लाल रात: एक सच्चाई जो डराती है | उग्रवाद की विभीषिका पर आधारित एक मार्मिक कहानी - किशोरवाणी । lal-raat-ek-sachai-jo-darati-hai-hindi-story






                    क्या किसी मुसाफिर की मंज़िल साक्षात यमराज का द्वार हो सकती है? जेठ की वह तपती दोपहरी और पैर में चुभा वह विषैला कांटा तो महज़ एक चेतावनी थी। मैं अपनी पाण्डुलिपि के पन्नों में 'ग्रामीण परिवेश' की सोंधी महक तलाशने निकला था, पर मुझे क्या पता था कि बैद बिगहा की गलियों में हवा के झोंके माटी की खुशबू नहीं, बल्कि जलते हुए मांस की दुर्गंध लेकर आएंगे।

       पढ़िए 'लाल रात'—एक लेखक की आँखों देखी वह रोंगटे खड़े कर देने वाली सच्चाई, जहाँ इंसानियत ने दम तोड़ दिया और विधाता की कलम से केवल रक्त के अक्षर लिखे गए।"








          लाल रात: एक सच्चाई जो डराती है 

                                                 ✍️ किशोर 



                  जेठ की वह दोपहरी ! सूर्य मानों आकाश से आग की वर्षा कर रहा था। चिलचिलाती धूप और झुलसा देने वाली लू के थपेड़ों ने चराचर जगत को स्तब्ध कर दिया था। जिस्म को पिघला देने वाली उस भीषण गर्मी में बाहर निकलने की कल्पना भी दुस्साहस जान पड़ती थी। किंतु, अपनी पुस्तक 'ग्रामीण परिवेश' की पाण्डुलिपि तैयार करने की धुन मुझ पर इस कदर सवार थी कि मैं कभी बरगद की विरल छांव में, तो कभी ताड़ के लंबे प्रतिबिंबों की ओट में सुस्ताता हुआ निरंतर बढ़े जा रहा था।

मंजिल का कोई अता-पता न था, ऊपर से प्राण रक्षक 'जल' का पात्र भी रिक्त हो चुका था। दूर-दूर तक किसी बस्ती का नामोनिशान नहीं था। उस निर्जन और वीरान इलाके में खुद को फंसा पाकर मन आत्मग्लानि और भय से भर उठा। एक तो वह उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र और ऊपर से मेरा अपरिचय! अब केवल एक ही संबल शेष था—किसी तरह 'बैद बिगहा' पहुँचकर अपने मित्र अरविंद पाठक से भेंट हो जाए।

तपन भरी दोपहर अब ढलती हुई शाम की गोद में समाने लगी थी। मार्ग में मिले एक राहगीर ने ढांढस बंधाया कि बैद बिगहा अब समीप ही है। क्षुधा और तृष्णा से कंठ सूख चुका था, देह शिथिल पड़ रही थी और प्रत्येक डग बढ़ाना मानों किसी दुर्गम पर्वत की चढ़ाई चढ़ने के समान था। किंतु ग्रामीण जनजीवन को समझने की उत्कंठा और मित्र से मिलन की लालसा ने मुझमें नव-ऊर्जा का संचार कर रखा था।

"आह!..." एकाएक एक तीक्ष्ण चुभन ने मेरे बढ़ते कदमों को जकड़ लिया। जूते के तलवे को चीरता हुआ एक लंबा विषैला कांटा सीधे मांस में जा धंसा। पीड़ा की एक लहर सिर से पैर तक दौड़ गई। 

जब जूता निकाला, तो देखा कि पैर का तलवा रक्त से सन चुका था। मन अनायास ही चीख उठा— "हे ईश्वर! इस निसहाय मुसाफिर की यह कैसी परीक्षा? मैं तो गाँव की माटी की खुशबू समेटने निकला था, पर क्या पता था कि आज स्वयं इस 'नर-हंता प्रदेश' के चक्रव्यूह में फंस जाऊंगा।"

सूर्यास्त हो चुका था और अंधकार धीरे-धीरे अपने पैर पसार रहा था। दूर कहीं धुंधली सी रोशनी दिखाई दी—शायद कोई बस्ती थी। किंतु अब मुझमें पांच कदम चलने का भी सामर्थ्य शेष न था। मन आशंकित था कि यदि रेंगते हुए गाँव पहुँचा भी, तो कहीं अनजान समझकर ग्रामीण मुझे उग्रवादी न मान बैठें।

 द्वंद्वों के बीच संघर्ष करता हुआ मैं एक विशाल वटवृक्ष के समीप जा पहुँचा, जिसके पास ही एक पुरातन कुआं था। कुएं को देखते ही मृतप्राय शरीर में प्राण लौट आए।

