मैं अपनी मर्जी से शादी करूंगी | एक मध्यमवर्गीय परिवार की भावनात्मक कहानी । Main - apani - marji - se - shadi - karungi
हर माता-पिता अपने बच्चों के लिए सपने देखते हैं। उनके अच्छे भविष्य के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, उम्मीद करते हैं कि एक दिन वही बच्चे उनकी उम्मीदों को सच करेंगे।
लेकिन कभी-कभी जिंदगी ऐसा मोड़ ले आती है, जहाँ सपनों और हकीकत के बीच एक गहरी खाई खड़ी हो जाती है।
जब बच्चों की अपनी इच्छाएँ, अपनी पसंद और अपने फैसले माता-पिता के वर्षों से सँजोए सपनों से टकराते हैं, तब सिर्फ एक परिवार नहीं टूटता — रिश्तों की नींव भी हिल जाती है।
यह कहानी भी ऐसे ही एक मध्यमवर्गीय परिवार की है। जहाँ एक दिन उनकी दुलारी बाबू बिटिया ने ऐसा फैसला सुनाया, जिसने पूरे घर की शांति छीन ली।
मैं अपनी मर्जी से शादी करूंगी
शीला अपने घर के हॉल में सोफे पर आराम से बैठी थी। कानों में हेडफोन लगाए वह मोबाइल पर कोई वीडियो देख रही थी। तभी अचानक डोर बेल बज उठी।
वह झुंझलाकर मोबाइल को बगल में रखती है और मन ही मन आगंतुक को कोसती हुई दरवाज़े की ओर बढ़ जाती है।
दरवाज़ा खोलते ही सामने उसकी पड़ोसन और सबसे खास सहेली मंजू खड़ी थी।
“क्या बात है शीलू, आज घर में एकदम सन्नाटा है?”
मंजू ने हॉल में कदम रखते ही पूछा। वह प्यार से शीला को शीलू कहती थी।
“अरे यार, मेरी बाबू बिटिया अभी सो रही है।”
“सो रही है? दोपहर के दो बजे तक ! तबीयत तो ठीक है न?”
“सब ठीक है। आजकल रात भर पढ़ाई करती है, इसलिए दिन में देर तक सोती है।”
मंजू सोफे पर बैठते हुए थोड़ा झिझक कर बोली—
“शीलू, बुरा मत मानना… पर सच में वह पढ़ाई ही करती है या किसी से चैट-वेट भी करती रहती है ? तुमने कभी ध्यान दिया है ?”
शीला का चेहरा तुरंत सख्त हो गया।
“देख मंजू, दुबारा ऐसा मत कहना। मेरी बाबू बिटिया ऐसी लड़की नहीं है। उसे सीमा की बेटी डॉली मत समझना, जो पढ़ाई के नाम पर रात भर अपने बॉयफ्रेंड से फोन पर लगी रहती थी।”
मंजू ने शीला का बदला हुआ चेहरा देखकर तुरंत बात बदल दी।
“अरे यार, तुम तो सच में बुरा मान गई। मैं तो बस आजकल के जमाने की बात कर रही थी। अच्छा छोड़ो… तुमने कल रात मेहता जी वाला सीरियल देखा था? मज़ा आ गया! कैसे अपनी बीवी को बाहर भेजकर घर में ही गर्लफ्रेंड के साथ रोमांस कर रहा था।”
शीला का गुस्सा तुरंत हल्का पड़ गया।
“हाँ, देखा था… मेहता भी बड़ा चालू निकला।”
बस फिर क्या था। सीरियल की बात शुरू हुई तो दोनों पैंतालीस पार की सखियाँ उसी में उलझ गईं। कहानी के मोड़, किरदारों की चालाकियाँ और अगले एपिसोड के अनुमान—बातों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा था।
शीला की पच्चीस साल की एक बेटी थी — शिम्पी।
वह उसे प्यार से “बाबू बिटिया” कहकर बुलाती थी।
दरअसल, शीला की पहली चाहत बेटा था। मगर किस्मत ने उसे बेटी दी। अपने मन को समझाने के लिए उसने बेटी को ही बाबू बिटिया कहना शुरू कर दिया। बाद में एक बेटा भी हुआ — रोहन। वह दिल्ली के एक कॉलेज में बीसीए कर रहा था और वहीं हॉस्टल में रहता था।
