मां गई वृद्धाश्रम, घर आया डॉगी – रिश्तों पर करारा व्यंग्य | maa-gayi-vridhashram-ghar-aaya-doggy-hindi-story
पटना के गांधी मैदान के पास एक अपार्टमेंट में उस शाम बड़ी खुशियों की तैयारी चल रही थी।
पूजा की थाली सजी थी, बच्चों के हाथ में बिस्कुट और दूध की बोतल थी, और सबकी निगाहें दरवाज़े पर टिकी थीं।
घर में आज एक नए मेहमान का स्वागत होने वाला था।
मगर उस खुशी के पीछे एक ऐसी सच्चाई छुपी थी, जो किसी भी संवेदनशील इंसान को झकझोर सकती थी।
क्योंकि उसी दिन सुबह इस घर से एक बूढ़ी माँ को वृद्धाश्रम छोड़कर आया गया था।
और अब उसी घर में उसकी जगह एक कुत्ते की आरती उतारने की तैयारी हो रही थी।
शायद यही आज के समय का सबसे बड़ा व्यंग्य है—
जहाँ रिश्ते बोझ बन जाते हैं और पालतू जानवर परिवार।
मां गई वृद्धाश्रम, घर आया डॉगी
✍️ किशोर
पटना के गांधी मैदान के ठीक बगल में एक रिहायशी अपार्टमेंट था— न्यूटन गार्डेन। उसके ब्लॉक-बी के एक फ्लैट में राकेश सिंह का परिवार रहता था। परिवार में उसकी बूढ़ी माँ भारती, पत्नी कामिनी, पाँच साल की बेटी मोनी और ढाई साल का बेटा मयंक थे।
शाम के पाँच बजने वाले थे। राकेश अभी घर नहीं लौटा था, फिर भी फ्लैट में असामान्य चहल-पहल थी। कामिनी पूजा की थाली सजाकर बैठी थी। मोनी हाथ में बिस्कुट का पैकेट लिए बार-बार उसे ही देख रही थी। ढाई साल का मयंक अपने पुराने दूध की बोतल को दूध से भरकर पकड़े बैठा था।
तीनों की निगाहें बार-बार हॉल में टंगी घड़ी पर टिक जाती थीं।
यह सारी तैयारी किसी इंसान के लिए नहीं, बल्कि एक कुत्ते के स्वागत के लिए थी, जिसे लाने राकेश सुबह से ही घर से निकला हुआ था।
कुछ देर पहले ही उसका फोन आया था—
“बस, पहुँचने ही वाला हूँ।”
असल में कुत्ता लाने में देर नहीं हुई थी। देर इसलिए हुई थी क्योंकि राकेश पहले अपनी बूढ़ी माँ भारती को वृद्धाश्रम छोड़ने गया था, और उसके बाद एक पालतू कुत्ता खरीदने।
घर में अब कामिनी उसी नए मेहमान की आरती उतारने को तैयार बैठी थी।
कैसी विडंबना थी!
जिस माँ ने इस घर को जन्म दिया था, उसे आज वृद्धाश्रम में छोड़ दिया गया था, और उसी घर में उसकी जगह एक कुत्ते का स्वागत होने वाला था।
जिस माँ को कभी एक गिलास दूध भी नसीब नहीं होता था, उसी घर में आज एक कुत्ते के लिए बोतल भरकर दूध रखा हुआ था।
आजकल परिवारों में रिश्तों की कीमत कितनी सस्ती हो गई थी।
बहुत से लोग अपने बूढ़े माँ-बाप को बोझ समझने लगे थे। शायद वे भूल जाते हैं कि एक दिन उन्हें भी बूढ़ा होना है।
“मम्मी… मैंने अपने डॉगी का नाम भी सोच लिया है— जीनु।”
मोनी उत्साह से उछलते हुए बोली।
कामिनी मुस्कुराई—
“अरे वाह! अच्छा नाम है। सामने वाली आंटी की कुतिया का नाम जीनी है। वो बहुत इठलाती रहती है उसका नाम लेकर। अब हम भी उसे बताएँगे कि हमारा डॉगी जीनु आ गया है।”
तभी मयंक अपनी तोतली आवाज में बोला—
“मम्मी… डॉगी मेरे साथ सोएगा।”
कामिनी हँसते हुए बोली—
“ये बाद में तय होगा। लेकिन कोई उसे डॉगी नहीं कहेगा… उसका नाम जीनु है।”
फिर घर में बहस शुरू हो गई—
जीनु किसके साथ सोएगा, उसे वॉक पर कौन ले जाएगा, और सुबह-शाम उसकी देखभाल कौन करेगा।
अंत में कामिनी ने फैसला सुनाया—
“अंतिम फैसला पापा के आने के बाद होगा।”
तभी डोरबेल बज उठी।
सब लगभग दौड़ते हुए दरवाजे तक पहुँचे।
दरवाजा खुला।
राकेश के हाथों में एक बेहद प्यारा सा पिल्ला था। उसका आधा शरीर सफेद और आधा काला था। दूसरे हाथ में मिठाई का डिब्बा था।
शायद यह मिठाई दो खुशियों के लिए थी—
एक माँ को वृद्धाश्रम में छोड़ आने की,
और दूसरी घर में नए मेहमान के आने की।
पिल्ले को देखते ही घर में खुशी की लहर दौड़ गई।
सचमुच वह बहुत प्यारा था।
समय कितना बदल गया था।
जिस माँ ने जन्म दिया, उसे घर से बाहर भेज दिया गया, और उसकी जगह एक कुत्ते के आने पर जश्न मनाया जा रहा था।
उस रात फैसला हुआ—
एक दिन जीनु बड़े लोगों के साथ सोएगा, और दूसरे दिन बच्चों के साथ।
सुबह राकेश उसे वॉक पर ले जाएगा, और शाम को कामिनी।
उस रात पूरा परिवार जीनु को घर लाकर बहुत खुश था।
उधर उसी समय वृद्धाश्रम में बूढ़ी माँ भारती अपने नसीब को कोसते हुए करवटें बदल रही थी।
अगली सुबह जब राकेश जीनु को लेकर बाहर निकला तो सामने पड़ोसन मधु अपनी कुतिया जीनी को टहला रही थी।
“अरे राकेश जी, आपने भी डॉगी खरीद लिया?”
