वो गांव… जो अब भी बुलाता है | गांव vs शहर की दिल छू लेने वाली कहानी / vo-gaov-jo-ab-bhi-bulata-hai
शहर की ऊँची-ऊँची इमारतों के बीच रहते-रहते हम अक्सर भूल जाते हैं कि हमारी जड़ें कहाँ हैं।
हमारे पास सब कुछ होता है—सुविधाएं, पैसा, भागती हुई ज़िंदगी…
लेकिन फिर भी कहीं न कहीं एक खालीपन हमेशा साथ चलता है।
कभी किसी शाम, जब हम अकेले बैठते हैं…
तो अचानक याद आता है—वो कच्ची सड़कें, वो खेतों की खुशबू, वो बेफिक्र बचपन…
और एक आवाज़, जो आज भी दिल के किसी कोने से पुकारती है—
“लौट आओ… गांव तुम्हें आज भी याद करता है।”
यह कहानी सिर्फ एक इंसान की नहीं,
बल्कि उन लाखों लोगों की है…
जो शहर में रहते तो हैं,
लेकिन उनका दिल आज भी गांव में ही बसता है।
वो गांव… जो अब भी बुलाता है
✍️ किशोर
मैं पिछले अठारह वर्षों से अपने गांव को छोड़कर पटना में रह रहा हूँ।
पहले साल में दो-तीन बार गांव चला भी जाता था, लेकिन अब तो कभी-कभार ही जाना हो पाता है—जैसे कोई भूली हुई याद अचानक रास्ता भटककर सामने आ जाए।
मेरे जैसे न जाने कितने लोग हैं, जो एक बार गांव से निकले तो फिर शहर की चकाचौंध में ऐसे उलझे कि लौटने का रास्ता ही भूल गए।
शायद यही वजह है कि आजकल गांवों से ज्यादा भीड़ शहरों में बसने लगी है।
पटना में जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ पहले चार मंज़िला अपार्टमेंट हुआ करते थे।
धीरे-धीरे वे सात मंज़िल के हुए, और अब बारह मंज़िल तक पहुँच गए हैं।
एक-एक सोसाइटी में तीन सौ फ्लैट—यानी तीन सौ घरों का एक कृत्रिम गांव।
और मेरे असली गांव में आज भी कुल दो सौ घर हैं।
शहर का यह अपार्टमेंट-कल्चर बड़ा अजीब होता है—
दीवारें पास होती हैं, पर दिलों के बीच दूरी बहुत होती है।
पड़ोसी का नाम तक पता नहीं होता,
जबकि गांव में लोग न सिर्फ नाम जानते थे, बल्कि रिश्तों की गहराई भी पहचानते थे।
शहर में कहने को तो अपने बहुत होते हैं,
पर ज़रूरत पड़ने पर कोई अपना नहीं होता।
हम अपनों के बीच रहकर भी बेगाने हो जाते हैं।
आज मुझे अपने गांव की याद इसलिए आई, क्योंकि मैं अपनी ही लिखी एक पुरानी कहानी पढ़ रहा था—
वह कहानी, जो मैंने पाँच साल पहले गांव की मिट्टी में बैठकर लिखी थी।
जैसे-जैसे शब्द आगे बढ़ते गए,
वैसे-वैसे मेरा मन शहर से निकलकर फिर उसी गांव की गलियों में भटकने लगा…
भारत के गांव…
वे सिर्फ भौगोलिक स्थान नहीं होते,
वे जीवन के सरलतम और सच्चे रूप के प्रतीक होते हैं।
ऐसा ही एक गांव था—सिकरिया।
वही गांव, जहाँ मेरा बचपन बीता था।
शहर में बस जाने के बावजूद,
मेरे भीतर का एक हिस्सा हमेशा उसी गांव से जुड़ा रहा।
शायद यही कारण था कि मैं हर साल फसल के मौसम में वहां खिंचा चला जाता था।
वो कबड्डी के खेल,
गुल्ली-डंडा,
तालाब में मछली पकड़ना,
और खेतों से मटर की फलियाँ तोड़कर भाग जाना—
उन छोटी-छोटी शरारतों में जो आनंद था,
वह शहर की सारी सुख-सुविधाओं पर भारी पड़ता था।
उस दिन भी मैं बस स्टैंड से पैदल ही गांव की ओर चल पड़ा था।
तीन किलोमीटर का रास्ता कब कट गया, पता ही नहीं चला।
गांव पहुँचते ही जैसे समय ठहर गया।
दो दिन कब बीत गए, इसका एहसास ही नहीं हुआ।
मैं बच्चों के साथ फिर बच्चा बन गया था—
बेखौफ, बेफिक्र, और पूरी तरह आज़ाद।
तीसरे दिन मछली पकड़ने का कार्यक्रम बना।
मैंने भी पाँच बंसी तैयार की और बच्चों के साथ निकल पड़ा।
रास्ते में एक छोटा तालाब आया,
पर मेरा मन बड़े तालाब की ओर जाने का था।
बच्चों ने मना कर दिया—
कहने लगे, रास्ते के पीपल के पेड़ पर भूत रहता है।
मैं हँस पड़ा।
शहर का पढ़ा-लिखा आदमी भला इन अंधविश्वासों पर कैसे यकीन करता?
