पगला कहीं का | एक पढ़े-लिखे बेरोजगार की सच्ची कहानी | सिस्टम की कड़वी सच्चाई । pagla-kahin-ka-hindi-story
" कहते हैं इस देश में पढ़ाई इंसान की तकदीर बदल देती है…
मगर क्या हो, जब डिग्री हाथ में हो और किस्मत सिस्टम के पैरों तले कुचली जा रही हो ?
क्या हो, जब मेहनत हार जाए, और झूठ जीत जाए ?
जब सच बोलना गुनाह बन जाए और स्वाभिमान सबसे बड़ा अपराध ?
ये कहानी है विनय की—
एक ऐसे पढ़े-लिखे युवक की,
जिसने सिर्फ जीने की कोशिश की…
मगर इस व्यवस्था ने उसे जीने नहीं दिया।
और आखिर में उसे बना दिया—
“ पगला कहीं का…”
✨ पगला कहीं का
✍️ किशोर
विनय एक पढ़ा-लिखा बेरोज़गार युवक था। स्वभाव से शांत, मगर भीतर से स्वाभिमान और खुद्दारी से लबालब भरा हुआ। उसके गरीब किसान माता-पिता ने अपनी भूख मारकर, अपनी ज़रूरतें कुचलकर उसे पढ़ाया था—इस उम्मीद में कि एक दिन उसका बेटा सरकारी नौकरी पाएगा और उनकी अधूरी ज़िंदगी को थोड़ा सुकून मिलेगा।
मगर किस्मत और व्यवस्था दोनों ही उसके खिलाफ खड़े थे।
सरकारी बेरुखी और तंत्र की उदासीनता ने उसके सपनों को धीरे-धीरे निगल लिया। नौकरी तो दूर, कोई ढंग का रोज़गार तक नसीब नहीं हुआ।
आख़िरकार, थक-हारकर उसने अपने ज़िले अरवल के एक निजी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। साथ ही घर-घर जाकर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगा।
किसी तरह चूल्हा जलने लगा… और यही उसके संघर्षों की छोटी-सी जीत थी।
विनय अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। स्नातक होते ही उसकी शादी लालती से कर दी गई—एक सीधी-सादी, समझदार लड़की, जिसके विचार विनय से मेल खाते थे।
गरीबी थी, अभाव थे… मगर शिकायत नहीं थी।
दोनों ने हालात से समझौता कर लिया था।
लेकिन तभी…
कोरोना ने दस्तक दी।
लॉकडाउन लगा, स्कूल बंद हुए, ट्यूशन बंद हो गई—और विनय की आय का एकमात्र सहारा भी खत्म हो गया।
भूख अब दरवाज़े पर दस्तक नहीं देती थी, बल्कि भीतर आकर बैठ गई थी।
आधे पेट, अधूरी उम्मीदों और टूटते आत्मसम्मान के साथ उसने वो दिन काटे।
लॉकडाउन खत्म हुआ, मगर हालात नहीं बदले।
मजबूर होकर वह पटना चला आया—रोज़गार की तलाश में।
मगर यहाँ भी उसे सिर्फ ठोकरें ही मिलीं।
आख़िरकार…
भूख ने उसके स्वाभिमान को घुटनों पर ला दिया।
एक दिन उसने भाड़े का ठेला लिया… और सड़क किनारे फल बेचने लगा।
स्नातक प्रथम श्रेणी से पास विनय अब ठेले पर सेब बेच रहा था—
ज़िंदा रहने के लिए।
इसी बीच चुनाव का मौसम आ गया।
वोटों की राजनीति अपने चरम पर थी।
एक दिन, पटना के बेली रोड पर चिड़ियाघर के पास, विनय अपना ठेला लगाए खड़ा था कि तभी राज्य के मंत्री भुवन प्रसाद का काफिला वहाँ आकर रुक गया।
नेता जी उतरे—कैमरों और चमचों के बीच।
गरीब के ठेले से फल खरीदकर “जनसेवा” दिखानी थी।
“सेब मीठा है न?”
उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा।
“जी, आप बेफिक्र होकर लीजिए…”
विनय ने विनम्रता से जवाब दिया।
मगर अगला ही पल सब कुछ बदल गया।
अपनी झूठी शान में चूर मंत्री को एक गरीब का आत्मसम्मान नागवार गुज़रा।
उन्होंने गालियाँ दीं—पहले अंग्रेज़ी में, फिर अपनी असलियत में।
और उसी पल…
विनय के भीतर दबा हुआ स्वाभिमान जाग उठा।
उसने भी अंग्रेज़ी में ही जवाब दिया—
इतना सटीक, इतना तीखा कि मंत्री जी समझ तो कुछ नहीं पाए…
मगर अपमान जरूर महसूस कर गए।
अगले दिन…
विनय जेल में था।
आरोप—गाली देना और जान से मारने की धमकी।
मीडिया ने कहानी पलट दी।
नेता “गरीबों का मसीहा” बन गया… और विनय “सनकी”।
तीन महीने की सज़ा—
और एक ईमानदार आदमी का मन भीतर ही भीतर टूट गया।
जेल से निकलने के बाद वह फिर पटना आया—
मगर इस बार सिर्फ जीने के लिए नहीं…
लड़ने के लिए।
अपने दोस्त किशोर की मदद से उसने एक स्मार्टफोन लिया…
और नेताओं के झूठे वादों के सबूत जुटाने लगा।
चुनाव हुए…
भुवन प्रसाद फिर जीत गया।
वादे फिर टूट गए।
मगर इस बार…
कोई चुप नहीं रहा।
विनय ने कोर्ट में केस कर दिया—
झूठे वादों के खिलाफ।
पूरा सिस्टम हिल गया।
लेकिन…
सिस्टम इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था।
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंत्री ने विनय को “पागल” घोषित कर दिया।
और अगले ही दिन…
उसकी अपनी पत्नी लालती ने मीडिया के सामने यही बात दोहरा दी।
“मेरे पति का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है…”
बस…
इतना ही काफी था।
केस खारिज हो गया।
और विनय… पागलखाने में बंद।
जब लालती उससे मिलने आई…
तब सच सामने आया—
पचास लाख रुपये।
एक इंसान की सच्चाई…
एक रिश्ते की वफादारी…
और एक जीवन की इज्जत—
सबकी कीमत लगा दी गई थी।
विनय अब सब समझ चुका था।
इस दुनिया में सच की कोई कीमत नहीं…
कीमत है तो सिर्फ पैसे की।
और उसी पैसे ने…
आज उसे बना दिया था—
“पगला कहीं का…”
🎭 सनकी संदेश
"विनय पागल नहीं था…
पागल तो वो सिस्टम था,
जहाँ सच्चाई की कोई कीमत नहीं…
और झूठ की बोली लाखों में लगती है।
जहाँ पढ़ा-लिखा इंसान ठेले पर जीने को मजबूर है,
और अनपढ़ सत्ता में बैठकर किस्मत लिख रहा है।
विनय हार गया…
क्योंकि उसके पास सच था,
और सच के पास… कोई ताकत नहीं थी।
उसकी पत्नी बिक गई,
न्याय बिक गया,
और आखिर में… इंसानियत भी हार गई।
आज भी कहीं कोई विनय होगा,
जो अपने हक के लिए लड़ रहा होगा…
मगर डर इसी बात का है—
कहीं उसे भी एक दिन…
“पगला कहीं का” न बना दिया जाए…
आज देश में बेरोजगारी अपनी चरम पर है। बेरोजगारी के कारण ही युवा नहीं चाहते हुए भी पेट भरने के लिए कोई न कोई काम करने के लिए विवश हैं। किशोरवाणी ब्लॉग की कहानी मजबूरी का नाच भी एक पढ़े लिखे बेरोजगार युवक की कहानी है।
आप इस कहानी को पढ़ना चाहते हैं तो नीचे लिखे टाईटल पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं -
👉 ऐसी ही प्रेरणादायक एवं मजेदार कहानियाँ पढ़ने के लिए किशोरवाणी ब्लॉग फॉलो करें।
👉 पोस्ट पसंद आए तो कमेंट भी जरूर लिखें ।
👉 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें।
"मैं भी बेरोजगार हूं।" मेरा उम्र 27 साल की हो गई है और अपने बल पर कई डिग्री हासिल किया ट्रिपल ग्रेजुएट और सैनिटरी इंस्पेक्टर की डिग्री होने के बाबजूद भी कही नौकरी नहीं मिली अंत में अपना ग्रामीण बिहार न्यूज चैनल खोला और घर से बोला जा रहा था कि सरकारी नौकरी करो ये निजीकरण फालतू है । कुल मिलाकर ये कहना चाहता हूं कि बेरोज़गारी की दौर में कोई किसी का नहीं होता अगर आपके पास पैसा है तो सब हैं। नहीं है तो सहोदर भी नहीं है। मैं अपने ऊपर कहानी तो लिख रहा हूं पूरा होते ही जल्द भेजेंगे।
जवाब देंहटाएंहिमांशु कुमार शंकर
मंझौल, बेगूसराय बिहार
आपके कहानी का इंतजार है। स्वागत है आपका।
हटाएं