सफेद साड़ी की मजबूरी – एक विधवा की दर्दभरी कविता | किशोरवाणी। safed-saree-ki-majburi-hindi-poem



                 कभी-कभी समाज किसी इंसान की पूरी जिंदगी का फैसला सिर्फ उसके हालात देखकर कर देता है।
                 सफेद साड़ी पहनने वाली स्त्री को लोग अक्सर सहानुभूति नहीं बल्कि ताने और शक की नजर से देखते हैं।

          “सफेद साड़ी की मजबूरी” ऐसी ही एक स्त्री की मूक पीड़ा को शब्दों में ढालने की कोशिश है।
यह कविता उस दर्द, अपमान और संघर्ष को दिखाती है जिसे एक विधवा स्त्री रोज सहती है, फिर भी जीती रहती है—सिर्फ अपने बच्चे के भविष्य की उम्मीद में।

          यह सिर्फ एक कविता नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ा एक सवाल है।






               सफेद साड़ी की मजबूरी 

                                          ✍️ किशोर 




सफेद साड़ी में लिपटी वह स्त्री,
जब भी सड़कों पर कदम रखती है,
नज़रें उसके पीछे-पीछे चलती हैं,
और होंठ तानों के तीर चलाते हैं।

कुलटा, कुलक्षणी जैसे शब्दों से
औरतें ही उसका श्रृंगार करती हैं,
और मासूम बच्चे भी
अनजाने भय या सीख में
अपना चेहरा फेर लेते हैं।

कोई उसके तन पर नज़र गड़ाता है,
कोई उसकी मजबूरी की कीमत लगाता है,
हर कोई उसकी बेबसी को
अपना अवसर समझ बैठा है।

अपने हों या पराये—
सबकी आँखों में
एक ही गंदी चाहत तैरती है,
मानो उसकी सफेद साड़ी
उनके लिए निमंत्रण बन गई हो।

कभी-कभी वह सोचती है,
इस जालिम समाज को छोड़ दे,
इन तानों, इन नज़रों,
इन झूठी मर्यादाओं से दूर चली जाए।

पर मौत भी शायद
उसकी दहलीज़ पर आने से डरती है।

वह हर दिन
थोड़ा-थोड़ा मरती है,
फिर भी साँस लेती रहती है—

सिर्फ़ इस उम्मीद में
कि उसका छोटा सा बेटा
एक दिन बड़ा होगा,

और तब शायद
समझ पाएगा
अपनी माँ की
सफेद साड़ी की मजबूरी।





       समाज अक्सर किसी स्त्री का चरित्र
उसके कपड़ों और हालात से तय कर देता है,
पर सच यह है कि हर सफेद साड़ी के पीछे
एक टूटा हुआ सपना, एक अधूरी ज़िंदगी
और ढेर सारा संघर्ष छिपा होता है।

           जरूरत ताने देने की नहीं, समझने और सहारा देने की है।


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