मैं अकेला ही चल पड़ा।
पर जैसे-जैसे पीपल का पेड़ नज़दीक आता गया,
मेरे कदम धीमे पड़ने लगे।
दिल की धड़कन तेज हो गई।
पसीना माथे पर उभर आया।
हिम्मत और डर के बीच चल रही उस जंग में,
आख़िरकार मेरी “शहरिया शान” जीत गई—
और मैं पेड़ पार कर गया।
लेकिन जैसे ही मेरी नज़र तालाब के किनारे पड़ी—
मेरे होश उड़ गए।
वहाँ एक बूढ़ा आदमी बैठा था—
लंबी दाढ़ी, फटा-पुराना लबादा, और हाथ में जलती बीड़ी।
उस क्षण वह मुझे इंसान नहीं, भूत ही लगा।
मैं भागा…
ऐसे भागा जैसे जान बचाकर भाग रहा हूँ।
गिरा, उठा, बंसी टूटी—पर मैं रुका नहीं।
जब मैं वापस बच्चों के पास पहुँचा,
तो वे सब ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।
तभी मुझे सच्चाई का एहसास हुआ—
वहाँ कोई भूत नहीं था।
वह बूढ़ा आदमी गांव का ही था,
जो पिछले साल से वहीं रह रहा था।
उसकी सादगी और बच्चों की शरारत ने
मेरे “शहरी अहंकार” को पल भर में तोड़ दिया था।
शर्मिंदगी से बचने के लिए,
मैं फिर से अकेला उसी तालाब की ओर लौट पड़ा।
रास्ते में कुछ बच्चे स्कूल जाने के डर से गड्ढे में छिपे हुए मिले—
मैं बस मुस्कुरा दिया।
तालाब पर पहुँचा,
तो इस बार वह बूढ़ा नहीं था।
मैंने बंसी डाल दी,
पर मछलियाँ जैसे मुझसे खेल रही थीं—
एक पकड़ता, तो दूसरी छूट जाती।
आख़िरकार,
मैं खाली हाथ लौट आया।
कहानी समाप्त हुई,
पर मेरे भीतर एक नई कहानी शुरू हो चुकी थी।
शहर और गांव के बीच का वह द्वंद्व,
अब पहले से कहीं अधिक गहरा हो गया था।
गांव अब पहले जैसा नहीं रहा—
वहाँ बिजली आ गई है, सड़कें बन गई हैं,
हर घर में टीवी और मोबाइल पहुँच चुका है।
फिर भी,
लोग गांव छोड़कर शहर आ रहे हैं।
और शहर के लोग…
वे अब गांव की ओर लौटने का सपना देख रहे हैं।
शायद सच यही है—
हम जहाँ होते हैं, वहाँ संतुष्ट नहीं होते।
और जहाँ हमारी जड़ें होती हैं,
वहीं लौटने की चाह हमेशा बनी रहती है।
आज भी मेरे मन में वही आवाज़ गूंज रही है—
“लौट चलो… उस गांव की ओर,
जहाँ लोग दिखावे से नहीं, दिल से अपने होते हैं।”
एक प्यारा संदेश
शहर हमें जीना सिखाता है,
लेकिन गांव हमें महसूस करना सिखाता है।
शहर में रिश्ते अक्सर ज़रूरतों से बनते हैं,
और गांव में लोग बिना किसी मतलब के अपने बन जाते हैं।
हम सब अपनी ज़िंदगी की दौड़ में इतना आगे निकल जाते हैं,
कि पीछे छूट गए उस गांव की पुकार सुन ही नहीं पाते…
जो आज भी उसी जगह खड़ा है,
बाहें फैलाए, हमारा इंतज़ार करता हुआ।
शायद अब वक्त आ गया है कि हम खुद से एक सवाल पूछें—
क्या सच में हम आगे बढ़े हैं…
या अपने सबसे कीमती हिस्से को पीछे छोड़ आए हैं?
और अगर दिल के किसी कोने से जवाब आए—“हां”…
तो समझ लेना,
वो गांव… आज भी तुम्हें बुला रहा है।
ग्रामीण परिवेश की यादों वाली एक और कहानी
जब गांव की गालियां याद आई बहुत ही मार्मिक और दिल को छू लेने वाली कहानी है। अगर आपको भी आपके गांव की याद आती है, वहां बीता बचपन में जीने का मन करता है तो एक बार जरूर यह कहानी पढ़िए। यक़ीनन आपको यह कहानी बहुत पसंद आएगी।
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