंगे, मैं तो कभी समझी न।
हे भगवन मेरे साजन को, तू बुरी नजरों से बचाना,
उन्हें सौतन न मिल जाए, यही सोच डर लगता है।
मैं ही पागल थी जो उनके, संग परदेस गई नहीं,
घर वापस बुलाने का अब, जल्दी कोई यत्न करूं।
दिन-रात उनकी यादें, मुझे चैन से जीने नहीं देती,
यही हाल रहा मेरे साजन, तो मैं पगली बन जाऊंगी।
जल्दी घर आ जाओ, तेरे वियोग में दम घुट रहा है,
बस जिंदा हूं मेरे साजन, तेरी एक झलक के लिए।
साजन साजन रटते रटते, मैं बन गई ऐसी विरहन,
बिन साजन अब नींद न आए, क्या करूं मैं भगवन।
✨ ग़ज़ल 10 - तुम्हें नज़र न लगे
नज़र को नज़र की नज़र न लगे,
कोई अच्छा भी इस क़दर न लगे।
तुम्हें देखा है मैंने उस नज़र से,
जिस नज़र से तुम्हें नज़र न लगे।
तेरी आँखों में एक जहाँ बसता है,
मगर उस जहाँ को ख़बर न लगे।
तेरे लफ़्ज़ों में है कोई जादू सा,
दिल सुने और फिर सफ़र न लगे।
तेरे होने से महक उठती हैं राहें,
बिन तेरे ये कोई शहर न लगे।
तेरी मुस्कान का असर ऐसा है,
ग़म भी आए तो वो असर न लगे।
तेरे ख्यालों में खोया रहता हूँ,
अब तो खुद का भी मुझको डर न लगे।
तू मिले तो ये जिंदगी लगती है,
वरना जीना भी कुछ हुनर न लगे।
तू ही मंज़िल, तू ही मेरा रास्ता,
तेरे बिना कोई भी डगर न लगे।
तेरे इश्क़ में इतना डूबा हूँ मैं,
अब किसी और की नज़र न लगे।
हर ग़ज़ल अपने साथ एक एहसास छोड़ जाती है—
कभी मुस्कान, कभी आँसू… और कभी एक गहरी सोच।
"दीवान-ए-किशोरवाणी" की ये 10 ग़ज़लें
शायद आपके दिल के किसी कोने को छू जाएं,
या फिर उन जज़्बातों को आवाज़ दे जाएं
जिन्हें आपने कभी खुद से भी छुपा रखा था।
अगर इन लफ्ज़ों में आपको अपना अक्स दिखे,
तो समझ लीजिए…
ये ग़ज़लें सिर्फ मेरी नहीं रहीं,
अब ये आपकी भी हो चुकी हैं।
क्योंकि असली शायरी वही होती है,
जो किसी एक की नहीं…
हर किसी की कहानी बन जाए।
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