साजन की राह में विरहन – विरह और प्रतीक्षा की मार्मिक ग़ज़ल | किशोरवाणी। sajan-ki-raah-mein-virahan-ghazal
साजन की राह में विरहन
✍️ किशोर
✦ प्रस्तावना
प्रेम का सबसे गहरा रूप अक्सर विरह और प्रतीक्षा में दिखाई देता है। जब कोई अपने प्रिय से दूर होता है, तो हर दिन उम्मीद और हर रात यादों में गुजरती है।
इसी भावना को व्यक्त करती यह ग़ज़ल “साजन की राह में विरहन” एक ऐसी स्त्री की पीड़ा को शब्द देती है, जो अपने साजन के लौट आने की राह में हर पल आशा का दीप जलाए बैठी है।
✦ ग़ज़ल
साजन बिन अब रात मुझे नींद न आए,
यादों का कोई ज़ख़्म मुझे यूँ सताए न आए।
हफ़्ते भी गुज़र गए, महीने भी गुज़र गए,
फिर भी मेरी राह में साजन नज़र न आए।
कहते थे कि दो-चार महीनों में आऊँगा,
ऐसा भी कोई वादा कोई निभाए न आए।
चौखट पे नज़र टिकाए बैठी हूँ मैं कब से,
दिल को कोई उम्मीद नई दिखाए न आए।
ऐ रब! मेरे साजन को हर बुरी नज़र से बचाना,
कहीं और कोई दिल में घर बनाए न आए।
दिन-रात तेरी याद मुझे चैन कहाँ लेने दे,
विरह की ये अग्नि मुझे यूँ रुलाए न आए।
सपनों में कभी आकर मेरा हाल तो पूछो,
क्या जाने कि फिर ऐसा अवसर बुलाए न आए।
सूनी पड़ी है सेज, उदास पड़ा है आँगन,
तेरे बिना कोई भी मौसम सजाए न आए।
जल्दी से लौट आओ अब मेरे प्रिय साजन,
तेरे बिन ये जीवन कहीं टूट न जाए।
किशोर तेरी राह में बैठी है विरहन बनकर,
क्या जाने वो लौटें भी या फिर न आए।
✦ ग़ज़ल का भावार्थ
यह ग़ज़ल एक ऐसी विरहन की कहानी है जो अपने प्रिय के इंतज़ार में दिन-रात गुजार रही है। समय बीतता जाता है, लेकिन उसके दिल में उम्मीद की लौ बुझती नहीं।
विरह की पीड़ा, प्रेम की गहराई और प्रतीक्षा की बेचैनी इस ग़ज़ल के हर शेर में झलकती है।
✦ निष्कर्ष
प्रेम केवल साथ रहने का नाम नहीं है, बल्कि इंतज़ार और विश्वास का भी दूसरा नाम है।
यह ग़ज़ल उसी सच्चे प्रेम की कहानी है, जिसमें एक विरहन अपने साजन की राह में उम्मीद का दीप जलाए बैठी है।
✦ पाठकों से निवेदन
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