शिम्पी पटना के एक महिला कॉलेज से स्नातक पास कर चुकी थी। इन दिनों वह घर पर रहकर सरकारी नौकरी की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी। चार-पाँच बार परीक्षा भी दे चुकी थी, लेकिन अब तक उसे सफलता नहीं मिली थी।
शीला के पति श्रीकांत पटना सचिवालय में क्लर्क थे। परिवार छोटा था — बस यही चार लोग।
बशीला और मंजू अभी अपने पसंदीदा सीरियल की बातें कर ही रही थीं कि तभी श्रीकांत ऑफिस से घर लौट आए।
यह मकान उनका किराये का था। उनका असली घर गाँव में था, जहाँ परिवार के बाकी सदस्य रहते थे।
श्रीकांत को आते देख मंजू तुरंत अपने घर लौट गई। दोनों परिवार पटना की वृंदावन कॉलोनी में ही रहते थे।
शीला ने पति के चेहरे की ओर देखते हुए मुस्कराकर पूछा—
“क्या बात है जी? आज चेहरे पर बड़ी मुस्कान है। नहीं तो रोज़ ऑफिस से थके-हारे लौटते हैं।”
श्रीकांत भी खुशी छिपा नहीं सके।
“आज तुम्हारे भइया से बात हुई थी। उनके दोस्त दिनेश बाबू अपने बेटे मयंक की शादी हमारी शिम्पी से करने के लिए तैयार हो गए हैं। लड़का अच्छा है… और आर्मी में नौकरी करता है।”
शीला के चेहरे पर भी खुशी की चमक दौड़ गई।
“अरे यह तो बहुत अच्छी बात है! आजकल सरकारी नौकरी वाला लड़का कहाँ मिलता है!”
श्रीकांत ने भी सहमति में सिर हिलाया।
“सही कह रही हो। और अगर मिल भी जाए तो दहेज इतना माँगते हैं कि हम जैसे मिडिल क्लास वालों के बस की बात नहीं। तुम्हारे भइया का ही सहारा था कि बात इतनी आसानी से बन गई।”
शीला उत्साहित होकर बोली—
“बाबू अभी बाथरूम गई है। जैसे ही निकलेगी, मैं उसे यह खुशखबरी बता दूँगी।”
“ठीक है, तब तक मैं फ्रेश हो लेता हूँ… तुम चाय बना दो।”
कुछ देर बाद श्रीकांत हॉल में बैठकर चाय पीते हुए टीवी पर समाचार देख रहे थे।
उन्होंने अभी कप रखा ही था कि शीला तेज कदमों से वहाँ आ गई। उसके चेहरे पर गुस्सा साफ झलक रहा था।
“क्या हुआ? किस पर इतना गुस्सा है?”
श्रीकांत ने चौंककर पूछा।
शीला झुंझलाकर बोली—
“अपनी ही बेटी पर! वह उस लड़के से शादी करने को तैयार नहीं है।”
श्रीकांत के हाथ से रिमोट लगभग छूट ही गया।
“क्यों? लड़के में क्या कमी है?”
“कमी लड़के में नहीं… वह किसी और लड़के से प्यार करती है। उसी से शादी करना चाहती है। और वह लड़का दूसरी जाति का है।”
श्रीकांत ने तुरंत टीवी बंद कर दिया।
“यह तुम क्या कह रही हो! हमारी शिम्पी ऐसा नहीं कर सकती।”
लेकिन शीला ने तुरंत टीवी फिर चालू कर दिया और आवाज़ तेज कर दी, ताकि पड़ोसी उनकी बातें न सुन सकें।
“हम भी यही सोचते थे… मगर हम गलत थे। वह हमारे सोच से बिल्कुल अलग निकली।”
“मैं उससे बात करता हूँ।”
“नहीं!”
शीला ने तुरंत रोक दिया।
“आप उससे बात मत कीजिए। कहीं गुस्से में घर से भाग गई तो? तब हम समाज में मुँह दिखाने लायक भी नहीं रहेंगे।”
श्रीकांत चुप हो गए।
शीला आगे बोली—
“पता है… परीक्षा देने के बहाने वह उसी लड़के के साथ घूमने जाती थी। रात भर पढ़ाई के नाम पर उससे फोन पर बात करती थी। हम दोनों की आँखों में धूल झोंकती रही।”
“तुम्हें यह सब कैसे पता चला?”