मधु ने पूछा।
“हाँ… कल ही। पूरे तीस हजार में।”
राकेश ने गर्व से कहा।
मधु मुस्कुराई—
“फिर भी मेरे वाली जितना खूबसूरत नहीं है। मेरी जीनी तो मिस वर्ल्ड है।”
राकेश हँस पड़ा—
“अभी नया है… मेरे घर रहेगा तो ये भी मिस्टर वर्ल्ड बन जाएगा।”
इधर दोनों इंसान अपनी-अपनी शेखी बघार रहे थे, उधर मौका पाकर जीनी धीरे से जीनु के पास आ गई।
“कैसे हो हैंडसम?”
जीनी ने आँखें मटकाते हुए कहा।
जीनु शर्माते हुए बोला—
“पहली बार किसी बड़े घर में आया हूँ… यहाँ तो बड़े ठाठ हैं।”
जीनी मुस्कुराई—
“अब तो मजे ही मजे हैं। मैं भी अकेली बोर हो जाती थी… अब तुम आ गए हो।”
धीरे-धीरे दोनों की मुलाकातें बढ़ने लगीं।
मुलाकातें दोस्ती में और दोस्ती प्यार में बदल गई।
जब यह बात उनके मालिकों को पता चली तो गुस्से में कामिनी ने जीनु को बाहर ले जाना बंद कर दिया। अब वह घर के बाथरूम में ही उसे टट्टी करवाने लगी।
पहले जहाँ बूढ़ी माँ भारती का बाथरूम जाना घर को “गंदा” बना देता था,
वहीं अब उसी बाथरूम में एक कुत्ते का टट्टी करना सबको अच्छा लग रहा था।
वाह रे समय!
जीनु अब कैद में रहने लगा। उसे जीनी की बहुत याद आने लगी।
उधर जीनी भी उदास रहने लगी।
पहली बार दोनों को प्यार हुआ था, और पहली बार ही बिछड़ने का डर था।
जीनु ने बाथरूम में टट्टी करना भी बंद कर दिया।
नतीजा— वह बीमार पड़ गया।
डॉक्टर ने साफ कहा—
“इसे रोज बाहर घुमाइए, नहीं तो बीमारी बढ़ जाएगी।”
अब तय हुआ कि जब मधु अपनी जीनी को घुमा कर घर ले आएगी, तब राकेश जीनु को बाहर ले जाएगा।
एक दिन संयोग से दोनों एक ही समय बाहर आ गए।
जैसे ही जीनी और जीनु की नजरें मिलीं, दोनों रस्सी खींचते हुए एक-दूसरे की ओर दौड़ पड़े।
मधु और कामिनी के हाथ से रस्सियाँ छूट गईं।
दोनों औरतें गुस्से में एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगीं।
पर तब तक शायद जीनु और जीनी फैसला कर चुके थे।
अगर साथ जीना है, तो इंसानों की इस दुनिया से दूर ही सही।
अचानक दोनों ने जोर से झटका दिया और रस्सियाँ छुड़ाकर सड़क की ओर भाग पड़े।
मधु और कामिनी कुछ दूर तक चिल्लाते हुए उनके पीछे दौड़ीं, मगर दो पागल प्रेमियों को पकड़ना उनके बस में नहीं था।
जब कामिनी ने घर आकर बताया कि जीनु जीनी के साथ भाग गया है, तो घर में मातम छा गया।
एक कुत्ते के भाग जाने का दुख इतना था कि घर के हर चेहरे पर मायूसी थी।
लेकिन उसी घर से कुछ दिन पहले जो माँ वृद्धाश्रम गई थी, उसके जाने पर किसी की आँख नम नहीं हुई थी।
शायद इसलिए जीनु और जीनी ने तय किया कि
इंसानों की दुनिया से दूर ही अपनी दुनिया बसाना बेहतर है।
क्योंकि वहाँ कम से कम रिश्तों की कीमत तो होगी।
💔 मार्मिक मैसेज
उस दिन जीनु और जीनी तो इंसानों की दुनिया से दूर भाग गए, लेकिन अपने पीछे एक बड़ा सवाल छोड़ गए।
क्या सच में हम इतने आधुनिक हो गए हैं कि
हमारे घरों में माँ-बाप के लिए जगह कम पड़ने लगी है, और पालतू जानवरों के लिए दिल भर जाता है?
जिस माँ ने हमें चलना सिखाया,
उसी के बुढ़ापे को हम बोझ समझने लगे।
याद रखिए—
समय हमेशा घूमकर वापस आता है।
आज अगर हम अपने माता-पिता को अकेला छोड़ देंगे, तो कल हमारी संतानें भी यही सीखकर बड़ी होंगी।
क्योंकि बच्चों को संस्कार सिखाए नहीं जाते…
वे बस हमें देखकर सीख लेते हैं।
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