स्मार्टफोन की दीवार – रिश्तों की सच्चाई बयां करती एक मार्मिक कहानी | Smartphone Ki Deewar Hindi Story
स्मार्टफोन की दीवार
✍️ किशोर
रात के नौ बज रहे थे। बाहर आसमान में चाँद अपनी पूरी चमक बिखेर रहा था, लेकिन खन्ना परिवार के ड्राइंग रूम में चाँदनी की जगह चार अलग-अलग कोनों से आती नीली रोशनी फैली हुई थी।
सोफे के एक कोने पर अजय जी बैठे थे, जो देश-दुनिया की खबरों के वीडियो देख रहे थे। दूसरे कोने पर उनकी पत्नी सुधा मोबाइल पर कुकिंग रेसिपीज़ के 'रील्स' स्वाइप कर रही थीं। बड़ा बेटा रोहन अपने हेडफोन लगाए गेमिंग की दुनिया में खोया था, और छोटी बेटी पिया इंस्टाग्राम पर अपनी नई फोटो के 'लाइक्स' गिन रही थी।
चारों एक ही कमरे में थे, एक-दूसरे के इतने करीब कि हाथ बढ़ाते तो छू लेते, लेकिन उनके बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी थी— स्मार्टफोन की दीवार।
"अजय, सुना आपने? पड़ोस वाले शर्मा जी का बेटा कल विदेश जा रहा है," सुधा ने मोबाइल से नज़र हटाए बिना कहा।
अजय जी ने वीडियो की आवाज़ कम किए बिना ही सिर हिला दिया।
सुधा को समझ नहीं आया कि उन्होंने 'हाँ' कहा या बस वीडियो के किसी तर्क पर सहमति जताई।
तभी अचानक घर की बिजली गुल हो गई। पूरा कमरा घुप अंधेरे में डूब गया।
वाई-फाई का राउटर बंद होते ही रोहन के मुँह से चीख निकली, "ओह शिट! मेरा मैच बीच में रुक गया।"
पिया भी झुंझला उठी, "मम्मी, इन्वर्टर से वाई-फाई कनेक्ट क्यों नहीं है?"
बअंधेरे ने सबको मजबूर कर दिया कि वे अपनी-अपनी स्क्रीन की रोशनी से बाहर निकलें।
अजय जी ने मोबाइल की टॉर्च जलाई और सेंटर टेबल पर एक मोमबत्ती रख दी। मोमबत्ती की पीली रोशनी में आज बहुत दिनों बाद सबको एक-दूसरे के चेहरे साफ दिखाई दिए।
"पिया, तुम्हारी आँखों के नीचे ये काले घेरे कैसे? क्या रात भर सोती नहीं हो?" सुधा ने अपनी बेटी का चेहरा पास से देखते हुए पूछा।
पिया चौंक गई, "मम्मी, ये तो महीनों से हैं, आपने आज नोटिस किया?"
रोहन चुपचाप अपनी उंगलियां चटका रहा था। उसे अहसास हुआ कि गेम खेलते-खेलते उसकी गर्दन में दर्द होने लगा था।
अजय जी ने देखा कि सुधा के चश्मे का नंबर शायद बढ़ गया है, क्योंकि वह बार-बार अपनी आँखें मल रही थी।
उस दस मिनट के अंधेरे ने वो कर दिया जो हफ्तों की बातचीत नहीं कर पाई थी।
अजय जी ने ठंडी आह भरते हुए कहा, "हम सब एक ही छत के नीचे रहते हुए भी कितने दूर हो गए थे न? हमारे बीच ये ईंट-पत्थर की दीवारें नहीं, बल्कि इस पाँच इंच की स्क्रीन ने दीवार खड़ी कर दी थी।"
रोहन ने अपना मोबाइल मेज पर उल्टा रख दिया। "पापा, सच कहूँ तो गेम जीतने से ज्यादा ख़ुशी मुझे अभी आप लोगों से बात करके हो रही है।"
बिजली आ गई। वाई-फाई का सिग्नल फिर से 'ब्लिंक' करने लगा। चारों के मोबाइल पर नोटिफिकेशन्स की बाढ़ आ गई। लेकिन इस बार किसी ने फोन नहीं उठाया।
सुधा रसोई की तरफ बढ़ी, "आज रेसिपी देखकर नहीं, अपनी पसंद का खाना बनाती हूँ। रोहन, पिया... आकर हाथ बँटाओ, आज साथ बैठकर खाना खाएंगे और बातें करेंगे।"
उस रात खन्ना परिवार के घर में स्मार्टफोन की वो दीवार ढह गई थी, और उसकी जगह हंसी-ठिठोली और संवाद के पुल बन रहे थे।
सीख (Moral):
तकनीक हमें दुनिया से जोड़ती तो है, पर कहीं अपनों से तोड़ न दे, इसका ध्यान रखना ज़रूरी है।
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि फोन ने हमारे अपनों से बातचीत कम कर दी है? इस कहानी पर अपनी राय कमेंट में ज़रूर बताएं और अपने परिवार के साथ इसे शेयर करें।
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