“खुद बताया उसने। जैसे उसे कोई शर्म ही नहीं हो। साफ कह दिया — या तो वह अपने बॉयफ्रेंड से शादी करेगी, या फिर ऐसे लड़के से जिसकी महीने की कमाई एक लाख से ऊपर हो।”
श्रीकांत के चेहरे पर मायूसी उतर आई।
“उसके कहने से थोड़े न शादी करेंगे। एक लाख से ऊपर कमाने वाले तो डॉक्टर या इंजीनियर होते हैं। और उनके यहाँ दहेज की माँग चालीस-पचास लाख से कम नहीं होती। हमारी औकात है क्या इतना देने की?”
शीला भी निराश होकर सोफे पर बैठ गई।
“बात तो सही है… मगर अब क्या होगा? उसने भागने की भी धमकी दी है।”
कुछ देर कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
फिर श्रीकांत धीमे स्वर में बोले—
“दूसरी जाति के लड़के से शादी तो हरगिज़ नहीं हो सकती। खानदान में हमारी नाक कट जाएगी। अगर अपनी जाति का होता तो शायद सोच भी लेते।”
दोनों गहरी चिंता में डूब गए।
आज उनकी बाबू बिटिया ने वह कर दिखाया था जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
आख़िर गलती किसकी थी ?
शिम्पी की या उसके माता-पिता की ?
आजकल कई माता-पिता अपने बच्चों की परवरिश से ऐसे दूर हो गए हैं, जैसे बच्चा जन्म लेते ही सब कुछ सीख जाता हो।
जबकि बच्चों का मन कच्ची मिट्टी की तरह होता है —
जैसे उसे ढालेंगे, वह वैसा ही आकार ले लेगा।
आज ज़रूरत है बच्चों को समय देने की…
उनसे मित्र की तरह बात करने की…
ताकि उन्हें घर में अकेलापन महसूस न हो।
अक्सर यही अकेलापन उन्हें ऐसे रास्तों पर ले जाता है जहाँ सही-गलत का फर्क धुंधला हो जाता है।
आज शीला और श्रीकांत अपनी बाबू बिटिया को लेकर परेशान थे। लेकिन सच यह है कि यह सिर्फ उनके घर की कहानी नहीं है। आज ऐसी कहानियाँ न जाने कितने घरों में जन्म ले रही हैं।
घर की बेटियों को भी अपने परिवार की इज़्ज़त का ख्याल रखना चाहिए। क्योंकि हर माँ-बाप अपने बच्चों का भला ही चाहते हैं। भले ही कभी-कभी उनका प्यार बच्चों को बंदिश जैसा क्यों न लगे।
उस रात शीला और श्रीकांत देर तक सो नहीं पाए। एक तरफ समाज का डर था, रिश्तेदारों की बातें थीं, खानदान की इज्ज़त थी। और दूसरी तरफ उनकी वही बाबू बिटिया थी, जिसे उन्होंने उंगली पकड़कर चलना सिखाया था।
वक़्त बदल चुका था। नई पीढ़ी अपने फैसले खुद लेना चाहती थी।
लेकिन सवाल अभी भी वहीं खड़ा था —
क्या बच्चों को अपनी जिंदगी चुनने का हक होना चाहिए?
या फिर माता-पिता के सपनों और समाज की परंपराओं के आगे उन्हें झुक जाना चाहिए?
शायद इस सवाल का जवाब हर घर में अलग-अलग होगा।
लेकिन इतना सच जरूर है —
जब रिश्तों में संवाद खत्म हो जाता है, तब फैसले अक्सर रिश्तों से बड़े हो जाते हैं।
और उसी दिन से बाबू बिटिया सिर्फ बेटी नहीं रह जाती वह एक सवाल बन जाती है।
निर्णय
जब एक बेटी अपने दिल की सुनना चाहती है और माता-पिता समाज की… तब सबसे कठिन परीक्षा रिश्तों की होती है।
Lajwab kahani
जवाब देंहटाएंजी बहुत बहुत धन्यवाद
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