फटाफट अपने वस्त्रों से एक कामचलाऊ रस्सी तैयार की और शीतल जल से मुख-प्रक्षालन किया। कंठ तर होते ही मस्तिष्क सचेत हुआ। अनहोनी के भय से मैंने रात उसी बरगद की ऊंची शाखा पर बिताने का निर्णय लिया। बचपन में सुनी लोककथाओं के नायक की भाँति आज मैं भी एक वृक्ष पर अपनी रात काट रहा था।

अभी निद्रा की पहली झपकी आई ही थी कि एक हृदयविदारक चीख ने सन्नाटे को चीर दिया। भय से कांपते हुए जब मैंने नीचे झांका, तो दृश्य देखकर रूह कांप गई। कुछ दानव रूपी पुरुष एक अबला को भूमि पर पटक कर उसकी अस्मिता को तार-तार कर रहे थे। वह बेचारी छटपटाती रही, कराहती रही, किंतु उन दरिंदों के कलेजे न पसीजे। अंततः संघर्ष करते-करते उस निर्दोष कन्या ने दम तोड़ दिया। उन नरपिशाचों ने मृत देह को भी नहीं बख्शा और उसे कुएं में फेंक कर अंधेरे में ओझल हो गए।

रात भर मैं विभीषिका के उस मंजर को याद कर कांपता रहा। सुबह होते ही मैं लड़खड़ाते कदमों से गाँव की ओर भागा।

 वह गाँव 'बैद बिगहा' ही था। पाठक जी घर पर नहीं थे, पर उनके परिजनों ने मेरा सत्कार किया। 

थकान और अवसाद के कारण मैं दिन भर बेसुध सोता रहा।

सांझ ढलते ही गाँव में एक विचित्र सा श्मशान घाट जैसा सन्नाटा पसर गया। गलियां सूनी हो गईं। 

मैं पाठक जी के बाहरी कक्ष में लेटा इस रहस्यमयी खामोशी के बारे में सोच ही रहा था कि रात के दस बजते-बजते गोलियों की तड़तड़ाहट ने वातावरण को दहला दिया।

 खिड़की से बाहर झांका तो मेरी आंखों के सामने साक्षात यमराज का तांडव था। चारों ओर लाशों का अंबार था। किसी का शीश धड़ से अलग था, तो किसी का शरीर गोलियों से छलनी। तीन माह के शिशु से लेकर सत्तर वर्ष के वृद्ध तक, कोई भी उन नरभक्षियों की क्रूरता से अछूता न था।

एक घर के कोने में मैंने देखा, वही घिनौना खेल फिर दोहराया जा रहा था। एक स्त्री ने जैसे ही प्रतिकार करना चाहा, एक उग्रवादी ने उसके मुख में ही गोली दाग दी। जाते-जाते उन्होंने घरों को अग्नि के हवाले कर दिया। दो अबोध बालक कोने में दुबके हुए थे, वे भी उस आग की लपटों में जलकर भस्म हो गए।

संपूर्ण वातावरण में जलते हुए मांस की दुर्गंध और चीख-पुकार का ऐसा समां था कि लगा मानो विधाता ने आज धरती का न्याय इन हैवानों के हाथों में सौंप दिया हो। मानव जीवन की कीमत एक सूखे तिनके से भी कम रह गई थी।

 मैं उस वटवृक्ष की ओट में खड़ा अपनी नियति और उस पाण्डुलिपि पर पछता रहा था, जिसे लिखने के लिए मैंने इस 'नरक' को चुना था।

उस रात मैंने ईश्वर से बस एक ही प्रार्थना की— "हे परमेश्वर! ऐसी काली रात फिर कभी किसी की जिंदगी में न आए।"




                अंतिम संदेश 

                
                 उस रात के बाद सूरज तो फिर निकला, पर बैद बिगहा की उन गलियों में अब भी एक रूह कंपा देने वाली खामोशी तैरती है। उग्रवाद की उस आग ने न केवल घर जलाए, बल्कि उस भरोसे को भी भस्म कर दिया जो एक इंसान दूसरे इंसान पर करता है।

                 हम अक्सर विकास और आधुनिकता की बातें करते हैं, लेकिन क्या हम वाकई सभ्य हुए हैं? जब तक एक मासूम की जान की कीमत किसी सूखे तिनके से भी कम रहेगी, तब तक 'लाल रात' का वह डरावना साया हमारे समाज पर मंडराता रहेगा।

              मेरी यह पाण्डुलिपि शायद पूरी हो जाए, लेकिन उन चीखों का हिसाब कौन देगा जो उस कुएं की गहराई और रात के सन्नाटे में कहीं दफन होकर रह गईं ? ईश्वर से बस यही प्रार्थना है—ऐसी रात फिर कभी किसी की ज़िंदगी में न आए।"





              एक सवाल आपसे 


   क्या आपको लगता है कि हिंसा कभी किसी समस्या का समाधान हो सकती है ? 
या फिर हिंसा का यह चक्र केवल मासूमों की बलि मांगता है ?

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